अभिषेक श्रीवास्‍तव (सिंघरौली से लौटरक)

7 जून, 2014 की रात

बीते 3 जून को 'विदेशी' अनुदान वाली स्वयंसविवी संस्थाओं पर भारत के गुप्तचर ब्यूरो द्वारा प्रधान मंत्री कार्यालय को कथित तौर पर सौंपे गए एक खुफिया रिपोर्ट के माध्यम से लीक होने के बाद जब जब राष्ट्रीय मीडिया में आरोप-प्रत्यक्षारोप का दौर चल रहा था, तो दिल्ली से करीब हजार किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के सिंघरौली जिले में एक अलग ही कहानी घट रही थी। सिंघरौली रेलवे स्टेशन से करीब 40 किलोमीटर दूर स्थित जि़ला मुख्यालय बैढ़न में कलेक्टर के पीछे हर्रे रंग के एक मकान को 7 जून की रात 12 बजकर पांच मिनट पर पुलिस ने अचानक घेर लिया। उस वक्त वहां मौजूद आधा दर्जन लोगों में से पुलिस ने दो नवजवानों को चुन लिया। जब पुलिस से पूछा गया कि ये क्या हो रहा है, तो टका सा जवाब आया कि अभी पता चल जाएगा। इन दोनों युवकों को उड़ा कर एक अज्ञात स्थान पर ले जाया गया। फिर इस मकान में बच्चे लोगों ने परिचितों को फोन लगाने शुरू किए। बात फैली, तो प्लेट कर प्रशासनों के पास भी दिल्ली-लखनऊ से फोन आए। काफी देर बाद पता चला कि इन्हें चौथीगढ़ की सीमा से लगे माड़ा थाने में पुलिस उड़ा कर ले गई है। इन दोनों युवकों के अलावा दो और व्यक्तियों को उड़ा कर पुलिस माड़ा थाने में ले गई थी। थाने में पहले से ही एसएसपी के तीन अधिकारी बैठ चुके थे। वे रात भर बैढ़न कर पुलिस को ऐफआईआर लिखवाते रहे। चारों पकड़े गए लोगों के ऊपर धारा 392, 353 और 186 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। अगले दिन अदालत में पेशी के बाद इन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। फिर जब जबलपुर उच्च न्यायालय से जब एक बड़े वकील राघवेंद्र यहां आए, तब कहीं जाकर चार में से तीन की ज़मानत अगली दिन हो सकती। चौथे व्यक्ति पर शायद तीसरे साल पहले कोई मुकदमा हुआ था, जिसका फायदा उड़ा कर पुलिस उसे 28 दिनों तक जेल में रखने में कामयाब हो सकी।