सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले राम मंदिर का निर्माण सम्भव नहीं, संसद संविधान से ऊपर नहीं
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले राम मंदिर का निर्माण सम्भव नहीं, संसद संविधान से ऊपर नहीं
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले राम मंदिर का निर्माण सम्भव नहीं, संसद संविधान से ऊपर नहीं
Ram temple is not possible before Supreme Court verdict, Parliament is not above constitution
देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को संसद भी नहीं बदल सकती
संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं के संवैधानिक मर्यादाएं तोड़ते बयान
योगी जी, गिरिराज किशोर आदि अपनी शपथ का ध्यान रखें
जैसे-जैसे पांच राज्यों की विधान सभाओं और फिर आम चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं संघ परिवार और भाजपा नेताओं में माथों पर चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। डीजल पेट्रोल रसोई गैस की आसमान छूती कीमतें रुपया का गिरता मूल्य किसानों की आत्महत्या कारोबार की बर्बादी बढ़ती बेरोज़गारी आदि मुद्दों पर भाजपा सरकारों के पास बोलने के लिए कुछ है नहीं, वह जनता को पिछली बार की तरह नए सपने भी दिखाने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि जनता पिछले वादों का हिसाब मांग रही है, अपने खातों में 15-15 लाख रुपया मांग रही है, दो करोड़ प्रति वर्ष के हिसाब से रोज़गार मांग रही है, किसान अपनी उपज पर लागत का पचास प्रतिशत मुनाफ़ा मांग रहे हैं, कारोबारी अपने बंद होते कारोबार को दोबारा पटरी पर लाने के जतन पूछ रहा है, ऐसे में चुनाव जीतने के लिए भाजपा के पास पाकिस्तान, मुसलमान, श्मशान, कब्रिस्तान और सब से बड़ा ट्रम्प कार्ड अयोध्या में राम मंदिर ही रह जाता है, जिसके सहारे वह एक बार फिर जनता का भावनात्मक शोषण कर के सत्ता हथियाना चाहती हैI
संघ प्रमुख मोहन भागवत से ले कर संघ और भाजपा का हर छोटा बड़ा नेता राम मंदिर का राग अलाप रहा है, हालांकि यह सब बयान बाज़ी असंवैधानिक और गैर कानूनी है, लेकिन मोहन भागवत आदि चूँकि कोई संवैधानिक पद पर नहीं हैं, इसलिए उनके बयानों को नज़रंदाज़ किया जा सकता है, लेकिन जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ, केन्द्रीय मंत्री गिरिराज किशोर और अन्य नेता गण, जिन्होंने संविधान की शपथ ले कर तमाम संवैधानिक पद हासिल किये हैं, वह असंवैधानिक और गैर कानूनी बातें करने लगें तो उनसे अवश्य पूछा जाना चाहिए कि आपने संविधान की शपथ क्या सिर्फ खानापूरी के लिए ली थी या आपको अपनी शपथ और उसकी मर्यादा व गरिमा का कुछ लिहाज़ भीहै!
