हथौड़ा : क्या गरीब वाकई घट रहे हैं?
हथौड़ा : क्या गरीब वाकई घट रहे हैं?
अंशुमाली रस्तोगी
ऐसे तमाम मौके बेमौके आएं हैं, जब मैंने भारत को इंडिया होते बेहद करीब से देखा व जाना है। एक मुल्क के दो नाम होना ही खुद में तरह-तरह के विरोधाभास पैदा करता है। यह विरोधाभास तब और ज्यादा गहरा जाता है, जब बीपीएल क्लास भूख से तड़पती है और आईपीएल क्लास भूख का खुलकर मजाक उड़ाती है। भारत में बीपीएल की भूख और भूख से होने वाली मौतें आज भी एक बड़ा मुद्दा हैं परंतु इंडिया में भूख को कभी मुद्दा माना ही नहीं गया। इंडिया की ऐलिट क्लास अपनी भूख को महंगे होटलों में शांत करती है। होटलों में भरी पलेटों में फेंके जाने वाला खाना इंडिया को कभी विचलित नहीं करता। इस इंडिया को देखकर कभी एहसास ही नहीं होता कि हमारे देश में गरीब या गरीबी भी है या यहां आज भी भूख से मौतें होती हैं।
भारत में भूख से हो रही मौतों पर सुप्रिम कोर्ट सख्त हुआ है। सुप्रिम कोर्ट ने योजना आयोग से पूछा है कि जब अनाज के गोदाम लबालब भरे हैं। फसल भी बंपर है। फिर देश के भीतर भूखमरी के मामले क्यों बढ़ रहे हैं? मगर योजना आयोग तो हर राज्य में बीपीएल की संख्या 36 फीसद मानने के तर्कों पर ही अड़ा हुआ है। योजना आयोग जिस चश्मे से चीजों को देखता-परखता है, उसमें हरापन कालेपन के मुकाबले काफी ज्यादा है। बेशक सुप्रिम कोर्ट दो भारत की अवधारणा को मानने से इंकार करे लेकिन सरकार और योजना आयोग हमेशा इसी खुशफहमी में जीते हैं।
अभी-अभी आए राष्ट्रीय सैंपल साइज सर्वे (एनएसएसओ) के ताजा आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच सालों में भारत में गरीब पांच फीसद घटे हैं। अब हमारे मुल्क में केवल 32 फीसद गरीब ही रह गए हैं। इस हिसाब से भारत को यकीनन प्रसन्न होना चाहिए कि वो अब गरीब नहीं रहा! लेकिन बड़ा सवाल यह है कि भारत में जो गरीब घटे हैं, वो आते किस वर्ग से हैं? उनका जीवन-स्तर क्या है? इस पर योजना आयोग बिल्कुल चुप है।
देश के भीतर आकार लेते भारत और इंडिया के फर्क को भूख के साथ-साथ रहन-सहन के आधार पर भी समझा जा सकता है। इस भारत में कुछ बेचारे तो ऐसे हैं, जिन पर हर वक्त यह दवाब-सा बना रहता है कि वे भूखे होने के बावजूद खुद को इंडिया की एलिट क्लास में रखें ताकि जगहंसाई से दूर रह सकें। भले ही पेट से भूखे रहें, लेकिन रहन-सहन क्लास हो। लगे कि हां हम भी उभरते हुए इंडिया के निवासी हैं। दो भारतों के बीच बढ़ने वाला यह दायरा काफी खतरनाक संदेश दे रहा है।
बीपीएल और आईपीएल क्लास के बीच कायम यह विभाजन हमें अंदर और बाहर से किस हद तक खोखला करता जा रहा है, इस पर सोचने-विचारने का समय न योजना आयोग के पास है न सरकार के। भारत भूख को बर्दाशत इसलिए कर रहा है क्योंकि यह उसकी नियति है और इंडिया भूख का मजाक इसलिए उड़ा रहा है क्योंकि यह उसकी आदत में शुमार हो चुका है। दोनों ही भारत की तस्वीरें आपके सामने हैं।


