सहारनपुर में दलितों के साथ जो कुछ हुआ, वो तो अगले पांच हज़ार साल और होना है..क्योंकि
सहारनपुर में दलितों के साथ जो कुछ हुआ, वो तो अगले पांच हज़ार साल और होना है..क्योंकि
कहीं कुछ नहीं बदला, ईश्वर भी...
राजीव मित्तल
सहारनपुर में दलितों के साथ जो कुछ हुआ, वो तो अगले पांच हज़ार साल और होना है..क्योंकि हिन्दू सवर्ण चांद या मंगल ग्रह में बसने के दौरान एक चमर टोला ज़रूर बसाएगा, ताकि जब तब वहां आग लगा सके या अपनी तनी शिरायें ढीली कर सके..
कुछ नहीं बदला, नहीं बदले हमारे गांव
है वही पंडा, वही मंदिर
गजब है
मूर्ति पूजन का न हक तब था न अब है
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कवि श्यामलाल शमी को भी पता है कि सहारनपुर या देश के किसी भी दलित टोले से उठ रहीं ये सिसकियां और यह आक्रोश एक दिन के किये धरे का नतीजा नहीं है, यह सदियों पुराना वह खेल है जो आज भी गांव-देहात में उन्हीं की शर्तों पर खेला जा रहा है क्योंकि उनके पिंजरों में तोता-मैना के साथ-साथ दलितों का कल, उससे पहले का कल, उससे भी पहले का कल और आज और आने वाले तमाम दिन कैद थे और कैद रहेंगे।
ठीक उसी तरह जिस तरह उन्होंने अपने-अपने ईश्वरों को मंदिरों में कैद कर लिया है ताकि वहां कोई कुत्ता-बिल्ली न घुस पाए। और उनके गुलाम उस तरफ झांके भी नहीं। ईश्वर को शुद्ध बनाए रखने की ‘ऐसी भक्ति’ से अघा कर ही बुद्ध को कहना पड़ा था - बुद्धि के ऊपर वेद को रखना, संसार का कर्ता ईश्वर को मानना, स्नान करने में धर्म होने की इच्छा, जन्म-जाति पर गर्व करना तथा पाप नाश के लिए व्रत आदि द्वारा शरीर को कष्ट देना ध्वस्त बुद्धि वाले मूर्खों के लक्षण है।
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यहां विडम्बना यह है कि जिस मुजफ्फरपुर शहर से लगे सकरा के चकरावे मनियारी और गनीपुर बेझा गांव हैं, जहां के किसी मंदिर के दर्शनों को लेकर दलित से मारपीट की गयी, उसी के आसपास ढाई हजार साल पहले महात्मा बुद्ध भी विचर रहे थे। इन गावों का काली देवी का मंदिर हो या और किसी और देवी-देवता का मंदिर, है आज भी उन्हीं लोगों के कब्जे में, जो करोड़ों नर-नारियों के जीवन को अभिशाप में बदलने की कुव्वत हजारों साल से रखते आ रहे हैं क्योंकि उनके शरीर में आर्यों का शुद्ध रक्त है।
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हिटलर ने तो 20 वीं शताब्दी में इस शुद्ध रक्त को पहचाना, पर अपने देश में इस शुद्ध रक्त की पहचान और ज्यादा खुल कर कृष्ण के प्रयाण के बाद ही हो चुकी थी।
और तभी से खेल चल रहा है शुद्ध रक्त की शुद्धता को बनाए रखने का, जिसमें अशुद्धों को गुलाम बना कर उनके साथ किया जा रहा वह हर कर्म शामिल है, जो चूहों, तिलचट्टों, मक्खी-मच्छरों को भी नसीब नहीं। इस पूरे खेल में वैसे तो उनके लिए आनंद ही आनंद है, जो दोगुना तब हो जाता है जब किसी दलित स्त्री की इज्जत तार-तार हो रही हो क्योंकि ठहाके लगाने का सुअवसर कभी-कभी तो नसीब होता है।
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सवर्ण मानसिकता का यह खेल ऐसा कोलाज बनाता है, जिसमें देह को लतियाना उन्हें नयन सुख देता है तो सिसकियां और चीत्कार श्रवण सुख।
अब अदम गोंडवी की कविता की कुछ पंक्तियों को शामिल कर एक कोलाज....मुजायका फ़रमाएँ....
