अरुण तिवारी

बात फरवरी, 1941 की है। टाइफाइड नियंत्रण को लेकर डॉक्टरों की सलाह से गांधी जी ने सेवाग्राम में सेप्टिक टैंक बनाने का निर्णय लिया।

जानकरी मिली, तो बलवंत सिंह भड़क उठे। वह गांव समसपुर, तहसील खुर्जा, जिला बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे।

गांधी ने बलवंत को उस समय सेवाग्राम में गोशाला आदि का जिम्मेदार नियुक्त किया हुआ था।

बलवंत ने गांधी जी को कड़ी चिट्ठी लिखी। उनकी बदली हुई नीति को लेकर दुःख और आश्चर्य प्रकट किया। इसे सोने को पानी करने का काम बताया। पाखाना-सफाई और उसकी खाद से प्रकृति व जीव-जगत् के स्वार्थ के घनिष्ठ संबंध के गांधी सिद्धांत की याद दिलाई।

'बापू की छाया में’ पुस्तक में शामिल अपने एक पत्र में श्री बलवंत सिंह जी ने बापू को लिखा है –

"जैसा कोई नचाये, वैसा ही नाच नाचते रहेंगे, तो शायद आपके सत्तर वर्ष के बूढे पैर जवाब दे बैठेंगे। किसी की भी अच्छी चीज को अपनाने या उसका प्रयोग करने का आपका स्वभाव है। जनसंग्रह करना तो आपका धंधा है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जल लाये वो सोना, जिससे नाक छवे;अब तक आप ढोल पीट-पीट कर कहते आये हैं कि यदि हिंदुस्तान के सात लाख गांवों का पाखाना सुव्यवस्थित रूप खाद के काम में लाया जाये, तो उस का कीमिया बन सकता है। आपकी जिस बात को काटने की हिम्मत किसी में नहीं है और हो भी कैसे सकती है ? जानवर, वनस्पति खाकर भी बेशकीमती खाद ज़मीन को वापस देते हैं, तो मनुष्य ज़मीन की उत्पत्ति का सार यानी अनाज खाकर कितना कीमती खाद दे सकता है ? इसीलिए तो पाखाने को सोनखाद कहा जा सकता है न ?’"

बलवंत सिंह जी ने पाखाने को सेप्टिक टैंक में यूं दफना देने को किसान और ज़मीन के साथ अन्याय माना।

गांधी ने बलवंत की झिड़की को उचित माना और उत्तर में आश्वस्त किया कि खाद को बरबाद नहीं होने देंगे।