हकीकत में बदलना होगा संवाद के मंथन को
हकीकत में बदलना होगा संवाद के मंथन को
सिद्धार्थ शंकर गौतम
हरियाणा का सूरजकुंड भारतीय राजनीति की दिशा-दशा बदलने का अहम पड़ाव साबित हो सकता है। पहले भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक और अब कांग्रेस का संवाद मंथन, इस छोटे से शहर से राजनीतिक शुचिता की उम्मीद नजर आ रही है। राजनीतिक पूर्वाग्रहों से इतर सूरजकुंड में दोनों ही राष्ट्रीय दलों ने अपनी खामियों को पाटने का जो मन बनाया है उससे आने वाले समय में जनहितैषी राजनीतिक शुरुआत की आस बांधना बेमानी भी नहीं है। दरअसल राजनीतिक अस्थिरता के वर्तमान दौर और भ्रष्टाचार से त्रस्त व्यवस्था परिवर्तन को लेकर हो रहे जनांदोलनों ने क्षेत्रीय दलों के साथ-साथ राष्ट्रीय दलों की नकेल कस दी है। हालिया कांग्रेस संवाद मंथन पार्टी की छवि सुधार बाबत अत्यावश्यक तो था ही; साथ ही सत्ता और संगठन के मध्य आपसी सामंजस्य स्थापित करने की दिशा में भी सकारात्मक कदम था। हालांकि संवाद मंथन के नतीजों के लिए अभी देखो और इंतजार करो की नीति का पालन करना होगा किन्तु सूरजकुंड में पार्टी नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों से लेकर आलाकमान तक के आत्मविश्वास में जो बढ़ोतरी देखने को मिली है उससे सकारात्मक परिणाम देखने को मिल सकते हैं। संवाद मंथन का मुख्य एजेंडा हो या आगामी आम चुनाव के मद्देनजर विपक्ष के जुबानी हमलों का मुंहतोड़ जवाब देना; पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का एक छत के नीचे आना सुखद है। हालांकि तमाम कयासों को विराम देते हुए इस संवाद मंथन में सांगठनिक फेरबदल नहीं हुआ। यानी संगठन में नए चेहरों के लिए अभी और इंतजार करना होगा। इससे इतर भ्रष्टाचार, नेताओं-मंत्रियों के बेतुके बोल और महंगाई से चौतरफा घिरी सरकार डैमेज कंट्रोल करने में लगी है। इसी कड़ी में आने वाले दिनों में वह पेट्रोलियम उत्पादों को लेकर कुछ राहत भरा फैसला कर सकती है। पार्टी के अंदर ही बढ़ते दबाव को देखते हुए केंद्र सरकार न सिर्फ सालाना छह सब्सिडी वाले रसोई गैस सिलेंडर देने के फैसले को बदल सकती है, बल्कि पेट्रोल की कीमत में भी आम जनता को कुछ राहत दे सकती है। संवाद मंथन में भी सब्सिडी वाले सिलेंडर का कोटा बढ़ाने की जबरदस्त मांग रही। रक्षामंत्री ए.के. एंटोनी ने तो सरकार को आइना दिखाते हुए पार्टी की विचारधारा पर ही सवालिया निशान लगा दिए। उन्होंने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि हमारी नीतियां हमेशा से मध्यमार्गी और वामपंथी झुकाव वाली रही हैं। हमने हमेशा आम आदमी को तरजीह दी है। अब नीतियों में यह दक्षिणपंथी भटकाव क्यों? दिग्विजय सिंह, जगदीश टाइटलर सहित अधिकांश नेताओं ने भी सरकार से इस सीमा को छह से बढ़ाकर १२ करने की माग की है। कई नेताओं ने तो आगामी चुनावों के मद्देनजर इस फैसले को ही रद करने की मांग कर डाली। बैठक में कांग्रेस नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि आम आदमी के नारे से पीछे नहीं हटा जा सकता। कड़े आर्थिक फैसलों के लिए मनमोहन सरकार को हरी झंडी इसी शर्त के साथ मिली थी कि सामाजिक योजनाओं के लिए जरूरी धन की व्यवस्था हो सके। आने वाले समय में गरीबों को सब्सिडी के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा विधेयक और हर ब्लाक में एक मॉडल स्कूल जैसे फैसले अमल में लाने होंगे। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने सरकार से साफ कहा है कि चुनाव में संगठन को जाना होता है। जनता को आर्थिक सुधार नहीं समझाए जा सकते। उसके लिए कुछ ठोस करना होगा और अब इन कड़े आर्थिक फैसलों के बाद उन्हीं की तरफ ध्यान देना होगा। जहां तक कांग्रेस और सरकार पर भ्रष्टाचार को पोषित करने का आरोप है तो जाहिर है संवाद मंथन में इस पर गंभीरता से विचार किया गया है। मनमोहन मंत्रिमंडल का हालिया फेरबदल इसी व्यवस्था के खिलाफ सुचिता का सूत्रपात है। कमोबेश युवा कैबिनेट के चलते मनमोहन सरकार ८ वर्षों की नाकामी को धोने का ही प्रयास कर रही है। और ऐसा हो भी क्यों न, आखिर कमजोर


