2017 आते-आते काँग्रेस के पास यूपी में शायद ही कुछ बचे,
2017 आते-आते काँग्रेस के पास यूपी में शायद ही कुछ बचे,
वक्त काँग्रेस के हाथ से निकलता दिख रहा है
2014 के लोकसभा चुनाव में करारी पराजय के बाद काँग्रेस में आयाराम गयारामों की दूसरे दलों की और मची भगदड़ के बाद बची हुई काँग्रेस में भी उत्तर प्रदेश के भविष्य को लेकर उहापोह की स्थिति बनी हुई है।
उत्तर प्रदेश के नेतृत्व की निष्क्रियता को लेकर 2014 से ही बदलाव की चर्चाएँ लोगों के बीच होती रही हैं, नये नये नाम भी सामने आ रहे हैं। कुछ दिनों पहले पूर्व साँसद राजबब्बर का नाम सामने आया...तमाम काँग्रेसियों, समाजवादी सोच के लोगों यहाँ तक कि बुद्धिजीवियों ने भी उत्तर प्रदेश की काँग्रेस में राजबब्बर को बेहतर बताया। सोशल मीडिया पर उनके समर्थन में काफी लिखा गया...अखबारों में भी खबरें आयीं। इसी बीच राज बब्बर को उत्तरांचल से राज्यसभा भेजा गया। चर्चाएँ और गर्म हुयीं कि राजबब्बर को प्रोटोकाल दिया गया है उनका प्रदेश अध्यक्ष बनना तय है।
धीरे-धीरे ये चर्चाएँ हल्की हुईँ तो कुछ नाम बढ़ गये। पूर्व केन्दीय राज्यमँत्री जितिन प्रसाद, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रहीँ रीता जोशी, आर पी एन सिँह के नाम भी सामने आए।
बदलाव की चर्चाएँ जोर पकड़ते और राहुल गाँधी की सक्रियता को देखते हुए मौजूदा प्रदेश काँग्रेस कुछ हरकत में आयी। 6 किलोमीटर लँबी पदयात्राएँ शुरू हुईँ। इनको आमजन ने ही मॉर्निग वॉक बताना शुरू कर दिया।
बहरहाल पिछले दिनों इस मॉर्निग वॉक टाइप छ: किलोमीटर की पदयात्राओं का समापन हुआ।
तब चर्चा शुरू हुयी कि मकर सँक्रांति के बाद सूर्य के उत्तरायण हो जाने के बाद पहले राहुल गाँधी की ताजपोशी होगी, फिर वह प्रदेश नेतृत्व में बदलाव करेंगे। अब कार्यकर्ता उनकी ताजपोशी का इन्तजार कर रहे हैं।
इस बीच केन्द्रीय पर्यवेक्षक आकर विधानसभा टिकटार्थियोँ के बायोडाटा और साक्षात्कार कर ले गये। राजेशपति त्रिपाठी उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रभारी बना दिए गए, लेकिन प्रदेश कमेटी वही की वही। 2012 में लोगों में जैसी व्याकुलता काँग्रेस के टिकट को लेकर दिख रही थी वह अब देखने को नहीँ मिल रही। किसी गुट से कोई ठेकेदार, कहीं हारा हुआ साँसद अपने बेटे भतीजे या बहू को या फिर कब के बुझे हुए काँग्रेसी टिकट की लाइन में दिख रहे हैं। काँग्रेस की वापसी की बाट जोह रहे काँग्रेस की गुटबाजी में हाशिये पर डाल रखे गये लोग, शुभचिँतक और प्रदेश में क्षेत्रीय दलोँ के जातिवादी रवैये से दुखी, सांप्रदायिकता को आने से रोकने के ख्वाहिशमंद सामान्यजन भी प्रदेश काँग्रेस में बदलाव की ओर टकटकी लगाए हैं लेकिन उन्हेँ वक्त काँग्रेस के हाथ से निकलता दिख रहा है।
अभी जिला पँचायत और ग्राम पँचायत चुनावोँ में काँग्रेस की दुर्दशा खुल कर सामने आई है। फरवरी में विधान सभा के तीन उपचुनाव होने जा रहे हैं, जिनमें से एक मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष के जनपद में है। बची खुची हैसियत इन उपचुनावोँ में अगले महीने सामने आ जाएगी।
2017 आते-आते काँग्रेस के पास शायद ही कुछ बचे, अभी भी कुछ उम्मीद बाकी है अगर बदलाव को लेकर नेतृत्व गँभीर हो तो।
रामेंद्र जनवार
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