हम कम्युनिस्ट हैं साहेब, डरना नहीं लड़ना सीखा है. हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे.
हम कम्युनिस्ट हैं साहेब, डरना नहीं लड़ना सीखा है. हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे.
अशोक कुमार पाण्डेय
कल लिखा था.
एक भाषण राहुल गांधी का था. टपकते नूर वाला मासूम चेहरा. नीचे रखा पर्चा. अदाएं. हँसी. मज़ाक. तंज़. जोश. भैया कहते न यू पी वाले लगते हैं न दिल्ली वाली. बस क्यूट लगते हैं. बात सही की पर अदाएं भारी पड़ गयीं.
एक भाषण स्मृति इरानी जी का था. सारे लटको झटकों के साथ. पर्चे ही पर्चे पर तथ्य ग़लत. अदा ग़ज़ब. आत्मविश्वास ग़ज़ब. सत्ता का गुरूर. मज़ा नहीं आया.
एक भाषण कन्हैया का था. सही तथ्य. जोश. अदा नहीं सम्बद्धता. ग़रीब का बेटा. सत्ता के खिलाफ. खतरा उठा के सच बोलने की हिम्मत और उससे उपजा आत्मविश्वास. आवाज़ में ईमानदारी. तंज़ में सच्चाई की चमक. जनता की ताक़त में यक़ीन.
मुझे दिखता है फ़र्क. आपका आप जानें
आज कन्हैया का 50 मिनट का धाराप्रवाह भाषण सुनकर उस बात पर और मुतमइन हुआ. इस कम्युनिस्ट को न पर्चा चाहिए था, न सत्ता का गुरूर. आपकी जेल इसे तोड़ नहीं सकी. सोना तप के कुंदन बन गया. आपका दमन इसकी आवाज़ नहीं दबा सका. वह और प्रखर हो गयी. आपका दुष्प्रचार उसको बदनाम नहीं कर पाया. याद कीजिए इसके पहले किस छात्रनेता को नेशनल टीवी पर लाइव दिखाया था?
वह अब भी दहाड़ कर कह रहा है, हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे. वह बाबा साहब और लेनिन को कोट करने के लिए किताब नहीं खोज रहा था. वह तंज़ करने के लिए झूठ नहीं बोल रहा था. वह दिल से बोल रहा था पर दिमाग से खाली नहीं था. वह गरीब का बेटा है. वह कम्युनिस्ट है. वह जनता का प्रतिनिधि है.
हम कम्युनिस्ट हैं साहेब, डरना नहीं लड़ना सीखा है. आपकी जो चालें अब तक विरोधियों को दबाने के काम आती हैं, हम पर नहीं चलने वाली. हम लड़ेंगे, हम जीतेंगे. हम रक्तबीज हैं. आपके चमचे रोज़ कहेंगे हम ख़त्म हुए और हम रोज़ उठ खड़े होंगे.
अगली बार मिलूंगा तो तुम्हें पूरे कम्युनिस्ट अनुशासन से सलाम करूंगा कन्हैया. यह मामूली कलमघसीट खुश है कि यूजीसी मूवमेंट में कुछ घंटे गुज़ारे हैं तुम्हारे साथ. अभी यही से लाल सलाम.


