उज्ज्वल भट्टाचार्या

बंगाल में वामपंथियों ने अगर पहचान और प्रतिनिधित्व के सवाल को ठुकराया, तो उत्तर प्रदेश में पहचान की राजनीति सारी बड़बोलियों के बावजूद एक-एक जाति पर संकुचित रही और आर्थिक-सामाजिक सवालों को पूरी तरह से नकारा गया.

बिहार में अत्यंत आंशिक रूप से इन्हें जोड़ा गया है. हिन्दी क्षेत्र में सिर्फ़ वहीं पर जेंडर के सवाल को छूआ गया है. नतीजा आपके सामने है.

वामपंथियों ने बंगाल में सामाजिक व जातिगत संरचनाओं पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. सिंगुर के बाद समूचे दक्षिण बंगाल में सबसे पहले खेत मज़दूर और छोटे किसान वाममोर्चे से तृणमूल खेमे में गये. ये मुख्यतः अनुसूचित जाति व जनजातियों तथा मुस्लिम समुदाय के थे. धीरे-धीरे मंझले किसान भी जाने लगे. ये ओबीसी और मुस्लिम थे.

बंगाल में बटाईदारों को ज़मीन मिली. एक फ़सल की ज़मीन पर तीन फ़सलें होने लगी. किसानों ने वाममोर्चे को आशीर्वाद के तौर पर लगातार वोट दिया. इस बीच उनकी अगली पीढ़ी आई. ज़मीन तीन-चार हिस्सों में बंट गई. रोज़गार के मौक़े नहीं बनाये गये.

सफलता के दिनों में सोते रहना वाम की दूसरी भयानक ग़लती थी.

प्रतिनिधित्व के सवाल को तो छोड़ ही दिया जाय. सारा प्रादेशिक नेतृत्व सवर्ण था. लेकिन यह सिर्फ़ बंगाल नहीं, सारे देश में वामपंथ की समस्या है.

कामयाबी के दौर में सीपीआईएम का संगठन धड़ल्ले से बढ़ता रहा. गांव की सामाजिक-राजनीतिक संरचना पार्टी संरचना बन गई. सारी सामाजिक कुरीतियां पार्टी संगठन में आ बसीं. पार्टी शाखायें खाप पंचायत की तरह बर्ताव करने लगी. पार्टी अंदर से खोखली हो गई. जब तृणमूल की मार पड़ी तो वह चरमराकर गिर पड़ी.

इस भूस्खलन की वर्गीय पृष्ठभूमि के साथ-साथ जातिगत पृष्ठभूमि को भी समझना ज़रूरी है. सिर्फ़ बंगाल ही नहीं, सारे देश में इन दोनों के बीच समीकरण के बिना सवर्ण सामन्ती पूंजीवादी हमले का मुक़ाबला संभव नहीं है.