नई दिल्ली। गाँधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हिमाँशु कुमार ने कहा है कि सुरक्षा बलों ने आदिवासियों की ज़िन्दगी बदहाल बना दी है। उनका कहना है कि सारी दुनिया में शहरी लोगों ने आदिवासियों पर ज़ुल्म किये हैं। सरकारें पुलिस और नेता शहरी लोगों और बड़े अमीर पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों पर ज़ुल्म करते हैं।

हिमाँशु कुमार ने अपनी फेसबुक टाइमलाइन पर लिखा -

"सुरक्षा बलों ने आदिवासियों की ज़िन्दगी बदहाल बना दी है।

इस बारे में बस्तर के दो पत्रकारों कमल शुक्ला और तामेश्वर सिन्हा ने लिखा है।

मुझे भी इस बारे में लगातार खबरें मिल रही हैं।

मैं आज एक गाँव के बारे में बताना चाहता हूँ।


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इस गाँव का नाम है बुर्कापाल ज़िला सुकमा.

पिछले साल इस गाँव के पास एक सीआरपीएफ कैम्प खोला गया है.

पिछले साल से अभी तक इस गाँव के चालीस नौजवानों को नौकरी दिलाने का झांसा देकर पुलिस जेल में डाल चुकी है.

सीआरपीएफ कैम्प खुलने के बाद इस गाँव के आदिवासियों पर ज़ुल्म शुरू हो गये.

सबसे पहले तो इस गाँव के लोगों को सीआरपीएफ द्वारा खेती ना करने का हुक्म दिया गया.

इसके बाद जंगल में जाकर महुआ बीनने या इमली तोड़ने वाले आदिवासियों को सीआरपीएफ वालों ने पीटना शुरू किया.

और वन उपज बीनना भी बंद करने के लिए मजबूर कर दिया.

इसके बाद आजकल सीआरपीएफ के सिपाही आस पास के गाँव में जाकर निर्दोष आदिवासियों को पकड़ कर लाते हैं.

पहले तो इन आदिवासियों से लकड़ी कटवाना सफाई करवाना जैसे काम बेगार में करवाए जाते हैं.

इसके बाद इन आदिवासियों को नक्सली कह कर जेलों में डाल दिया जाता है.

इनमें से बहुत सारे आदिवासियों को नक्सली कह कर पुलिस आत्मसमर्पण का नाटक भी खेलती है.

रेडियो और टीवी इसका खूब प्रचार करते हैं.

इस सब से सुरक्षा बल के अफसरों को नगद इनाम और तरक्की मिलती है.

बुर्कापाल गाँव में अब मर्द नहीं बचे हैं.

इस गाँव की महिलाओं ने सोनी सोरी से आकर कहा है कि आस पास के गाँव के जिन आदिवासियों को पुलिस पकड कर सीआरपीएफ कैम्प में रखती है.

उन परिवारों की महिलाएं आकर कैम्प के बाहर बैठ कर कई कई दिनों तक रोती रहती हैं.

यह भूखी महिलायें पास में बसी बुर्कापाल गाँव की महिलाओं से खाना मांगती हैं.

बुर्कापाल गाँव की महिलाएं कह रही थीं कि हमें भी खेती नहीं करने दी गई इसलिए हमारे पास भी खाने के लिए ज्यादा नहीं बचा है.

आदिवासी इलाकों में सरकारें जितने ज़ुल्म कर रही हैं वह ज़ुल्म इतिहास में किये गये भयानक ज़ुल्मों से भी ज़्यादा भयानक हैं.

सारी दुनिया में शहरी लोगों ने आदिवासियों पर ज़ुल्म किये हैं.

सरकारें पुलिस और नेता शहरी लोगों और बड़े अमीर पूंजीपतियों के फायदे के लिए आदिवासियों पर ज़ुल्म करते हैं.

असल में शहर कुछ नहीं उगाता.

लेकिन शहर सबसे ज़्यादा खाता है.

इसलिए शहर माल लूटने के लिए अपने सिपाही गाँव में भेजता है.

यह शुद्ध रूप से लूट और गुंडागर्दी है.

लोकतंत्र को बचाना, राष्ट्र की रक्षा, सैनिकों की महानता जैसे खोखली बातें.

अपनी लूट और गुंडागर्दी को छिपाने के लिए शहरी अमीर लुटेरे लोग बोलते रहते हैं और खुद ही आपस में सुनते रहते हैं.

आदिवासियों को ना आपकी राष्ट्र रक्षा की बकवास समझ आती है ना लोकतंत्र का ढोंग समझ में आता है.

आपके सिपाही जब चाहते हैं जिस भी आदिवासी घर में घुस कर बलात्कार कर देते हैं

जिसने विरोध किया उसे गोली से उड़ा देते हैं.

और इधर हम शहरी लोग लोकतंत्र अहिंसा विकास महान राष्ट्र विश्वगुरु जैसी बकवास करते रहते हैं.

इस देश के करोड़ों लोगों के लिए आपकी इन खोखली बातों का कोई अर्थ ही नहीं है.

हम जैसे लोग जब भी लोकतंत्र को ज़मीन पर सच साबित करने की कोशिश करते हैं.

तो हम लोगों को नक्सली समर्थक और विकास विरोधी कह कर गालियाँ दी जाती हैं.

सरकार हम पर फर्जी मुकदमें बनाती रहती है.

सोचिये आप अपने लोकतंत्र इंसानियत और देश को लोगों को कैसे बचायेंगे ?

आखिर ये देश आपका भी तो है."


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