अंशुमाली रस्तोगी

बंधु, आप मानें या मानें पर हकीकत यही है कि हमारी सरकार मुन्नी से 'खासा प्रभावित' हुई है। मुन्नी की बदनामी को उसने गहराई से 'आत्मसात' कर लिया है। एक तरफ दबंग में मुन्नी बदनाम हुई और दूसरी तरफ महंगाई पर हमारी सरकार। दोनों ही मामलों में 'बदनामी' मूल कारण रहा। और मजा देखिए बदनाम होकर भी दोनों ने जनता के बीच बेहद 'नाम' कमाया। सारा का सारा मीडिया कभी मुन्नी पर फोकस हो जाता, तो कभी सरकार पर। अपनी जिंदगी में पहली बार मैंने जनता को किसी की बदनामी पर इतना थिरके, बहकते और कोसते हुए देखा है। मुन्नी मेरे निगाह में इसलिए भी 'महान' है क्योंकि उसने हमारी सरकार को बदनाम होने का 'सलीका' सिखाया। बदमान होकर भी कैसे अपने नाम को चमकाया जा सकता है, इसकी 'आदत' डलवाई। दरअसल, बदमानी टाइप मामलों में 'आदत का पड़ना' बहुत मायने रखता है। अगर आपमें किसी 'खास आदत' को आत्मसात करने की हिम्मत नहीं, तो आप जिंदगी में कुछ नहीं कर सकते। बदनामी हो या नकामी हमें हर आदत के बीच रहने का सलीका आना ही चाहिए।

यह बात सही है कि जिसे बदनामी मिलती है, उसे नाम भी खूब मिलता है। बदनामी के बहाने मिले नाम की बात ही 'कुछ और' है। गुजर गए वो जमाने जब व्यक्ति या सरकार की पहचान अपनी-अपनी अच्छाईयों के लिए हुआ करती थी, अब अपनी बदनामियों से ही सामनेवाला पहचाना जाता है। अलां गली की मुन्नी और फलां गली का मुन्ना तब तक मोहल्लेवालों की 'निगाह' में नहीं चढ़ पाते, जब तक कि वे किसी 'खास बात' पर बदनाम न हो जाएं। यही हाल हमारी सरकार का है। खामोशी के साथ चलती सरकार कभी किसी की निगाह में नहीं चढ़ पाती। सभी यही ताना मारते रहते हैं कि 'यह कैसी सरकार है कुछ करती ही नहीं।' इसलिए 'कुछ करने' और 'निगाहों में चढ़ने' के लिए महंगाई, काला धन, भ्रष्टाचार, घोटला, संसद में धमाचौकड़ी जैसे 'बदनामी टाइप मुद्दों' का होना बेहद जरूरी है। ताकि जनता के साथ-साथ विपक्ष को भी लगे कि हां, सरकार 'कुछ' कर रही है। भले ही बदनाम हो रही है, लेकिन कुछ कर रही है। यह जो 'कुछ' है न, 'बहुत कुछ' को साध लेता है।
यकीन करें मैं जब और जहां भी मुन्नी या सरकार को इस तरह से बदनाम होते देखता हूं, मुझे वो मशहूर गाना याद आ जाता है कि जो है नाम वाला वही तो बदनाम है। इसीलिए नाम के साथ बदनामी का चलना बेहद जरूरी है। और मुझे ताउम्र इस बात का मलाल रहेगा कि हाय! मैं भी मुन्नी और सरकार की तरह बदनाम क्यों न हुआ? खैर कोई नहीं, मुझे प्रसन्नता है हमारी सरकार अपनी बदनाम को इंजॉए कर रही है। अब करता रहे विपक्ष सरकार की बदनामी पर हो-हल्ला, लेकिन यहां फर्क किसे और क्यों पड़ने वाला है? विपक्ष सरकार के खिलाफ हो-हल्ला काटकर उलटे उसकी बदनामी में ही चार-चांद लगा रहा है।
कुछ भी कहो पर सरकार हमारी मस्त है। अपनी बदनामी पर दृढ़ है। अपनी बदनामी के बल पर उसने गण और तंत्र दोनों को ही साध रखा है। वाकई ऐसी महानताएं 'अपवाद' सरीखी हैं।
मेरा दिली धन्यवाद है उन महान लोगों को जो महंगाई जैसे मुद्दों पर सरकार को बदनाम करने पर निरंतर संघर्षरत हैं। उनकी बददुआएं सरकार के लिए दुआएं साबित हो रही हैं।
ऐ मेरे खुदा, हमारी मुन्नी और सरकार की बदनामी को यूंही सलामत रखना। आमीन।