हर हाल पर रोना आया
हर हाल पर रोना आया
कभी देश के विदेश बिहार पर रोना आया , कभी निर्वहन कुमार के हाल पर रोना आया । बात निकली है तो हर अफसर के हाल पर रोना आया । कहा चचा गालिब ने सरकार दरबार का एक दरिया है – बस घुस कर जाना है । गुलजार से माफी के साथ – हवाओं पर लिख दो हवाओं के नाम की तर्ज पर दरबार पर लिख दो फरियादियों के नाम । क्या तरीका बनाया है । तरीका बड़ा पुराना है –
मुनादी वाली बात है ।कभी नगाड़ा बजता था , अब अखबार में छपता है । फोफां घसीटी , कुत्ता पार्टी की पट्टी पर चलता है । कोई खल्क खुदा पर बहस नहीं करता । बहुत हुआ तो सत्यनिष्ठा हो जाता है । बात वही वही होता है । यही तो रिसर्च होता है । कोई नहीं मानता कि जब जब जो होना है , तब तब होना है । होना वोना कुछ भी नहीं क्योंकि अफसर जी को सरदियों की मुलायम धूप में सोना है । मुनादी में महत्व खल्क खुदा का नहीं होता । खल्क तो उस बेचारे खुदा का है ही । वह कहां दावा करता है अपने होने का । उसके पास एक बादशाह होता है । इसीलिए कहा गया है – खल्क खुदा का , मुल्क बादशाह का और हुक्म शहर कोतवाल का । हमें तो खुदा और बादशाह के हाल पर रोना आया । हुक्म बजाता शहर कोतवाल के बेहाल से हाल पर रोना आया । अपनी बेहाली पर हंसता हुआ शहर कोतवाल कहता है , हमें तो तेरे दरबार के हाल पर रोना आया । यूं रोने के लिए प्याज के भाव काफी हैं , पर कुछ लोगों को महंगाई पर रोना आया । रोना ही तेरी किस्मत है ए भारत – रोते रोते इंडिया को भी अपने हाल पर रोना आया ।
कभी नगाड़ा बजता था । खुले आम बात कही जाती थी । अब तकनीक बदला , जमाना बदला । यूं मारे गए न जाने कितने गुलफाम कि तीसरी कसम के बाद खुली सी छिपी बात पर फालतू सी बहस पर रोना आया । खुल रहा है टेप नुमा नगाड़े का खल्क खुदा । सूप और छलनी वाली लड़ाई कि तू तो कोना कोनी – तुममें सैकड़ों छेद । कोना कोनी और सैकड़ों छेद पर रोना आया । समझ में नहीं आता कि कांग्रेस है कोना कोनी या बीजेपी में सैकड़ों छेद – हमें तो भ्रष्टाचार की हर जगह से दोस्ती पर रोना आया । कहत कविराय निर्वहन कुमार हमें भ्रष्टाचार मिटाना है । साफ करने वाले साबुनों पर लगे दाग के हाल पे रोना आया । इसी लिए तो एक साबुन ने कह दिया कि कुछ अच्छा होता है तो दाग अच्छे हैं । हमें तो न्याय के साथ विकास पर रोना आया । अब हो गया साबित कि न्याय भी भ्रष्टाचार का मलमल पहने है और विकास ओढ़े है भ्रष्टाचार का दुप्पट्टा । पारदर्शी मलमल और दुप्पट्टा की खुशहाली पर रोना आया । बीत गया संसद का सरदियों वाला अधिवेशन , बिना बड़ी बड़ी बातों के सिहरन से ।
ऐसा ठिठुरा की टिठक ही गया भ्रष्टाचार की ठिठुरन से । हमें अपने गरम कपड़ों में लगे कीड़ों के हाल पर रोना आया । क्या किस्मत है देश की कि
टेपवालियों की सोहबत में अटलबिहारी – आडवाणी ही नहीं नरसिंह राव का भी नाम आया । क्या कमाल है कि सबका नाम आया जुगनू – पर राजपाद के बावजूद असली राजपाट का नाम नहीं आया – इसी बात पर तो हर हाल पर रोना आया ।


