हन्ता दुणा नींवे ज्यों हन्ता मिरगाहि
हन्ता दुणा नींवे ज्यों हन्ता मिरगाहि
सुन्दर लोहिया
एक औसत भारतीय की तरह मैं भी जब कभी उलझन में जकड़ जाता हूँ तो अपने इष्टदेव के तौर पर कवियों को याद करता हूँ ठीक वैसे ही जैसे कोई हनुमान चालीसा का पाठ करता है तो कोई चण्डमुण्ड विनाशिनी का स्तोत्र ऊँचे स्वर में गाता है ताकि आंतरिक भय से मुक्ति पा सके। मोदी के मामले में दिक्कत यह है कि वह अंतर्विरोधों का ऐसा घटाटोप खड़ा करते हैं कि उसमें सच्चाई को ढूंढ पाना भूस के ढेर में सुई की तलाश जैसा प्रयास बन जाता है। अपने ऊपर लगे नरसंहार के आरोप को धुंधलाने के लिए गुजरात में सदभावना यात्रा का आयोजन हुआ। इस यात्रा के शुरु कपरने वाले आयोजन के अवसर पर सभागार में जो पर्दा लटकाया गया था उसमें गान्धी और पटेल के अलावा विवेकानन्द और जहां तक मुझे याद है शहीदे आज़म भगत सिंह के चित्र उकेरे गये थे। गान्धी और पटेल के बारे में उनका गुजराती होना ही काफी है क्योंकि मोदी अपने ऊपर लगाये जा रहे आरोपों को गुजरात की निन्दा की तरह पेश करते हुए अपना बचाव कर रहे थे। भगतसिंह के बारे में उनका झूठ देश की प्रगतिशील जमातों ने टिकने नहीं दिया लेकिन विवेकानन्द के बारे में कठमुल्ला प्रगतिशील तबकों ने भगवा वस्त्र के कारण उन्हें भगवा बिग्रेड के हवाले कर दिया जब कि विवेकानन्द के भाई की किताब के मुताबिक वे समाजवादी सन्यासी थे। उन्होंने सर्वधर्मसमभाव का प्रतिपादन करते हुए भारतीयों के लिए ऐसे धर्म की कल्पना की जिसका शरीर इस्लाम का हो और मन वेदान्त का। उन्हें प्रगतिशील न मान कर हमने अपनी प्रगतिकामी सांस्कृतिक विरासत से अपने आप को बेदखल कर दिया जिसका एक परिणाम यह सामने आया कि भारतीय संस्कृति को हिन्दुत्व के रूप में पेश करके बहुसंख्यक तुष्टिकरण को राजधर्म मानने वाले सत्तारूढ़ हो गये।
नरेन्द्र मोदी के बारे मे मैं कई बार दुविधाग्रस्त हो जाता हूँ खासकर जब उनके ऐसे बयान आते हैं जो जनता की विलम्बित इच्छाओं को व्यक्त करते हैं। मसलन विकास को जनान्दोलन बनायेंगे, महात्मा गान्धी की 150वीं जयन्ती के अवसर पर भारत को पूर्ण स्वच्छ राष्ट्र बनाने का संकल्प मुसलमानों के भौतिक विकास की चिन्ता कुछ ऐसे सवाल हैं जिनकी उम्मीद भारत के मतदाता हर राजनीतिक दल से करते आये हैं लेकिन सभी नेताओं को लोगों की इन उम्मीदों को पूरा करने के बजाय इन्हें जि़न्दा रखना अपने राजनीतिक स्वार्थ की दृष्टि से लाभप्रद समझा। अब यह पता नहीं चल रहा है कि नरेन्द्र मोदी क्या पूर्ववर्ती नेताओं के इस कारनामे को सचमुच में बदलना चाहते हैं या वे भी पिछले नेताओं की तरह इन्हें जनता के दिलों में जि़न्दा बनाये रख कर अपनी सरकार को असल एजेण्डे तक पंहुंचने के लिए आवश्यक समय जुटाना चाहते हैं? इसलिए दुविधा और संशय की इस घड़ी में मुझे अपने देश के महान संत कवि और धार्मिक संकीर्णताओं के विरुद्ध लोहा लेने वाले धर्मगुरु नानकदेव की वाणी का यह अंश याद आ रहा है जिसमें उन्होंने संगत को ऐसे लोगों से सावधान पहने का उपदेश दिया है जो बहुत मीठी मीठी बातों से जनता मन मोह लेते हैं। ऐसे लोगों को गुरु नानक उस शिकारी की तरह मानता है जो हिरण का शिकार करने के लिए वीणा बजाकर उसे मुग्ध करता है और उस मुग्धता में बाण चला कर उसका शिकार करता है। समकालीन इतिहास में हिटलर को ऐसा नेता माना जाता है जिसने सत्ता प्राप्त करने के लिए जनवाद के सिद्धान्तों को अपनाने की घोषणा की थी लेकिन इतिहास उसके खिलाफ गवाही दे रहा है। अब नरेन्द्र को इतिहास कैसे ग्रहण करेगा यह तो फिलहाल अटकल का ही विषय हो सकता है।