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आइए महसूस करिए ज़िन्दगी के ताप को
मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको
जिस गली में भुखमरी की यातना से ऊब कर
मर गई फुलिया बिचारी एक कुएं में डूब कर
है सधी सिर पर बिनौली कंडियों की टोकरी
आ रही है सामने से हरखुआ की छोकरी
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा
मैं इसे कहता हूं सरजूपार की मोनालिसा
कैसी यह भयभीत है हिरनी-सी घबराई हुई
लग रही जैसे कली बेला की कुम्हलाई हुई
कल को यह वाचाल थी पर आज कैसी मौन है
जानते हो इसकी ख़ामोशी का कारण कौन है
थे यही सावन के दिन हरखू गया था हाट को
सो रही बूढ़ी ओसारे में बिछाए खाट को
डूबती सूरज की किरनें खेलती थीं रेत से
घास का गट्ठर लिए वह आ रही थी खेत से
आ रही थी वह चली खोई हुई जज़्बात में
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में
होनी से बेखबर कृष्णा बेख़बर राहों में थी
मोड़ पर घूमी तो देखा अजनबी बाहों में थी
चीख़ निकली भी तो होठों में ही घुट कर रह गई
छटपटाई पहले फिर ढीली पड़ी फिर ढह गई
दिन तो सरजू के कछारों में था कब का ढल गया
वासना की आग में कौमार्य उसका जल गया
और उस दिन ये हवेली हँस रही थी मौज में
होश में आई तो कृष्णा थी पिता की गोद में
जुड़ गई थी भीड़ जिसमें ज़ोर था सैलाब था
जो भी था अपनी सुनाने के लिए बेताब था
बढ़ के मंगल ने कहा काका तू कैसे मौन है
पूछ तो बेटी से आख़िर वो दरिंदा कौन है
कोई हो संघर्ष से हम पांव मोड़ेंगे नहीं
कच्चा खा जाएंगे ज़िन्दा उनको छोडेंगे नहीं
कैसे हो सकता है होनी कह के हम टाला करें
और ये दुश्मन बहू-बेटी से मुंह काला करें
बोला कृष्णा से बहन सो जा मेरे अनुरोध से
बच नहीं सकता है वो पापी मेरे प्रतिशोध से
पड़ गई इसकी भनक थी ठाकुरों के कान में
वे इकट्ठे हो गए थे सरचंप के दालान में
दृष्टि जिसकी है जमी भाले की लम्बी नोक पर
देखिए सुखराज सिंग बोले हैं खैनी ठोंक कर
क्या कहें सरपंच भाई क्या ज़माना आ गया
कल तलक जो पाँव के नीचे था रुतबा पा गया
कहती है सरकार कि आपस में मिलजुल कर रहो
सुअर के बच्चों को अब कोरी नहीं हरिजन कहो
देखिए ना यह जो कृष्णा है चमारो के यहाँ
पड़ गया है सीप का मोती गँवारों के यहाँ
जैसे बरसाती नदी अल्हड़ नशे में चूर है
हाथ न पुट्ठे पे रखने देती है मगरूर है
भेजता भी है नहीं ससुराल इसको हरखुआ
फिर कोई बांहों में इसको भींच ले तो क्या हुआ
आज सरजू पार अपने श्याम से टकरा गई
जाने-अनजाने वो लज्जत ज़िंदगी की पा गई
वो तो मंगल देखता था बात आगे बढ़ गई
वरना वह मरदूद इन बातों को कहने से रह
कल सुबह गरदन अगर नपती है बेटे-बाप की
गांव की गलियों में क्या इज़्ज़त रहेगी आपकी
बात का लहज़ा था ऐसा ताव सबको आ गया
हाथ मूंछों पर गए माहौल भी सन्ना गया
था क्षणिक आवेश जिसमें हर युवा तैमूर था
हाँ, मगर होनी को तो कुछ और ही मंजूर था
रात जो आया न अब तूफ़ान वह पुर ज़ोर था
भोर होते ही वहां का दृश्य बिलकुल और था
सिर पे टोपी, बेंत की लाठी संभाले हाथ में
एक दर्जन थे सिपाही ठाकुरों के साथ में
घेरकर बस्ती कहा हलके के थानेदार ने -
"जिसका मंगल नाम हो वह व्यक्ति आए सामने"
निकला मंगल झोपड़ी का पल्ला थोड़ा खोलकर
एक सिपाही ने तभी लाठी चलाई दौड़ कर
गिर पड़ा मंगल तो माथा बूट से टकरा गया
सुन पड़ा फिर "माल वो चोरी का तूने क्या किया"
"कैसी चोरी, माल कैसा" उसने जैसे ही कहा
एक लाठी फिर पड़ी बस होश फिर जाता रहा
होश खोकर वह पड़ा था झोपड़ी के द्वार पर
ठाकुरों से फिर दरोगा ने कहा ललकार कर -
"मेरा मुंह क्या देखते हो ! इसके मुंह पे थूक दो
आग लाओ और इसकी झोपड़ी भी फूंक दो"
और फिर प्रतिशोध की आंधी वहां चलने लगी
बेसहारा निर्बलों की झोपड़ी जलने लगी
दुधमुंहा बच्चा व बुड्ढा जो वहां खेड़े में था
वह अभागा दीन हिंसक भीड़ के घेरे में था
घर को जलते देखकर वे होश को खोने लगे
कुछ तो मन ही मन मगर कुछ ज़ोर से रोने लगे
"कह दो इन कुत्तों के पिल्लों से कि इतराएं नहीं
हुक्म जब तक मैं न दूं कोई कहीं जाए नहीं
फिर दहाड़े, “इनको डंडों से सुधारा जाएगा
ठाकुरों से जो भी टकराया वो मारा जाएगा”
ये समझते हैं कि ठाकुर से उलझना खेल है
ऐसे पाजी का ठिकाना घर नहीं है, जेल है"


