बाजार के निशाने पर अब गांव
-सुनील अमर
इस सच्चाई के बावजूद कि गांवों में विकट बेकारी और गरीबी है, बड़ी-बड़ी कम्पनियों का मानना है कि जीवनयापन तो वहां भी हो ही रहा है। यही वह दर्शन है जो इन कम्पनियों को उन गांवों की तरफ ले जा रहा है जहां भारत की तीन-चौथाई आबादी अभी भी बसती है।
दैनिक उपभोग की वस्तुएं बनाने वाली एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के बड़े अधिकारी बताते हैं कि सिर्फउ.प्र. के गांवों से होने वाला व्यवसाय लगभग तीन लाख करोड़ रुपया प्रतिवर्ष से अधिक का है। वे यह भी बताते हैं कि जब से वस्तुओं का पाउच और शैसे संस्करण आने लगा, बिक्री में जबर्दस्त उछाल आ गया और उन वस्तुओं की बिक्री भी होने लगी है जिनके बारे में कभी सोचा भी नहीं गया था कि ये भी गांवों में बिक सकती हैं।
देश के गांव इन दिनों कई तरह से बाजार के फोकस पर हैं। घरेलू उपयोग की वस्तुएं बनाने वाली बड़ी-बड़ी कम्पनियों को अगर वहां अपनी बाजारु संभावनाएं दिख रही हैं, तो बिल्कुल शहरी व्यवसाय माने जाने वाले बीपीओ क्षेत्र ने भी अब गांवों की तरफ रुख कर लिया है। सरकार अगर देश के प्रत्येक गांव में बैंक शाखाएं खोलने की अपनी प्रतिबद्धता जाहिर कर चुकी है तो आईटी सेक्टर ने भी घोषणा की है कि गांवों के इलेक्ट्रानिकीकरण बगैर देश का त्वरित विकास संभव नहीं है।

पत्थर से भी पानी निचोड़ने की कला
पूंजीवादी व्यवस्था के बारे में कहा जाता है कि यह पत्थर से भी पानी निचोड़ने की कला जानती है और किसी क्षेत्र को अगर इसने उपेक्षित कर रखा है तो यह मान लेना चाहिए कि वहां किसी भी तरह के आर्थिक-दोहन की संभावनाएं बची ही नहीं है। इस व्यवस्था की नज़र-ए-इनायत अगर गांवों पर हुई है तो इसका अर्थ है कि अब यह बालू से तेल निकालने का खेल शुरु करेगी।
पिछले कुछ वर्षों में हुई सरकारी घोषणाओं से ही यह शक होने लगा था कि सरकार को गांवों की एकाएक हुई चिन्ता अनायास नहीं हो सकती। जैसे जब देश के प्रत्येक गांव में एक अदद डाकखाना होने के बावजूद अगर सरकार को वहां बैंकों की जरूरत बड़ी शिद्दत से महसूस होने लगी तो इसका अर्थ यही है कि वहां बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के चरण पड़ने ही वाले हैं, जिनका काम कोर बैंकिंग सर्विस यानी सीबीएस सुविधा के बगैर हो नहीं सकता। और यह जरूरत सरकार को इस तथ्य के बावजूद हो रही है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों में काम कर रही सरकारी बैंकों की शाखाओं में आधे से भी अधिक खाते निष्क्रिय ही पड़े रहते है।
इस सच्चाई के बावजूद कि गांवों में विकट बेकारी और गरीबी है, बड़ी-बड़ी कम्पनियों का मानना है कि जीवनयापन तो वहां भी हो ही रहा है। यही वह दर्शन है जो इन कम्पनियों को उन गांवों की तरफ ले जा रहा है जहां भारत की तीन-चौथाई आबादी अभी भी बसती है।
दैनिक उपभोग की वस्तुएं बनाने वाली एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी के बड़े अधिकारी बताते हैं कि सिर्फ उ.प्र. के गांवों से होने वाला व्यवसाय लगभग तीन लाख करोड़ रुपया प्रतिवर्ष से अधिक का है। वे यह भी बताते हैं कि जब से वस्तुओं का पाउच और शैसे संस्करण आने लगा, बिक्री में जबर्दस्त उछाल आ गया और उन वस्तुओं की बिक्री भी होने लगी है जिनके बारे में कभी सोचा भी नहीं गया था कि ये भी गांवों में बिक सकती हैं। शैम्पू, मैगी, हेयर डाई, मेंहदी, ब्यूटी क्रीम, कॉफी, चाय पत्ती, नमकीन, नूडल्स, पान मसाला, वॉशिंग पावडर, पिसा मसाला, गरज ये कि घरेलू उपभोग से लेकर सौन्दर्य प्रसाधन तक की तमाम सामग्रियां आज एक रुपये से लेकर चार-पांच रुपये के अत्यन्त आकर्षक पैकेटों में गली-गली की दुकानों पर उपलब्ध हैं और इनकी अच्छी खासी बिक्री हो रही है।

