2019 के चुनाव की तैयारी का हिस्सा है संघ की ताज़ा कवायद
2019 के चुनाव की तैयारी का हिस्सा है संघ की ताज़ा कवायद
2019 के चुनाव की तैयारी का हिस्सा है संघ की ताज़ा कवायद
17 से 19 सितम्बर तक दिल्ली में हुए तीन दिवसीय खुले मंथन शिविर: “भविष्य का भारत, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दृष्टिकोण, में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (संघ) संचालक मोहन भागवत ने जो जो कहा वो नरेन्द्र मोदी के तरह एक पब्लिक प्लेटफार्म से सिर्फ ‘मन की बात’ कह अपने आपको जमीनी स्तर की सच्चाई से अलग करने जैसा लग रहा है.
जैसा मोदीजी ने किया जमीनी स्तर पर चाहे जो हो: गौ-रक्षक के नाम पर सड़क सरेआम हत्या होती रही; दलित और मुस्लिम कटते और पिटते रहें; देश के कोनों-कोनों से भीड़-हत्या की ख़बरें आती रहें; लेकिन देश के मुखिया के तौर पर अपनी ‘मन की बात’ में रेडियो पर इसे गलत बता उसकी भर्त्सना तो की, लेकिन जमीनी स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था और अपने कैडर को इसके खिलाफ कड़ी कार्यवाही कर इसे रोकने के लिए कोई आदेश नहीं दी. उसी तरह संघ संचालक मोहन भगवत ने एक झटके में गौ-रक्षा के नाम पर सरेआम की जा रही हत्या से लेकर आरक्षण तक के मुद्दे से अपना पल्ला छाड़ने के साथ-साथ गुरु गोलवकरजी के मुसलमानों के विषय में रखे गए विचारों से ही संघ को अलग कर लिया. लेकिन, जब-तक इसे लेकर संघ अपनी गतिविधियों और कार्यक्रमों में कोई बुनियादी बदलाव नहीं लाता तब तक इन बातों को सिर्फ ‘मन की बात’ भर मानना सही होगा.
अब सवाल यह उठ रहा है, कि संघ यह सब क्यों कर रहा है?: क्या राहुल गांधी ने संघ पर वैमनस्यता फ़ैलाने को लेकर जो हमला किया है, उन आरोपों का जवाब दे संघ अपनी छवि साफ़ करने की यह एक कवायद कर रहा है? जैसा एम के वेणु ने द वायर में लिखे अपने लेख में कहा है: यह कवायद संघ द्वारा शहरी बौद्धिक वर्ग को रिझाने की कोशिश है. या कहें तो, यह एक तरह से ‘इमेज मेक ओवर’ का प्रयास है.
मुझे लगता है: यह सही है कि यह एक छवि बदलाव का एजेंडा है; जो, 2019 के लोकसभा आम चुनाव के मद्देनजर तात्कालिक तौर पर एक जनमत बनाने के लिए जरूरी है. इस कवायद के जरिए एक तो संघ अपने से दूर गए दलित और आदिवासी मतदाताओं को वापस अपने घेरे में लाने की कोशिश कर रहा है; और दूसरा, युवा मतदाता को यह सन्देश देने की कोशिश कर रहा है, कि संघ प्रगतिशील सोच रखने वाला संगठन है. संघ यह जानता है, कि आज के युवा के बीच पकड़ बनाने के लिए सिर्फ पुराने फार्मूले काम नहीं करेंगे; एक प्रगतिशील सोच का मुखौटा जरूरी है.
राष्ट्रीय स्वयं सेवक के सर संघ (संघ) संचालक मोहन भगवत चाहे भले ही यह दावा करें कि संघ का राजनीति से कोई लेना देना नहीं है; और वो भाजपा की मोदी सरकार को नियंत्रित नहीं करते, लेकिन वो इस सच्चाई को बखूबी जानते हैं, कि भारत को “हिन्दू राष्ट्र” बनाने का संघ का चिर स्थाई सपना उसकी विचारधारा से संचालित और नियंत्रित पार्टी - भाजपा - के केंद्र की सत्ता में काबिज रहे बिना संभव नहीं है; असल में दोनों एक दूसरे के लिए तोते में शैतान की जान की कहानी जैसे हैं, जिसमें बिना दूसरे का अस्तित्व संभव नहीं होता है.
