स्त्री या पुरुष के जेंडर का पद के निर्वहन से क्या ताल्लुक है
स्त्री को सिर्फ उसके जेंडर की पहचान में बाँधना उसके व्यक्तित्व के तमाम आयामों को डाइल्यूट ही नहीं करता बल्कि नकार देता है
संध्या नवोदिता
स्त्री को सिर्फ उसके जेंडर की पहचान में बाँधना उसके व्यक्तित्व के तमाम आयामों को डाइल्यूट ही नहीं करता बल्कि नकार देता है। किसी को दरोगा, आईपीएस, आईएएस, तैराक क्रिकेटर, नेता आदि कहते हुए आप पुरुष नेता या पुरुष दरोगा नहीं कहते तो इन पदों पर किसी स्त्री के होने पर उसे महिला दरोगा, महिला आईपीएस वगैरह क्यों कहना !! स्त्री या पुरुष के जेंडर का पद के निर्वहन से क्या ताल्लुक है।
महिला कहने से लगता है कुछ विशेष श्रेणी का उल्लेख किया जा रहा है। जो कुछ कम या ज्यादा हो सकती है पर सामान्य से इतर ही है।
कल को अगर ट्रांसजेंडर अलग अलग पेशों में आएंगे तो आप उसे ट्रांसजेंडर अध्यापक, या ट्रांसजेंडर दरोगा तो नहीं कहेंगे न !!
ज़्यादातर लोग माँ, बहन और बीवी की भूमिकाओं में स्त्री को सहजता से लेते हैं, मजे की बात है कि बाकी प्रोफेशन में भी वे स्त्री के भीतर माँ या बहन वाले गुणों की ही अपेक्षा करते हैं।
दरोगा अगर महिला है तो उसका डण्डा माँ या बहन का डंडा क्यों होगा?? कलेक्टर या मुख्यमंत्री आप की माँ थोड़े ही है तो आप पर ममता क्यों बरसाएगी? फ़ौज में लड़ाकू विमान से बम गिराने वाली फाइटर घर जाकर अपने बच्चे को दूध पिलाएगी पर बम तो ऐसे टारगेट पर ही गिराएगी जहाँ दुश्मन फाइटरों के खून की नदियां बह जाएं।
आज अजीब लगता है कि महिला को ममता, त्याग, धैर्य और सहनशीलता की खान मानते हुए उनके लिए कुछ प्रोफेशन जैसे नर्सिंग, टीचर, बैंककर्मी आदि के ज्यादा योग्य माना जाता रहा है।
स्त्री अपने विशेष अंगों के कारण केवल प्रजनन के लिए स्त्री होती है। इसके बाद हर काम के लिए वह उतनी ही सामान्य व्यक्ति होती है जितना कोई पुरुष। इसके बाद हर काम वह समाजीकरण से सीखती है। माँ होना भी सीखती है, बच्चे को ठीक से पालन भी।
कई बार वह कम ममता वाली एक खुर्राट माँ भी हो सकती है और कभी कभी गैर ज़िम्मेदार खराब माँ भी हो सकती है। इसी तरह पुरुष एक बहुत ममत्व और वात्सल्य से भरा पिता भी हो सकता है जो बच्चों को खिलाए बगैर मुंह में कौर न रखे।