सफदर की याद में ‘चौराहे पर’ नाटक
सफदर की याद में ‘चौराहे पर’ नाटक
कौशल किशोर
जहां कई कलाकार नुक्कड़ नाटक की जगह रंगमंच की ओर मुड़ गए या अपनी आजीविका के लिए सरकारी-गैरसरकारी संस्थाओं में चले गए, वहां अनिल मिश्रा गुरूजी मजबूती के साथ नुक्कड़ नाटक से जुड़े हैं। नए नाट्यालेख के अभाव ने उन्हें स्वयं नाट्य लेखन की ओर उन्मुख किया। गुरुशरण सिंह की तरह मंचन के साथ ही नाट्य लेखन का काम भी शुरू कर दिया। उन्होंने कई नाटक लिखे और उनका मंचन किया। उनके इन नाटकों का संग्रह ‘चौराहे पर’ हाल में प्रकाशित होकर आया है। इसमें उनके लिखे 12 नुक्कड़ नाटक संकलित हैं।नए साल के पहले दिन, जब चारो तरफ कोहरा फैला हुआ था और हाड़ कंपाती ठंडी हवा हड्डियों को छेद रही थी, लखनऊ में गोमती नदी के किनारे शहीद स्मारक पर इस क्रूर मौसम से बेपरवाह नगाड़े की ढम-ढम और ढपली पर थाप देते अमुक अर्टिस्ट ग्रुप के कलाकार अनिल मिश्रा ‘गुरूजी’ के नेतृत्व में जुटे गए। इनके द्वारा नुक्कड़ नाटक ‘मुखौटे’ का मंचन हुआ। कलाकारों के हाथों में जो बैनर था, उस पर लिखा था- ‘हम सब सफदर, हमको मारो’। कलाकार अपने नाट्य प्रदर्शन के माध्यम से हमें याद दिलाते हैं कि पहली जनवरी के दिन ही सफदर हाशमी शहीद हुए थे। सफदर आज नहीं हैं, पर वह सांस्कृतिक संघर्ष आज भी जारी है। अपने नाटक ‘मुखौटे’ के द्वारा कलाकार हमें यह आभास देते हैं कि हम जिस सांस्कृतिक अंधेरे में जी रहे हैं, वह मौसम के कोहरे से कहीं ज्यादा घना है। जरूरत तो कला को मशाल बनाने की है, जो इस अंधेरे को चीर सके।
ऐसी ही प्रतिबद्धता और विपरीत परिस्थितियों से जूझने का साहस नुक्कड़ नाटकों को अन्य नाट्यरूपों से अलग करता है। रंगमंचीय तामझाम से दूर, थोड़ी-बहुत साज-सज्जा के साथ कलाकारों का किसी चौराहे, नुक्कड़, मुहल्ले, स्ट्रीट कार्नर या किसी जन संकुल क्षेत्र में इकट्ठा होना और अपने अभिनय द्वारा जन जागृति का संदेश देना नुक्कड़ नाटक की पहचान है। आंदोलनों से ऊर्जा लेना व अपनी कला द्वारा आंदोलनों को गति देना नुक्कड़ नाटक की खासियत है। नुक्कड़ नाटकों का जन्म ही जन आंदोलनों से जुड़ी कला विधा के रूप में नाटक को जनता तक पहुंचाने की जरूरत के रूप में हुआ।
सत्ता और मौजूदा व्यवस्था पर प्रहार, चुटीले व्यंग्य के पुट, चुस्त व छोटे संवाद और गतिशील अभिनय के द्वारा नुक्कड़ नाटक दर्शकों पर अपना प्रभाव छोड़ता है। 70 के दशक में हम जन आंदोलनों का उभार देखते हैं और यही वह उर्वर जमीन है, जिस पर नुक्कड़ नाटकों का आंदोलन परवान चढ़ा। इस कला विधा ने शोषक सत्ता, तंत्र, भ्रष्ट राजनीति व नेता, पुलिस को अपना निशाना बनाया। इसीलिए कलाकारों को मालिकों, नेताओं, उनके गुंडों और पुलिस के हमले का शिकार होना पड़ा। करीब दो दशक पहले 1 जनवरी 1989 को साहिबाबाद-गाजियाबाद में नुक्कड़ नाटक ‘हल्ला बोल’ का मंचन करते समय राजनीतिक गुंडों द्वारा सफदर हाशमी और उनके एक कलाकार साथी की हत्या कर दी गई थी। तबसे सफदर शहादतों की परम्परा के ऐसे नायक बनकर उभरे हैं, जिनसे नुक्कड़ नाटक के कलाकार आज भी प्रेरणा लेते हैं।