हम सब यह जानते हैं कि जमीन स्तर पर भाजपा और संघ एक दूसरे में इस हद तक आत्मसात रहते हैं, कि अक्सर दोनों में भेद करना मुश्किल हो जाता है. मोहन भागवत यह भी अच्छी तरह जानते हैं, कि भाजपा का पार्टी के रूप में ढांचा कितना भी मजबूत हो लेकिन संघ के जमीनी स्तर पर मत को साधने वाला कार्यकर्त्ता शरीर के अन्दर रक्त जैसा है; बिना रक्त प्रवाह के शरीर निष्क्रिय रहेगा. इसलिए, अमित शाह और मोदी जुगलबंदी के साथ नाराजगी और तनाव की तमाम खबरों के बावजूद उसने 2019 में भाजपा को पुन: सत्ता में स्थापित करने की तैयारियां शुरू कर दी है; दिल्ली में 17 से 19 सितम्बर के तीन दिवसीय खुले मंथन शिविर की कवायद इसी तैयारी का एक हिस्सा था. जिस तरह से इस कार्यक्रम का तीन दिनों तक दूरदर्शन पर प्रसारण हुआ और मीडिया में चर्चा का विषय बना इससे से भी यह स्पष्ट है.
अब सवाल यह है कि, दलित और आदिवासी मतों को लेकर भाजपा इतनी चिंतित क्यों है? 2014 के चुनाव में ‘मोदी सरकार’ को 31% मत भी तब मिले जब संघ ने दो दशकों की कड़ी मेहनत और धार्मिक अनुष्ठानों के जरिए गुजरात, म. प्र., राजस्थान और छतीसगढ़ जैसे राज्यों में दलित और आदिवासीयों को हिन्दू एजेंडे का हिस्सा बनाया था; दलित और आदिवासी संघ के हिंदुत्व एजंडे को उग्र रूप देने का हिस्सा रहे हैं; गुजरात दंगों में इस वर्ग की भूमिका ने यह काफी हद तक साबित कर दिया है. (https://www.thehindu.com/2002/05/29/stories/2002052900921000.htm ) और अब इन राज्यों में हालात उलट है; विशेषकर गुजरात और म. प्र. में तो संघ परिवार के आरक्षण विरोधी रवैये और दलितों पर अत्याचार की बढ़ती घटनाओं में हाथ होने के चलते, दलित उनके खिलाफ आंदोलित हैं.
उसे इसके अलावा उ. प्र. में भी दलित मत के दूर होने से हार का खतरा लग रहा है, क्योंकि, संघ भले ही वो बिहार में जातिगत समीकरण को तोड़ने में नाकामयाब रही हो, लेकिन विशेषकर उत्तर प्रदेश में जातिगत समीकरण को अपने को ‘हम सब हिन्दू है’ के एजेंडे से तोड़ पाई और एक हद तक दलित मतदाता को भी अपनी तरफ आकर्षित कर पाई. अगर एक बार दलित वोट दूर गया तो जीत का समीकरण बिगड़ते ही पिछड़ी जातियां भी भाजपा से दूर भागेगी. 2014 के चुनाव में भाजपा को 288 लोकसभा सीट दिलवाने में दलित और आदिवासी मतों ने महती भूमिका निभाई थी; अगर यह कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि उसके सत्ता में जाने में इस वर्ग का उसके साथ आना सबसे महत्वपूर्ण था. इसे समझने के लिए जरा हम 2014 एवं 2009 के लोकसभा आमचुनाव के आंकड़ों पर नजर डाले: दलित वर्ग के लिए आरक्षित 84 सीटों में से भाजपा को 2014 में 2009 के मुकाबले 28 सीटों का फायदा हुआ था; वो 12 से बढ़कर 40 हो गई थी, यानी लगभग 235% का फायदा. अगर हम इसमें भाजपा के सहयोगी दलों को मिली 9 सीटें और जोड़ दें तो दलितों के लिए आरक्षित सीटों का कुल आंकड़ा 49 पर पहुँच जाता है. उसने उ. प्र. में तो सारी की सारी 17 आरक्षित सीटों पर अपना कब्ज़ा जमा लिया; वहीं बसपा की दलित मत में हिस्सेदारी 2009 के मुकाबले 6% गिर गई. इसी तरह पूरे देश में आदिवासी वर्ग के लिए आरक्षित 47 सीटों में से उसे 27 सीटे मिली; यह लगभग 100% बढ़ोत्तरी के साथ सीटें 13 से 27 हुई. (http://www.lokniti.org/punjab_pdf/The-Bahujan-Vote.pdf). अगर हम