हमारे न्यायालयों को भी नवपूँजीवाद की सेवा करनी है...
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सम्प्रभु सत्ता का निवास किसमें है - राज्य में या जनताता में?
किष्ण पट्टनायक स्मृति व्याख्यान भाग-3
“बेशक, अधेरा गाढ़ा होता जा रहा है- यह नवापटाकाल है” व गुणुलाम जैनियत के बीमार ख्वाब से आगे की कढ़ी केन्द्रीकरण ने हमें आर्थिक भ्रष्टाचार, राजनैतिक पतन और सामाजिकी पतन के उस मोड़ तक पहुँच दिया जहाँ से व्यापक किन होती है..
रविकिरण जैन
सत्ता का केन्द्रीकरण
केन्द्रीकरण चाहता सम्पत्ति का हो या सत्ता का, दोनों ही बुरे हैं। अमेरिका और इंग्लैंड में धन एकत्रित हो रहा है और रूस में धन के विभाजन का अधिकारी केन्द्रीत हो रहा है।
जे.सी. कुमाऱाप्पा (स्थायी समाज व्यवस्था, 1945)
अगर हम अपनी आज़ादी के वर्षों को किसी एक शब्द से परिभाषित करना चाहते हैं तो हमारी समझ में वह शब्द है ‘केन्द्रीकरण’। जीवन के हर क्षेत्र में केन्द्रीकरण। आर्थिक क्षेत्र में सरकार और गैरसरकारी बड़े उद्योगों और विविध योजनाओं के इर्द-गिर्द नीति, रजनिति में विशाल प्रतिनिध्यता की अमूर्य, प्रशासक के क्षेत्र में अनुत्तरदायित्व, समाज के क्षेत्र में उच्चजाति और बहुतसंख्यकवाद का बोलबाला, संस्कृति के क्षेत्र में विराट कलारूपों का आकारण। इन सबके बीच जो सीधा है, मूर्त है, प्रत्यक्ष है, अनुभव करने और प्रतिक्रीया करने की क्षमता के भीतर है वह उपेक्षित हो गया। इसके केन्द्रिकरण के बीच व्यक्तित्व सिफर एक संख्या बनकर रह गया जिसे एक वोट या जनसंख्या का एक आंकड़ा समझा जाना लगा। राज्य के निर्वाध आकार और पूजा के हिंसक हमलों ने उसे हासिये पर फेंक दिया। सामुदायिकता नष्ट हो गई और व्यक्तित्व खो गया। इस हासियेकारण की प्रकृति में आम आदमियों की निष्क्रियता हो गई और उसकी भागीदारी पांच साल चौमुवी चुनावी अनुष्ठान तक सीमित रह गई।


