हाशिमपुरा नरसंहार - उस वक्त नेशनल मीडिया ने दंगों के सच को सबके सामने रखा था।
नई दिल्ली। हाशिमपुरा नरसंहार पर प्रतिक्रियाओं का सिलसिला जारी है। मेरठ के वरिष्ठ पत्रकार सलीम अख्तर सिद्दीकी ने जहां लिखा है - "हाशिमपुरा कांड के आरोपियों में ज़्यादातर यादव थे, उनमें भी ज़्यादा इटावा के थे। अब?" वहीं लिखा है कि मुख्यमंत्री से लेकर पीएसी का एक सिपाही तक ‘दंगाई’ बन गया था।
सलीम अख्तर सिद्दीकी फेसबुक पर लिखते हैं।-

“मई 1987 का दंगा, तब तक दंगा था, जब तक पुलिस और प्रशासन ने मुसलमानों को सब सिखाने का प्लान तैयार नहीं किया था। उसके बाद मुख्यमंत्री से लेकर पीएसी का एक सिपाही तक ‘दंगाई’ बन गया था। (वैसे अपवादस्वरूप ऐसे अफसर भी थे, जिन्होंने निष्पक्ष भूमिका निभाई थी) उस दौरान परतापुर कताई मिल में मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सब कुछ अंजाम दिया गया। उस वक्त मेरठ से सांसद मोहसिना किदवई को भी अलग-थलग कर दिया गया था। हाशिमपुरा नरसंहार और मलियाना हत्याकांड भी कांग्रेसी मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह की ‘देखरेख’ में अंजाम दिए गए थे। कुछ मुसलिम लीडरों को धमका कर चुप करा दिया गया था, तो कुछ ‘मसलहत’ के तहत घरों में दुबक गए थे। कई घरों में भी असुरिक्षत महसूस कर रहे थे। इसलिए कोई सैयद शहाबुद्दीन की शरण में चला गया था, तो कोई अब्दुल्ला बुखारी की पनाह में था। ऐसे वक्त में मीडिया ही ऐसा था, जिससे लोगों को आस थी। उस वक्त नेशनल मीडिया ने दंगों के सच को सबके सामने रखा था। साप्ताहिक ‘रविवार’ और ‘चौथी दुनिया’ ने उस समय निष्पक्ष भूमिका निभाई थी। हाशिमपुरा हत्याकांड को उजागर करने का श्रेय तो ‘चौथी दुनिया’ को ही जाता है। उस वक्त का ‘चौथी दुनिया’ आज के ‘चौथी दुनिया’ से अलग था। हालांकि तब भी उसके संपादक संतोष भारतीय ही थे। मेरठ से प्रकाशित होने वाले ‘अमर उजाला’ ने उस समय दंगों के सच को बहुत ईमानदारी से दुनिया के सामने रखा था।“