2019 में मोदी के तारणहार बनने का बुआ-बबुआ का सपना पूरा नहीं होगा

हरे राम मिश्र

उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा को व्यावहारिक रूप से भाजपा से उतना खतरा नहीं है जितना कांग्रेस से है.

अगर उत्तर प्रदेश में कांग्रेस मजबूत होती है तो इन दोनों दलों का खेल खत्म हो जाएगा.

अखिलेश यादव और मायावती उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इस खतरे को अच्छी तरह से समझ रहे हैं.

इसीलिए यह 2019 के संदर्भ में कांग्रेस के साथ किसी महागठबंधन के लिए मानसिक रूप से वे तैयार नहीं हो पा रहे हैं.

दरअसल अस्तित्व संकट के स्तर तक रिस्क नही लिया जाता.

अगर यह दोनों दल उत्तर प्रदेश में 2019 में अकेले लड़ते हैं, तब भाजपा को भी बहुत राहत हो जाएगी, क्योंकि भाजपा विरोधी वोट इकट्ठा एक जगह नहीं जाएगा.

और इस तरह से नरेंद्र मोदी की शर्मनाक हार नहीं होगी.

जब राहुल गांधी केंद्र सरकार के तमाम भ्रष्टाचार पर अकेले मोर्चा खोले हुए हैं, तब मायावती और अखिलेश यादव की चुप्पी को समझा जा सकता है.

असल में वह राहुल के इमरजेंस से बहुत डरे हुए हैं. लेकिन उनकी राजनीति की सीमाएं इतनी छोटी है कि वह चाहकर भी इससे ऊपर नहीं जा सकते. वह चाह भी ले तो खुद को राहुल गांधी के विकल्प के बतौर जनता के सामने नहीं रख सकते क्योंकि संघी फासीवाद के खिलाफ़ उनकी कोई क्रेडिट नहीं बची है. लेकिन भाजपा की मदद करने की लाख कोशिश के बावजूद मैं समझता हूं कि सपा बसपा अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाएंगे.

मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने एक डूबे हुए या मृत प्राय स्ट्रक्चर के साथ सत्ता में वापसी की है.

यूपी में भी ऐसा हो सकता है बशर्ते कि राहुल अपने तेवर बनाए रखें और नरेंद्र मोदी को हर उस मुद्दे पर घेरें जिसमें सरकार असहज हो जाती है.

मोदी को जवाब देना पड़ेगा अन्यथा 2019 में इनका खात्मा एकदम तय है.

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