हमें चुप करने के लिए उन्हें अब गोली ही चलानी होगी
हमें चुप करने के लिए उन्हें अब गोली ही चलानी होगी
दिल्ली से ले कर त्रिवेन्द्रम तक अनगिनत शहरों -कस्बों में आक्रोश प्रदर्शनों का तांता लगा हुआ है . प्रोफेसर कलबुर्गी के हत्यारे अपनी खोहों में छुपे बैठे देख रहे हैं . जयकारे की आस लगाये कायरों को दिग- दिगंत से उठता धिक्कार थर्रा रहा है, लेकिन राजप्रासादों से एक लाइन की औपचारिक निंदा -ट्वीट तक जारी नहीं हो पा रही . क्या आत्मविश्वास लोचा खा गया ?
साहित्य की अकादमी अपने पुरस्कृत लेखक की हत्या का शोक मनाने तक की हिम्मत नहीं कर पा रही . ऐसे में हिन्दी के एक लेखक उदय प्रकाश ने अकादमी का पुरस्कार टैगोरी तमाचे की तरह अकादमी के मुंह पर दे मारा है . कई और लेखक ऐसा ही करने की तैयारी में हैं. अगर राज स्वाधीनचेता लेखकों की हत्या की निंदा नहीं कर पा रहा , साल दर साल हत्याएं जारी रहती हैं और राज एक भी हत्यारे का सुराग नहीं लगा पा रहा , तो इस राज के दिए पुरस्कारों को विनम्रतापूर्वक लौटा देने से बढ़कर एक लेखक का प्रतिवाद और क्या होगा !
अंग्रेजों के पास कोई गौरांग दल नहीं था।उन्हें अपना सारा जलियांवाला अपने हाथों ही करना पड़ता था। वर्तमान स्थिति में अराजकीय कर्ताओं ने काम आसान बना दिया है । विडम्बना देखिये कि दुनिया भर में उनके बढ़ते प्रभाव से चिंतित सरकार अपने घर में ऐसे ही अराजकीय कर्ताओं के दरबार में हाजिरी बजाने चली जाती है .
जब तक हत्यारे पकड़े नहीं जाते और केन्द्रीय स्तर पर अंधश्रद्धाउन्मूलन क़ानून लागू नहीं होता , तब तक प्रतिरोध जारी है . हमें चुप करने के लिए उन्हें अब गोली ही चलानी होगी.
आशुतोष कुमार