भाजपा के प्रभाव वाले कुछ अन्य प्रमुख राज्य देखें जहाँ अभी दलित और आदिवासी वर्ग आरक्षण सहित उन पर होने वाले सवर्ण वर्ग के अत्याचार और एस. सी. एस. टी. एक्ट को लेकर आंदोलित है, तो हमें समझ आएगा कैसे यहाँ उसने आरक्षित वर्ग की सीटों पर अपना कब्ज़ा 2009 के मुकाबले बढ़ाया है; जो अब खतरे में है: म. प्र. में: दलित वर्ग के लिए आरक्षित 2 सीट से बढ़कर सारी 4 सीटों पर अपना कब्ज़ा कर लिया। आदिवासियों के लिए आरक्षित सीट में 3 के मुकाबले सारी 6 सीटों पर कब्ज़ा कर लिया; महाराष्ट्र में: दलित वर्ग के लिए आरक्षित 5 सीट में यह आंकड़ा शून्य से दो पर पहुँच गया और उसकी सहयोगी शिवसेना का 2 से 3 सीटों का (मतलब सारी सीटों पर कब्ज़ा), और आदिवासी वर्ग के लिए यह आंकड़ा 1 से सारी 4 सीटों का हो गया; राजस्थान में: दलित वर्ग के लिए यह आंकड़ा शून्य से सारी तीन सीट का हो गया और आदिवासी वर्ग के लिए 2 से सारी 5 सीटों पर कब्जे का हो गया; गुजरात में दलित वर्ग के लिए आरक्षित सीटों पर यह आंकड़ा 1 से 4 पर पहुँच गया, हाँ आदिवासी वर्ग की सीटों पर यह आंकड़ा सभी 2 सीट से दो ही बना रहा. (https://www.mapsofindia.com/parliamentaryconstituencies/chhattisgarh/general-election-results.html) इन राज्यों सहित देश के अनेक राज्यों की सामान्य सीटों पर भी दलित और आदिवासी मतों की जीत सुनिश्चित करने की जरूरत है.
संघ यह भी जानता है कि मंडल को एक बार फिर अपने कमंडल से तोड़ने में जो कड़ी मेहनत उसने की थी, वो उसके अपने उतावलेपन और कट्टर हिंदूवादी मूल सोच की भेंट चढ़ गई; जो मनुवादी सोच पर आधारित है. क्योंकि, संघ चाहे जो कहे, लेकिन सच्चाई यही है कि, जहाँ उसमें विचार और प्रमुख पदों के स्तर पर ब्राह्मणों का बड़ा कब्ज़ा है, वहीं उसके आर्थिक रीढ़ की हड्डी काफी हद तक बनिया समाज है. इस सबके चलते, जहाँ संघ संचालक ने खुद आरक्षण के खिलाफ बयान दिया, वहीं दलितों पर जातिगत अत्याचार बढ़े; उन्हें सरेआम पीटा जाने लगा और हत्या तक हुई. इसके आलावा उत्तर प्रदेश, जहाँ से भाजपा को लोकसभा की 90% सीटें मिली, वहां दलित-पिछड़ा और मुस्लिम एकता ने उसे पिछले कई उपचुनावों में भारी पटकनी दे दी; हालात यहाँ तक बिगड़ गए कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या व्दारा खाली की गई लोकसभा सीट भी हाथ से निकल गई. उ. प्र. में सपा और बसपा के साथ-साथ कांग्रेस का भी गठबंधन होने से भाजपा को जहाँ आरक्षित वर्ग की सारी सीटें अपने हाथ से जाती दिख रही हैं, वहीं बाकी सीटों पर भी उसे घाटा होगा; क्योंकि, दलित मत सिर्फ आरक्षित सीटों पर ही मायने रखते है ऐसा नहीं है, गैर-आरक्षित सीटों को जीतने के लिए भी हर वर्ग के मत मिलना जरूरी है. तकरीबन यह ही हाल म. प्र. गुजरात, राजस्थान, छतीसगढ़, सहित अनके राज्यों में रहेगा; यहाँ अगर दलित और आदिवासी मतदाता संघ की पकड़ से दूर गया तो भाजपा को सामान्य सीटों पर भी जीत आसान नहीं होगी.
अब देखना यह है कि संघ किस हद तक अपनी इस रणनीति में सफल होता है; उसकी सफलता पर ही 2019 में नरेन्द्र मोदी का सत्ता में जाने का रास्ता खुलेगा.
अनुराग मोदी,
राष्ट्रीय प्रवक्ता, समाजवादी जन परिषद, सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्त्ता
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