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, जिनके राज्य में वह विवाद है, उन्होंने कहा है कि अब हमें राम मंदिर के निर्माण की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। राज्य सभा के सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा है कि जनवरी में राम मंदिर निर्माण का काम शुरू हो जाएगा। केन्द्रीय मंत्री गिरीराज किशोर भी किसी से पीछे नहीं हैं। यह सब संवैधानिक पदों पर बैठे नेतागण इन्हें पता है कि उक्त विवाद सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और जब तक वहां से कोई फैसला नहीं आ जाता, वहां एक ईंट भी नहीं रखी जा सकतीI
जो लोग राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाने की बात करते हैं वह भली भाँति जानते हैं कि जब कोई मामला अदालत में विचाराधीन हो तो उस पर उस समय तक अध्यादेश नहीं लाया जा सकता जब तक उसका निर्णय न हो जाए। यह सब जानते हुए भी वह केवल आम हिन्दू जन मानस का भावनात्मक शोषण करके उनका वोट हासिल करने के लिए ऐसे बयान देते रहते हैंI
इसी प्रकार बार-बार यह भी कहा जा रहा है कि सोमनाथ मंदिर की तरह कानून बना के राम मंदिर बनाया जाए। जो लोग यह कह रहे हैं वह भूल जाते कि सोमनाथ में मंदिर निर्माण के लिए कोई विवाद नहीं था, न कोई दूसरा पक्षकार। जबकि राम मंदिर का मुकदमा जिला अदालत से होता हुआ सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच चुका है और उसके निर्णय के बाद ही कोई अगला कदम उठाया जा सकता हैI
कहते हैं कि जनहित के तहत वह विवादित स्थल सरकार अपने कब्जे में ले कर उसे राम मंदिर निर्माण के लिए दे दे। लेकिन यह भूल जाते हैं कि जनहित सड़क, अस्पताल, स्कूल आदि के निर्माण के लिए होता है, एक वर्ग की इबादतगाह की ज़मीन सरकार अपने कब्जे में ले कर दूसरे वर्ग की पूजा स्थल के निर्माण के लिए कैसे दे सकती है। यह देश के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है और संविधान इसकी इजाज़त नहीं देता। अगर ऐसा कोई कानून बना या अध्यादेश जारी हुआ तो सर्वोच्च न्यायालय पहली ही सुनवाई में उसे ख़ारिज कर देगा। यह बात अलग है कि भाजपा इसका सियासी फायदा उठाने की पूरी कोशिश करेगी भले ही इससे देश का समाजी ताना बाना, जो मोदी सरकार पहले ही तहस नहस कर चुकी है और बिखर जाएI
संविधान की आत्मा है धर्मनिरपेक्षता
1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने भाजपा की मध्य प्रदेश, राजस्थान सरकार को बर्खास्त कर दिया। इसके खिलाफ जब बीजेपी अदालत गयी तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस बर्खास्तगी को उचित ठहराते हुए कहा था की धर्मनिरपेक्षता संविधान की आत्मा है इससे खिलवाड़ की इजाज़त किसी को नहीं दी जा सकती। इसके अलावा भी कई और फैसलों में सर्वोच्च न्यायालय साफ़ कह चुका है कि धर्मनिरपेक्षता संविधान के बुनियादी ढाँचे का हिस्सा है, जिसे संसद भी समाप्त नहीं कर सकती अर्थात लोक सभा में किसी पार्टी को चाहे जितना बड़ा जनमत मिला हो और उसके सदस्यों की संख्या चाहे जितनी हो वह संविधान के बुनियादी ढांचे को नहीं बदल सकती। फिर किस कानून के तहत वहां कानून बना के या अध्यादेश ला कर एक वर्ग के पूजा स्थल को जबरी ले कर दूसरे वर्ग को दिया जा सकता है ?
हाँ एक रास्ता है उत्तर प्रदेश के पहले भाजपाई मुख्य मंत्री कल्याण सिंह का दिखाया हुआ, जिन्होंने अयोध्या में बाबरी मस्जिद की सुरक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय में एक दो नहीं छ-छ हलफनामे दाखिल कर के भी मस्जिद गिरवा दी थी और शाम को इस्तीफ़ा दे दिया क्योंकि हलफनामे की पाबंदी नहीं कर पाए। अगर सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें उस समय उनके जुर्म के अनुसार कड़ी सज़ा दी होती तो शायद आज के इन बयानवीरों को कानून का कुछ डर होता।
जो संवैधानिक पदों पर होते हुए भी संविधान की बखिया उधेड़ रहे हैं उन्हें न संवैधानिक मर्यादाओं का ध्यान है और न ही कानून का डरI
आवश्यकता है कि एक जनहित याचिका या अन्य किसी माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इन बयान वीरों और मीडिया विशेष कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इस मुद्दे पर होने वाली बहसों पर उस समय तक पाबंदी लगवा दी जाए, जब तक अदालत इसका फैसला नहीं कर देती क्योंकि मुख्यमंत्री केन्द्रीय मंत्रियों, सांसदों, विधायकों आदि के इस मुद्दे पर एक तरफा बयान संवैधानिक मान्यताओं के खिलाफ हैं और एक वर्ग में डर खौफ और देश की संवैधानिक व्यवस्था पर शक पैदा करने वाले हैं जो देश और न्याय के हित में नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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