लोगों की आशंकाओं को निराधार सिद्ध करने के लिए मोदी को तात्कालिक तौर पर कुछ ऐसा करके दिखाना होगा जिससे लोगों का खोया हुआ विश्वास उन्हें मिल जाये। इस दिशा में सबसे पहला काम होगा 2002 के नर संहार के लिए देश से क्षमा मांगना। दूसरा महत्त्वपूर्ण किन्तु इससे भी मुश्किल काम है हर रंग के आतंक को कुचलना और सभी रंग के आतंकवादियों के प्रति जि़रो टौलरेंस की नीति अपनाना। तीसरा काम है देश में अमन शान्ति के लिए पुलिस तथा इससे जुड़े विभागों के लोकतान्त्रिकरण के लिए उन्हें औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त करने की दिशा में ठोस कदम उठाना। चैथ काम अपने देश के आर्थिक विकास के रीढ़ की हड्डी श्रमशक्ति के न्यायसंगत अधिकारों को सुरक्षा प्रदान करना जिसके लिए श्रमेव जयते का नारा ही काफी नहीं है। पांचवा सूत्र है स्वच्छ छवि वाले प्रशासनिक अधिकारियों को संविधान के तहत काम करने की छूट देना। छठे स्थान के लिए मैं मीडिया को कारपोरेट गुलामी से मुक्त करने की राजनीतिक इच्छा के रूप में प्रस्तावित कर रहा हूँ। सातवां बिन्दु है कैग न्यायपालिका सुरक्षा बल सरीखी संवैधानक संस्थओं की स्वायतता सुचिश्चित करके उन्हें स्वतऩ्त्रतापूर्वक काम करने के लिए राजनीतिक वातावरण तैयार करना।
जनता के इस सातसूत्री एजेण्डे को यदि समयबद्ध ढंग से नरेन्द्र मोदी क्रियान्वित कर सके तो देश की जनता वास्तव में उन्हें अपना मसीहा भी मान लेगी। अन्यथा नानकदेवजी की वाणी के अनुसार मोदी को सिद्धहस्त शिकारी मान कर उनके हर काम पर आलोचनात्मक दृष्टि से आकलन करते हुए लोकतान्त्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए जनान्दोलन चलायेगी।
मोदी विकास के लिए जनान्दोलन की बात कर ज़रूर रहे है उसके शुभारम्भ के लिए उन्होंने महात्मा गान्धी की 150वीं जयन्ती से शुभारम्भ की औपचारिक घोषणा भी कर दी है। इसे हासिल करने के लिए कड़े फैसले लेने होंगे जो आरम्भ में जनता को रास नहीं आयेंगे। लेकिन इस विकास का स्वरूप क्या होगा इसे जाने बिना जनता समर्थन पर शायद न उतरे। विकास का वर्गीय चरित्र होता है। टाटा बिड़ला और अम्बानी का विकास गान्धी लोहिया और अम्बेडकर के विकास जैसा नहीं हो सकता। जिस पार्टी की हार का वे आज मज़ाक उड़ा रहे हैं उसका कारण भी एक ऐसा विकास था जो जनता को रास नहीं आ रहा था। इसलिए जनता ने भाजपा को वोट देकर कांग्रेस के विकास की अवधारणा से अपनी असहमति प्रकट की है। अब अगर भाजपा भी उसी रास्ते पर चले तो जनता के पास जो रास्ता बचेगा उसमें न कांग्रेस बचेगी न भाजपा और न तो वामपंथ के लटके झटके बच पायेंगे। इसलिए भाजपा को विकास का रास्ता चुनते हुए जनता की उम्मीदों का ध्यान रखना होगा। मोदी सरकार का बजट जनता को बतायेगा कि उनकी उम्मीदें फलीभूत होंगी या फूट कर बिखर जायेंगी। यदि मोदी सरकार जनता को लॉलीपॉप दे कर चुप कराने की कोशिश करेगी तो इतिहास भाजपा को जनता के प्रति विश्वासघात का दोषी मान कर दर्ज करेगा। फैसला अब संघ नहीं सिर्फ भाजपा को ही करना पड़ेगा क्योंकि यह उसकी राजनीतिक जिम्मवारी बनती है।


