लोकेश मालती प्रकाश
भोपाल। शासकीय महारानी लक्ष्मी बाई कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (एम. एल. बी. कॉलेज) की छात्राओं व अभ्यर्थियों ने 7 जुलाई 2014 को एम. एल. बी. कॉलेज की तालाबंदी करके इस महाविद्यालय से स्नातक व स्नातकोत्तर स्तर पर अनेक विषयों के स्थानांतरण के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में शासकीय सरोजिनी नायडू कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (नूतन कॉलेज) की छात्राएं भी शामिल हुईं जिनके महाविद्यालय से भी विभिन्न विषयों को स्थानांतरित किया जा रहा है। छात्राओं ने यह मांग उठाई कि राज्य सरकार न सिर्फ विषयों के स्थानांतरण पर तत्काल रोक लगाए बल्कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा ‘स्वायत्त’ दर्जा प्राप्त इन महाविद्यालयों की स्वायत्तता का भी सम्मान करे।
छात्राओं को अपना पूरा समर्थन देते हुए इस विरोध प्रदर्शन में शिक्षा अधिकार मंच, भोपाल ने भी भागीदारी की। ये छात्राएं शिक्षा अधिकार मंच के साथ मिल कर अपनी मांगें पूरी होने तक सक्रिय आंदोलन चलाएंगी।
शासन की मनमानी के खिलाफ छात्राओं ने अपना पुरजोर विरोध दर्ज कराते हुए कॉलेज के गेट की तालाबंदी कर दी और प्रिंसिपल समेत किसी भी शिक्षिका व अन्य स्टाफ को कालेज के अंदर नहीं जाने दिया। प्रिंसिपल द्वारा छात्राओं पर दबाव डाल कर कॉलेज गेट खुलवाने की कोशिश पूरी तरह नाकाम रही। छात्राओं का उत्साह इतना बुलंद था कि भारी संख्या में पुलिस बल (महिला पुलिस समेत) द्वारा घिरे हुए होने के बावजूद वे बिल्कुल नहीं डरीं और अपनी इस मांग पर अड़ी रही कि मुख्यमंत्री अथवा उच्च शिक्षा मंत्री स्वयं उपस्थित हो कर उनकी मांग को माने। लगभग तीन घंटे के बाद मौके पर पहुंचे एस.डी.एम. ने यह बताया कि उच्च शिक्षा मंत्री से उनकी बात हुई है और उन्होंने इस मसले को सुलझाने के लिए तीन दिन का समय मांगा है। इस आश्वासन पर छात्राओं ने विश्वास करते हुए अंत में गेट से ताला हटाया और यह भी स्पष्ट कर दिया कि अगर तीन दिन में उनकी मांग नहीं मानी जाती है तो वे फिर आंदोलन के रास्ते पर आगे बढ़ेंगी।

भोपाल के सरकारी महाविद्यालयों पर सुनियोजित हमला
गत 4 जून 2014 को मध्य प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने एक आदेश पारित कर भोपाल के सात सरकारी महाविद्यालयों से विभिन्न विषयों को स्थानांतरित कर दिया। इस आदेश के तहत एम.एल.बी कॉलेज से स्नातकोत्तर स्तर के सात और स्नातक स्तर के चार विषयों को दूसरे महाविद्यालयों में स्थानांतरित कर दिया गया। इसी प्रकार नूतन कॉलेज से भी स्नातक व स्नातकोत्तर स्तर पर लगभग दस विषयों को स्थानांतरित किया गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार अन्य शासकीय महाविद्यालयों से भी अनेक विषय स्थानांतरित किए गए हैं। शासन ने इस आदेश में यह तर्क दिया है कि यह कदम इसलिए उठाया जा रहा है क्योंकि इन महाविद्यालयों में संबंधित विषयों में विद्यार्थियों की संख्या “नगण्य” है। दूसरा तर्क यह है कि इस “युक्तियुक्तकरण” (रैशनलाइज़ेशन) के माध्यम से शिक्षक-विद्यार्थी अनुपात को ठीक करके इन महाविद्यालयों को “उत्कृष्टता केंद्र” के रूप में मान्यता दी जाएगी।