कभी सोचा गया था कि टूथपेस्ट भी पाउच में मिल सकता है?
जरूरत के सामानों की बिक्री हो रही है तो इसमें आपत्तिजनक कुछ भी नहीं है लेकिन असल मायाजाल तो इसके पीछे छिपा हुआ है, जब गैरजरूरत की वस्तुएं भी बच्चों से लेकर बड़ों तक को ललचाकर उन्हें अपना स्थायी ग्राहक बना लेती हैं। दो-चार रुपये में उपलब्ध होने के कारण लोग अपनी अन्य जरूरतों में कटौती करके इनकी खरीदारी करते हैं, जिससे उनका अत्यन्त सीमित दैनिक बजट उल्टा-पुल्टा हो जाता है।
इसका सबसे बुरा असर तो बच्चों पर पड़ रहा है जो प्राय: ही पटरी-पेन्सिल या कापी खरीदने के लिए मिले पैसे में से कटौती करके तमाम तरह के चूरन-चटनी, च्युइंगगम आदि खरीद लेते हैं। यह वैसे ही है जैसे स्व-रोजगार करने के लिए किसी गरीब व्यक्ति को मिले सरकारी सहायता के धन को अन्य कार्यों पर खर्च कर देना।
वास्तव में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के गांव की तरफ रुख करने का मन्तव्य भी यही है। हम देख ही रहे हैं कि गांवों में खुले शराब के ठेके पर किस तरह लोग दवा के पैसे तक खर्च कर देते हैं और इसका प्रतिरोध करने वाली घर की औरत को कितने प्रकार के जुल्मों को सहना पड़ता है। गांव की दुकानों पर लटके सामान के पाउचों को एक निगाह देखकर ही जाना जा सकता है कि सिर्फ 70 रुपये दैनिक पारिवारिक आय (यह आकलन भी सरकार का ही है) वालों के लिए इसकी खरीदारी करना परिवार को किस संकट पर खड़ा कर देता होगा।

लेकिन यह बिक्री जोर-शोर से होती रहे इसके लिए गांव वालों के पास क्रय शक्ति भी होनी चाहिए।
अब बीपीओ यानी बिजनेस प्रॉसेस आउटसोर्स जैसे निहायत शहरी धंधे को गांव का रुख कराया जा रहा है। देश के अग्रणी उद्यमी संगठन 'नास्कॉम' ने कुछ वर्ष पहले एक रिपोर्ट जारी की थी।
'स्ट्रैटेजिक रिव्यू 2011' नामक इस रिपोर्ट में कहा गया था कि शहरों में बीपीओ का काम कराना बहुत खर्चीला होता जा रहा है, जबकि इसके विपरीत अगर गांव के पढ़े-लिखे युवाओं से यही काम कराया जाय तो लागत काफी कम हो जाएगी।
कई बीपीओ कम्पनियों ने देश के दक्षिणी राज्यों में ऐसे कार्यों को शुरु किया है, जिसमें फाइनेंस, एकाउन्टिंग, कॉल सेन्टर, इंजीनियरिंग, डाटा मैनेजमेंट तथा मेडिकल सर्विस आदि कार्य शामिल हैं। कर्नाटक में इस तरह के प्रयोगों का सार्थक असर दिखा है।
नास्कॉम का कहना है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, यूटीलिटी, हेल्थकेयर व रिटेल सेक्टर आदि कार्यो में गांवों में काफी संभावनाएं हैं और इनके मार्फत ग्रामीण युवाओं को रोजगार मुहैया कराये जा सकते हैं।

निश्चित ही यह कार्य प्रशंसनीय है और यह अगर सलीके और संतुलित ढंग से किया गया तो गांवों की तस्वीर बदल सकता है।
लेकिन यहां सवाल सरकार की नीयत का आता है कि वह पहले गांव का विकास चाहती है या बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का भला?
देश के गांवों में सस्ता और पर्याप्त श्रम आज भी मौजूद है। इसमें पढ़े-लिखे युवा भी हैं। पूंजी के धंधेबाज यह जानते हैं कि उन्हें फायदा कहां से हो सकता है। इस प्रकार अगर यह बाजारी व्यवस्था की मांग है कि अब गांव चला जाय तो वह वहां पहुंचेगी ही।
अब यहां जिम्मेदारी सरकार की आ जाती है कि गांव में वही रोजगार पहुंचे जो वहां असंतुलन न पैदा करें। मसलन रिटेल चेन और मॉल कल्चर गांवों के लिए खतरनाक है क्योंकि इससे वे करोड़ों लोग भुखमरी के कगार पर आ जायेंगें जो छोटी-मोटी दुकान, ठेला-रेहड़ी या फुटपाथ पर बैठकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हैं।

नास्कॉम ने गांवों में अपनी संभावनाओं में रिटेल सेक्टर को भी रखा है, इसे भूलना नहीं चाहिए।
हो सकता है कि यह ऊपर गिनाए गये रोजगार की तमाम संभावनाओं के पीछे छिपता हुआ आए। आखिर सरकार पर भी तो लम्बे अरसे से रिटेल सेक्टर को मंजूरी देने का अंतरराष्ट्रीय दबाव है।
साभार देशबन्धु
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