भाजपा आरएसएस की मूल सोच से अलग नहीं चल सकती
आलोक वाजपेयी
पहली बार केंद्र में फासीवादी सरकार सत्तासीन हुई है
आगे आने वाला समय और चुनौतियां भारत की राजनीति के सन्दर्भ में।

इस केंद्र सरकार की तुलना पिछली सरकारों से करना व्यर्थ है। पहली बार केंद्र में फासीवादी सरकार सत्तासीन हुई है। इस सरकार के पीछे मुख्य मार्गदर्शक के रूप में आरएसएस है जिसकी मूल विचारधारा ही संगठित निरंकुश तानाशाही और फासीवादी है।

यह कल्पना करना कि भाजपा आरएसएस की मूल सोच से अलग चल सकती है, केवल मन बहलाव की बात है। इसके अलावा राजनीतिक दृष्टि से यह सबसे संगठित दल है। हर जगह इनका जाल फैला हुआ है। प्रशासनिक ढांचा, न्यायपालिका, मीडिया, पत्रकारिता, बिज़नेस घराने और यहाँ तक कि सेना-पुलिस में भी इनकी सोच से सहानुभूति रखने वाले और इनकी खुले या अप्रत्यक्ष मदद करने वाले लोग मौजूद हैं।

आने वाले समय में प्रगतिशील चेतना को अपना वैचारिक आधार मानने वाले दलों व संगठनों और इस फासीवाद के बीच गहनतम संघर्ष अवश्यम्भावी है। यह केवल वैचारिक न रहकर सड़कों पर उतरेगा।

लखनऊ विधानसभा के सामने प्रदर्शन के नाम पर सड़क पर गुंडई मचाते भाजपा कार्यकर्ता

भाजपा कंपनी तेजी से अलोकप्रिय हो रही है, इसलिए यह 2019 के लिए कोई भी उपाय नहीं छोड़ेगी। इसमें युद्ध दंगे और ना जाने क्या-क्या शामिल होगा। यह सोचना कि इन्हें एक regular चुनाव के सहारे आराम से जनमत अपने हक़ में करके गद्दी से हटाया जा सकता है, एक जल्दबाजी की सोच ही कह सकते हैं। बहुत अधिक संघर्ष और हर तरह के संघर्ष की जरुरत है और आगे होगी।

सारे अंतर्विरोधों को ताक पर रखकर फासीवाद विरोध को मुख्य अन्तर्विरोध मानना पड़ेगा।

इस मुहिम या मंच की अगुआई कौन सबसे बेहतर कर सकता है, इस पर आम राय बनानी होगी।