शासन के ये तर्क न सिर्फ विसंगतिपूर्ण हैं बल्कि विद्यार्थियों की संख्या के बारे में यह दावा कि वह “नगण्य” है एक सफ़ेद झूठ है। हमारे पास एम.एल.बी कॉलेज में दाखिल बच्चों के पिछले पांच साल के रिकार्ड हैं जिससे यह पता चलता है कि स्थानांतरित किए जाने वाले विषयों में छात्राओं की पर्याप्त संख्या तो है ही कुछेक में तो यह इन वर्षों में बढ़ी ही है (देखें संलग्नक)। जहां तक “युक्तियुक्तकरण” के पश्चात इन महाविद्यालयों को “उत्कृष्टता केंद्र” बनाने की बात है तो यह सर्वविदित तथ्य है कि स्नातकोत्तर विषयों के अध्यापन से किसी भी संस्थान में शिक्षा का स्तर बढ़ता है। ऐसे में अगर एम.एल.बी कॉलेज से स्नातकोत्तर स्तर के विषय हटाए जाएंगे तो इस कॉलेज की “उत्कृष्टता” बढ़ेगी या घटेगी? ज्ञातव्य हो कि जिन विषयों को हटाया जा रहा है उनमें से कुछ में यहां शोध भी होता है। हटाए जाने वाले वनस्पतिशास्त्र और समाजशास्त्र जैसे विषयों में तो विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी) द्वारा प्रायोजित शोध हो रहे हैं। ऐसे में शासन का आदेश इन शोध-स्तरीय पाठ्यक्रमों को हटा कर इस महाविद्यालय का स्तर अच्छा करने करने की दिशा में है या इससे उलट इस महाविद्यालय के अकादमिक स्तर को गिराने की दिशा में?
इससे जुड़ा हुआ दूसरा मुद्दा यह है कि एम.एल.बी कॉलेज व नूतन कॉलेज को यू.जी.सी. द्वारा विधिवत ‘स्वशासी’ महाविद्यालय की मान्यता मिली हुई है। आयोग के नियमों के तहत स्वशासी महाविद्यालय को दाखिले की प्रक्रिया, परीक्षा, पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्या का निर्धारण स्वयं करने का प्राधिकार प्राप्त है। ऐसे में उच्च शिक्षा विभाग द्वारा परित आदेश महाविद्यालय के ‘स्वशासी’ दर्जे का उल्लंघन करता है और यू.जी.सी. के नियमों का खुला माखौल उड़ाता है।

लड़कियों के लिए सरकार बंद कर रही उच्च शिक्षा के दरवाजे
राज्य सरकार के इस मनमानीपूर्ण आदेश का एक और पक्ष है। एम.एल.बी कॉलेज की ज्यादातर छात्राएं अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े या कम-आय वर्ग के परिवारों से आती हैं। इन छात्राओं ने यह बताया कि अगर उच्च शिक्षा का यह केंद्र इनके घरों के पास और इनके अभिभावकों की आर्थिक हैसियत की पहुंच में नहीं होगा तो इनकी शिक्षा बंद हो जाएगी। हम यह भी बता दें कि एक दशक पहले जब इस महाविद्यालय को इसी सरकार ने पुराने भोपाल से हटा कर इसके वर्तमान स्थान पर स्थानांतरित किया था तो अनेक मुस्लिम व गरीब बालिकाओं के लिए उच्च शिक्षा का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया था। अब एक बार फ़िर अगर (कुछ विषयों का) स्थानांतरण होता है तो बहुत सारी छात्राएं शिक्षा से वंचित हो जाएंगी। यह स्थिति बहुत सारे सवालों को जन्म देती है। अपने आप को बालिकाओं के “मामा” कहने वाले मुख्यमंत्री इन बालिकाओं की शिक्षा की फ़िक्र आखिर कब करेंगे? या ऐसा करने की इनकी मंशा भी है कि नहीं? अगर वास्तव में लड़कियों की शिक्षा से सरकार का कोई भी सरोकार है तो भोपाल में बालिकाओं के लिए और भी ज्यादा संख्या में सरकारी महाविद्यालय खोलने की बजाय सरकार मौजूदा महाविद्यालयों को बरबाद करने पर क्यों अमादा है?

आखिर सरकार का मकसद क्या है?
