सांप्रदायिकता का चरित्र और उसकी भूमिका बदल चुकी है
सांप्रदायिकता का चरित्र और उसकी भूमिका बदल चुकी है
उज्ज्वल भट्टाचार्या
आज़ादी के आंदोलन के दौरान अपना स्पेस बढ़ाने के लिये हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता औपनिवेशिक शासन के साथ समझौता करती थी, जबकि आज की सांप्रदायिकता नव उदारवाद की दलाली कर रही है।
भारतीय संदर्भ में अक्सर फ़ासीवाद शब्द का प्रयोग किया जाता है। कुछ लक्षण ज़रूर देखता हूँ, लेकिन कुल मिलाकर कायल नहीं हूँ। पहली बात कि फ़ासीवाद की वैचारिकता में जो चयन आधारित विशिष्टतावाद है, उसकी संभावना भारत में लगभग नहीं के बराबर है। भारत में मुस्लिम विरोधी अभियान दलित-पिछड़ा उत्थान को रोकने का अभियान है। हिंदुत्व के नारे के साथ एक विशिष्ट नस्ल आधारित समुदाय के गठन की गुंजाइश नहीं है। सिर्फ़ धर्म और जाति ही नहीं, भाषाई बहुलता भी ऐसे विकास में आड़े आती है।
दूसरी बात सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक विकास से संबंधित है। यहाँ जो लक्षण सामने आ रहे हैं, वे फ़ासीवाद नहीं, बल्कि सांप्रदायिक मसाले के साथ नव उदारवादी पूंजीवादी विकास के लिये चरित्रात्मक हैं। भारत में पूंजीवादी विकास सामाजिक रूपांतरण के लिहाज से मुक्ति का हथियार नहीं है। वह सामंतवाद को बचाकर रखेगा, हर तरह की कूपमंडुक व पश्चादगामी वैचारिकता से सिर्फ़ समझौता ही नहीं करेगा, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर उसे प्रोत्साहित भी करेगा। अगर इसे फ़ासीवाद कह दिया जाय तो वह न सिर्फ़ ग़लत होगा, बल्कि उसमें एक भयानक खतरा छिपा हुआ है : पूंजीवादी बर्चस्व के बढ़ते हुए पंजे को हम अनदेखा कर बैठेंगे, उसके ख़िलाफ़ अपनी रणनीति तैयार करने से चूक जाएंगे।
जब मैं कहता हूँ कि भारत में मुस्लिम विरोधी अभियान दलित-पिछड़ा उत्थान को रोकने का अभियान है, तो मैं नई सांप्रदायिकता की बात करता होता हूँ। पुरानी सांप्रदायिकता (हिंदू व मुस्लिम) राष्ट्र की परिकल्पना से संबंधित था। नई सांप्रदायिकता पुरानी सांप्रदायिकता का इस्तेमाल तो करता है, लेकिन मूलतः वह एक नव उदारवाद सेवक रणनीति का हथियार है। सांप्रदायिकता का चरित्र बदल चुका है, उसकी भूमिका बदल चुकी है।
सांप्रदायिक अभियान दलित-आदिवासी-नारी-अल्पसंख्यक चेतना को रोकने का अभियान है।
इस वक़्त जो दौर चल रहा है, मेरी राय में उसमें व्यापक नहीं, लेकिन नियंत्रित सांप्रदायिक दंगे किये जाएंगे। सांप्रदायिक तनाव और नफ़रत का माहौल तैयार करने के लिये जितना ज़रूरी है, सिर्फ़ उतना। और उसी के साथ नफ़रत विरोधी ताकतों को सामाजिक रूप से बदनाम करने की लगातार कोशिश की जाएगी - एक अभियान के रूप में उसे जारी रखा जाएगा। और इस अभियान में मोदी-झाड़ू-पत्तरकारों की एक विशेष भूमिका होगी।


