स्मृति जी बहुत हो गयी ये जहालत, अपने लिए एक (ग़ैर-नेट) क़ाबिल सलाहकार मुक़र्रर कीजिये
स्मृति जी बहुत हो गयी ये जहालत, अपने लिए एक (ग़ैर-नेट) क़ाबिल सलाहकार मुक़र्रर कीजिये
वास्ते,
स्मृति इरानी,
मंत्री, मानव संसाधन विकास ,
ये सादी सी बात आपके पल्ले नहीं पड़ेगी, लेकिन उच्च शिक्षा का हर विद्यार्थी सरकारी-नौकरी नहीं पाना चाहता, इसलिए वह NET परीक्षा जो कि लेक्चरर की सरकारी नौकरी के लिए ज़रूरी है, भी पास नहीं करेगा।
ऐसे बहुत से प्रतिभावान-होनहार शोधार्थी हैं जो अपनी शिक्षा और मेधा को अन्य बौद्धिक कार्यों जैसे एडवांस रिसर्च, एक्टिविस्म, नेतृत्व और विशेषज्ञता हासिल करने में लगाते हैं.
कोई भी राष्ट्र-राज्य इस ज़रूरी 'स्कालरशिप' को, ऐसी दमदार संभावनाओं का गाला घोंट कर सिर्फ शिक्षण-कार्य के लिए आरक्षित कैसे कर सकता है? ये हमारे संवैधानिक नागरिक-अनुबंध के विरोध में है.
उच्च शिक्षा की स्कालरशिप को नेट-केंद्रित कर के आपने उन सभी प्रतिबद्ध-शोधार्थियों को पहले ही राउंड में वंचित कर दिया जो बौद्धिक कार्यक्षेत्र में योगदान देना चाहते हैं, नाकि सरकारी नौकरी के इच्छुक हैं.
स्वंम एक शोधार्थी होने के नाते मैं आपके इस क़दम को 'आज्ञाकारी-सेवक' वर्ग के उत्पादन के लिए माहौल बनानेवाला मानती हूँ, जिसका नतीजा ये निकलेगा की हर विद्यार्थी अपनी उच्चतम मेधा तक पहुँचने से पहले ही एक सरकारी अनुबंध के अनुशासन में बंधने को मजबूर हो जाएगा. यानी अब से भारत में स्वतंत्र चिंतन, चेतना, शोध और बौद्धिक आज़ादी का दम घोंटा जाएगा? अतः आपका ये क़दम भारत की बौद्धिकता और तार्किक भविष्य पर हमला है.
बहुत हो गयी ये जहालत, जल्द से जल्द अपने लिए एक (ग़ैर-नेट) क़ाबिल सलाहकार मुक़र्रर कीजिये,
सहानुभूति के साथ ,
शीबा असलम फ़हमी ,
शोधार्थी,
जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी,