ज़ाहिर बात है कि इन महाविद्यालयों के अकादमिक स्तर को गिरा कर इन्हें “उत्कृष्टता केंद्र” घोषित करने का दावा महज एक छलावा है। सरकार का असल मकसद इन महाविद्यालयों के अकादमिक स्तर को क्रमशः गिरा कर भोपाल ही नहीं वरन प्रदेश-स्तर पर स्थापित इनकी विश्वसनीयता को ध्वस्त करना है। उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने की सरकार की खुली घोषणाएं इसी शर्त पर पूरी हो सकती हैं कि पहले से स्थापित सरकारी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों को धीरे-धीरे खस्ताहाल कर इन्हे बरबाद कर दिया जाए ताकि आम जनमानस में इनके लिए कोई इज्जत न रहे और अंततः इन सरकारी संस्थानों को या तो बंद किया जा सके या निजी हाथों में सौंपा जा सके। हमारी यह बात केवल कोरा दावा नहीं है। देश की सरकारी स्कूल व्यवस्था के साथ यह खेल खेला जा चुका है। इसी के चलते आज स्कूली शिक्षा में निजी क्षेत्र पूरी तरह हावी है और यह लूट व मुनाफ़े का बेहद आसान व बड़ा जरिया बन चुकी है।
उच्च शिक्षा में तमाम कोशिशों के बावजूद सरकारी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों की गरिमा व विश्वसनीयता बरकरार है। यह सही है कि पिछले बीस-पच्चीस सालों में इस विश्वसनीयता पर बट्टा लगाने के लिए सरकारों ने खूब खेल खेले हैं – सरकारी अनुदान में कटौती, शिक्षकों की भर्ती में मानदंडों से खिलवाड़, नियमित शिक्षकों व कर्मचारियों की जगह ठेके पर भर्ती करना, पुस्तकालय व प्रयोगशालाओं के लिए अनुदान में कटौती, स्व-वित्त पोषित पाठ्यक्रमों की शुरूआत, छात्र संघों पर पाबंदी, शिक्षक व कर्मचारी संघों में फूट डालने की कवायदें आदि। लेकिन इसके बावजूद उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र पूरी तरह हावी नहीं हो पा रहा है। इसीलिए उच्च शिक्षा को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिए तेजी से हमले किए जा रहे हैं। उच्च शिक्षा विभाग का उपरोक्त आदेश इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।

क्या है आगे का रास्ता?
एम.एल.बी कॉलेज व नूतन कॉलेज की छात्राओं ने अपने कॉलेजों पर हुए हमले के खिलाफ़ आवाज़ उठा कर भोपाल और पूरे प्रदेश की जनता को स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर हमें अपने शिक्षा के हक को सुरक्षित रखना है तो सरकारी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों पर हो रहे हमलों के खिलाफ एकजुट लड़ाई लड़नी होगी। आज हमने शुरूआत कुछ महाविद्यालयों के कुछ विषयों को हटाए जाने के खिलाफ आवाज़ उठा कर की है लेकिन कल हमें दूसरे महाविद्यालयों से संबंधित दूसरे मुद्दों को भी उठाना होगा। यह समझने की सख्त जरूरत है कि यह मसला केवल कुछ विषयों का नहीं है। यह लड़कियों, दलितों, अल्पसंख्यकों, पिछड़े वर्गों, आदिवासियों की शिक्षा का मामला है और उससे आगे ये पूरी उच्च शिक्षा को बचाने का मसला है। यह याद रखना होगा कि आज़ादी के पिछले साठ सालों से भी ज्यादा समय से हम सब शिक्षा के अधिकार से वंचित रखे गए हैं – चाहे वह स्कूली शिक्षा हो या उच्च शिक्षा। एक तरफ सरकारें शिक्षा अधिकार की बातें करती हैं तो दूसरी तरफ हर स्तर पर सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बरबाद और बदनाम करती हैं और साथ ही निजी क्षेत्र को बढ़ावा देकर हमे अपने हक को बाजार से ऊंचे दामों पर खरीदने के लिए मजबूर करती हैं।
अब सवाल यह है कि क्या भोपाल के प्रबुद्ध नागरिक, कामकाजी लोग और कॉलेजों व विश्वविद्यालयों के तमाम शिक्षक क्या इन छात्राओं की लड़ाई में आगे आएंगे या मूक दर्शक बने रहेंगे? इस वक्त का तकाज़ा है कि हम सब एम.एल.बी कॉलेज व नूतन कॉलेज की छात्राओं की लड़ाई को अपना सक्रिय सहयोग दें और अपने सरकारी महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों को बचाने के लिए मुखर होकर आवाज उठाएं।