सरकारी स्कूल और न्यायालय
सरकारी स्कूल और न्यायालय
सरकारी स्कूल और न्यायालय
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक निर्णय से देश के सरकारी स्कूलों की स्थिति पर चर्चा ने ज़ोर पकड़ लिया। न्यायालय ने सरकारी स्कूलों की स्थिति को सुधारने की दिशा में दिये अपने एक निर्णय में कहा कि राज्य के सभी कर्मचारी, चुने हुए जनप्रतिनिधि, न्यायालयों से जुड़े सदस्य तथा वे सभी व्यक्ति जो राज्य सरकार अथवा सार्वजनिक कोष से पोषित हैं, अपने बच्चों का नामांकन राज्य शिक्षा आयोग द्वारा चलाये जा रहे प्राथमिक विद्यालयों में करवाएँ। ऐसा न करने पर दंड का भी प्रावधान दिया गया। इसमें प्रोन्नति रोकने एवं प्राइवेट स्कूल में अदा की जाने वाली फीस के बराबर धन सरकारी खाते में जमा करने के साथ ही इसे समयसीमा के भीतर क्रियान्वित करने का निर्देश भी राज्य सरकार को दिया गया।
इस निर्णय के पीछे एक सीधी धारणा है,कि सत्तासीन वर्ग के बच्चे सरकारी स्कूलों मे पढ़ेंगे तो वहाँ के शैक्षिक स्तर में भी उन्नति होगी। आज यह सामान्य धारणा है, कि सरकारी प्राथमिक या उच्च प्राथमिक विद्यालयों में समाज के हाशिये पर पड़े परिवारों के ही बच्चे पढ़ते हैं। पिछले लगभग 20 सालों में यह धारणा न सिर्फ बलवती हुई, बल्कि वास्तविक रूप से सत्य भी साबित हुई।
इस निर्णय के माध्यम से यह उम्मीद की गई कि जब अभिजनों के बच्चे इन स्कूलों में पढ़ेंगे तो निश्चित अपने प्रभाव से इसे प्राइवेट स्कूलों के समकक्ष खड़ा करने का प्रयास करेंगे। न्यायालय का यह आदेश वास्तव में सामाज में व्याप्त विषमता की बढ़ती खाई को पाटने का एक प्रयास है, जहां वर्गीय असमानता इतनी तीखी होती जा रही है,कि इसे खुली व्यवस्था की विशेषता कहकर अनदेखा नहीं किया जा सकता। कुछ एक अपवादों को छोड़कर यह वर्गीय असमानता भी जाति व्यवस्था की तरह परम्परागत एवं पैतृक हो चुकी है। अब यहाँ भी गुंजाइश नहीं रही।
एक क्रांतिकारी निर्णय होने के बावजूद भी इसके क्रियान्वयन में बड़ा संदेह है। न्यायालय अपना निर्णय उपलब्ध तथ्य के आधार पर देता है, लेकिन सरकारी स्कूलों में अनिवार्य नामांकन संबन्धित निर्णय में भावनात्मक समावेश की अधिकता है। यह निर्णय कतई व्यावहारिक नहीं है। इसे शीर्ष अदालतों में चुनौती दे दी जाएगी। समाज सिर्फ सरकारी नौकरों, न्यायपालिका से जुड़े लोगों, जनप्रतिनिधियों एवं राज्य से परितोषिक प्राप्त लोगों से नहीं बना है। इसमें औरों की भी बड़ी संख्या है, जो केंद्र सरकार, निजी क्षेत्र एवं व्यावसायिक गतिविधियों में इनसे कहीं अधिक सुख-सुविधा प्राप्त एवं धनिक लोग हैं।
इस निर्णय के क्रियान्वित होने से कहीं न कहीं सरकारी व्यवस्था से सम्बद्ध लोग ठगा महसूस करेंगे जब उनके बच्चे सरकारी स्कूलों, जिसकी स्थिति में इनके नामांकन के फलस्वरूप भविष्य में सुधरने की भविष्यवाणी है, में पढ़ेंगे और बाकी अभिजनों की सन्तानें स्तरीय पाठ्यक्रम का लाभ उठाएंगी। प्रतियोगिता के असीमित संघर्ष के युग में एक छोटी सी चूक भी किसी परिवार और उसके बच्चे की उम्मीदों का गला घोंट सकती है। उदाहरण के लिए हम समझ सकते हैं कि कैसे कोई विद्यार्थी हिन्दी भाषी क्षेत्र के इन सरकारी स्कूलों से नगरीय शिक्षा की चकाचौंध से निकले लोगों से प्रतियोगिता करने मे बेबस हो जाता है।
इस निर्णय की अपेक्षा निजी पब्लिक स्कूलों में गरीब बच्चों कि निश्चित मात्रा में दाखिला करने का अदालती आदेश कहीं अधिक महत्वपूर्ण था, लेकिन अफसोस कि अभी तक ढंग से क्रियान्वित नहीं हो पाया।
समाज के जिम्मेदार लोगों को अब ये प्रयास करना होगा कि कोई न्यायालय क्यों ना देश में मौजूद समस्त विद्यालयों के न सिर्फ पाठ्यक्रम(सिलेबस) बल्कि पूरी पाठ्यचर्या(करीकुलम) को समान करने का आदेश निर्गत करे! शिक्षा और मूल्यांकन की प्रणाली एक हो। भाषा को राजनीति से जोड़कर लाखों युवाओं के भविष्य के साथ होने वाले खिलवाड़ को बंद कर पढ़ाई के माध्यम की एक अनिवार्य भाषा हो।
शिक्षा एक लाभकारी धंधा हो गया है, जहां पूंजी निवेशक होड़ लगा रहे हैं। निजीकरण और उदारीकरण की नीति का सबसे बड़ा प्रभाव शिक्षा पर ही पड़ा है। इससे शिक्षा का स्तर बढ़ा है। यह सकारात्मक है उन लोगों के लिए जिनके पास आर्थिक संसाधन है। लेकिन, निजीकरण कि आँधी का सबसे बुरा असर आर्थिक रूप से कमजोर और सामान्य वर्गों पर पड़ा है, जो अपने बच्चों का खर्च एक सीमा तक ही वहन कर सकते हैं और उनमें से भी अधिकांश सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। प्राइवेट पब्लिक स्कूलों में एक चौथाई बच्चों का निशुल्क नामांकन और खर्च वहन अनिवार्य करना होगा जिनके चयन का आधार आर्थिक अक्षमता और योग्यता हो तथा समस्त स्कूलों की पाठ्यचर्या के साथ भाषा को समान करना होगा तभी समाज में शिक्षा की स्थिति सुधरेगी और न्यायपूर्ण प्रतियोगिता संभव हो सकेगी।
डॉ. मनीष पाण्डेय