जहां तक लखनऊ की बात है, यहां नुक्कड़ नाटकों की शुरुआत इमरजेंसी के ठीक बाद हो गई थी। शहर में कई संस्थाएं थीं, जो नुक्कड़ नाटक करती थीं। कलम, साटनाप, नवचेतना, जन संस्कृति मंच, इप्टा, मशाल आदि नाट्य संस्थाएं अस्तित्व में आईं और ‘मशीन’, ‘औरत’, ‘इंकलाब जिंदाबाद’, ‘जनता पागल हो गई है’, ‘रंगा सियार’, ‘हल्ला बोल’, ‘समरथ को नहिं दोष गोसाईं’ जैसे दर्जनों नाटक मंचित हुए। शहर का शायद ही कोई चौराहा, मजदूर बस्ती, फैक्टरी गेट या मोहल्ला बचा हो, जहां नुक्कड़ नाटक न हुए हों। लखनऊ में भी कलाकारों को दमन का सामना करना पड़ा। भगत सिंह शहादत दिवस की 50 वीं वषर्गांठ के अवसर पर 1981 में ‘नवचेतना’ के कलाकारों - आदियोग, कुमार सौवीर, सुप्रिय लखनपाल आदि के सीने पर निशातगंज में पुलिस के सिपाही ने भरी बंदूक की नाल रख दी थी। ‘नवचेतना’ के कलाकार गुरुशरण सिंह द्वारा शहीद भगत सिंह के जीवन और विचारधारा पर लिखा नाटक ‘इंकलाब जिंदाबाद’ खेलना चाहते थे। निशातगंज पुलिस की जिद थी कि बिना जिला प्रशासन की अनुमति के वे नाटक नहीं होने देंगे। लेकिन जनता के भारी विरोध के आगे पुलिस को पीछे हटना पड़ा और बड़ी संख्या में लोगों ने उस नाटक को देखा।
इसी तरह एक घटना लखनऊ महोत्सव के दौरान हुई। महफिल संस्था द्वारा आयोजित लघु नाटक समारोह में जब जन संस्कृति मंच के कलाकार ‘जनता पागल हो गई है’ का मंचन कर रहे थे, तत्कालीन लखनऊ पुलिस अधीक्षक ब्रजलाल ने कलाकारों को गिरफ्फ्तार कर लिया। उन्हे रातभर हजरतगंज कोतवाली में रखा गया। उन्हीं दिनों एक घटना स्कूटर्स इंडिया गेट पर हुई थी। वहां के मजदूर आंदोलन के समर्थन में ‘मशाल’ के कलाकार ‘रंगा सियार’ नाटक कर रहे थे। उसी दौरान कुछ विरोधी व अराजक तत्वों द्वारा कलाकारों व दर्शकों पर पथराव किया गया, जिसमें कई कलाकार व दर्शक घायल हो गए। दरअसल, लखनऊ में भी नुक्कड़ नाटकों के प्रदर्शन ने आंदोलन का रूप ले लिया था और 80 से लेकर 90 के बीच यह अत्यंत लोकप्रिय कला माध्यम था, जिसे जनता के बीच अच्छी-खासी लोकप्रियता हासिल थी। इसे नुक्कड़ नाट्य आंदोलन का असर ही कहा जाएगा कि रंगमंच से जुड़े कई कलाकार व निर्देशक भी उन दिनों नुक्कड़ नाटक से जुड़ गए, जिनमें आतमजीत सिंह प्रमुख थे। पर आज नुक्कड़ नाटकों की हालत वैसी नहीं है। कोई आंदोलन नहीं है। यहां सन्नाटा जैसी स्थिति दिखाई पड़ती है। आमतौर पर नुक्कड़ों पर नाटक के नाम पर जो प्रदर्शन हो रहा है, उसका नुक्कड़ नाटक से कुछ भी लेना-देना नहीं है। इस लोकप्रिय कला माध्यम का उपयोग आज सरकारी-गैरसरकारी कम्पनियों व संस्थाओं द्वारा किया जा रहा है, जिनका मकसद अपने उत्पाद व कार्यक्रम का प्रचार करना है। जहां तक सत्ता व्यवस्था के चरित्र की बात है, वह कहीं से भी जन पक्षधर नहीं है, बल्कि और भी जन विरोधी हुआ है। फिर नुक्कड़ नाटक के क्षेत्र में पसरा सन्नाटा क्यों? यह प्रतिबद्ध कलाकारों के समक्ष सवाल भी है और चुनौती भी।


