87 की उम्र में जवां अपनी आकाशवाणी
87 की उम्र में जवां अपनी आकाशवाणी
इस दृष्टि से लोकप्रसारक के रूप में आकाशवाणी की चुनौतियां और संभावनाओं को उजागर करता अरुण तिवारी का लेख
आकाशवाणी की लोक प्रसारण- चुनौतियां और संभावनायें
यह मान लेना कि अब सभी संभावनायें खत्म हो गई हैं; मैं कुछ नहीं कर सकता; बुढ़ापे के लक्षण हैं। जब कोई गुजरे हुए जमाने में सिर्फ अच्छाई ही अच्छाई देखे और वर्तमान को धिक्कारे तो समझ लेना चाहिए कि उसकी जवानी गुजर चुकी है; वह अब बूढ़ा होने लगा है। किंतु यदि आकाशवाणी 87 की उम्र में अपने दायित्व की तलाश करने खुद निकल पड़े, तो एक बात दावे के साथ कही जा सकती है कि अपनी आकाशवाणी की अभी जवान है; वह बूढ़ी तो कतई नहीं हो रही।
गौरतलब है कि बीती 23 जुलाई को आकाशवाणी 87 बरस की हुई। वह स्टूडियो से बाहर निकली। उसने जलसा किया। उसके नुमाइंदों ने कैद आवाज को आजाद पक्षियों की भांति आकाश में उड़ान भरने का मौका देने वाले उस मारकोनी को याद किया, जिसने कभी रेडियो ईजाद किया। इस जलसे में उस सुबह को याद किया गया, जो आकाशवाणी की सिग्नेचर ट्यून से शुरू होती थी। अमीन सयानी की उस आवाज को याद किया गया, जिसने ’आवाज की दुनिया के मेरे दोस्तो’ कहते-कहते रेडियो के लिए दोस्तों की एक बड़ी दुनिया जोड़ी। मौजूद वक्ताओं ने उस फक्र को याद किया जो कभी उन्होने रेडियो कलाकार के तौर पर जुड़कर हासिल किया था। याद करने की कड़ी में बुखारी-केसकर जैसे अधिकारी, लहरें जैसे कार्यक्रम, शास्त्रीय संगीत, वाद्य वृंद, पुराने फिल्मी गानों से लेकर युद्ध, निक्सन-केनेडी चुनाव और इंदिरा जी की मौत जैसी खबर के नतीजों में रेडियो की भूमिका के कई किस्से ताजा हुए। वाद्य-वृंद और लोकसंगीत की महफिल भी जमी। जोश भरते कमंटेटर सरदार जसवंत सिंह और ’अब आप देवकीनंदन पांडेय से समाचार सुनिए’ कहने वाली वजनदार आवाज को याद न करने की चूक भी हुई। किंतु इस मौके का और आज जनसंचार माध्यमों पर बाजार के बढ़ते दबाव को देखते हुए एक लोकप्रसारक की भूमिका में आकाशवाणी का सबसे संजीदा और सकारात्मक पहलू यही दिखा कि उसके लोग जानना चाहते हैं कि बदलते समाज में अपने दायित्व के निर्वाह के लिए वे क्या करें।
आकाशवाणी के नुमांइदों द्वारा उछाले इस सवाल के जवाब में बहुत संभव है कि बहुत सारे लोग कहें कि आकाशवाणी को अब इसकी चिंता करने की जरूरत कहां है ? आजकल आकाशवाणी को सुनता कौन है ? वे कह सकते हैं कि आज सैकड़ों टी वी चैनल हैं। निजी एफ एम चैनल हैं। सामुदायिक रेडियो हैं। लाखों अखबार हैं। करोङो मोबाइल हैं। सामाजिक संवाद के लिए सोशल मीडिया है। जो सुनना चाहो, जानना चाहो, देखना चाहो; इंटरनेट पर पूरी दुनिया है। ऐसे में आकाशवाणी को कोई क्यों सुने ?
दरअसल, यही वह प्रश्न है कि जो आकाशवाणी के सामने एक बड़ी चुनौती भी रखता है और उसके लिए संभावनायें भी पेश करता है। चुनौती यह है कि यह कैसे हो कि दुनिया आकाशवाणी को खुद सुनना चाहें। संभावना यह है कि अपने खर्चों के लिए आकाशवाणी किसी विज्ञापन या प्रायोजक की ओर ताकने को मजबूर नहीं है। सरकार उसके खर्चे की व्यवस्था करती है। अतः आकाशवाणी लोकप्रसारक की अपनी उस भूमिका के साथ न्याय कर सकती है, जो बाजार के दबाव में जनसंचार के दूसरे माध्यम नहीं कर पा रहे। तकनीकी और भाषाई तौर पर आज जितनी विविधता और पहुंच आकाशवाणी की है, उतनी सिर्फ भारत नहीं, पूरे एशिया के किसी जनसंचार माध्यम की नहीं है। दुनिया में कोई और रेडियो अथवा टी वी चैनल समूह नहीं है, जिसके पास कर्नाटक अथवा हिंदोस्तानी शास्त्रीय संगीत व वाद्य वृंद प्रस्तुतियों को समर्पित कोई चैनल हो। कभी रेडियो घर में रखने के लिए लाईसेंस व सालाना रखना पड़ता था, आज रेडियो मुफ्त और बिना बिजली चलने वाला माध्यम है। इसे घर में सुनें या खेत की जुताई करते हुए बैल के गले में टांगकर। रेडियो किसी अनपढ़ को खेती के गुर सिखा सकता है। रेडियो किसी अंधे को पढ़ा सकता है। अपना काम करते हुए भी आप रेडियो के साथ दोस्ती कर सकते हैं। एक साथ इतनी सारी संभावनायें किसी और जनसंचार माध्यम में नहीं होना, आकाशवाणी के लिए संभावनाओं के कई द्वार खोलता है।
हालांकि पेश चुनौती से निबटने के लिए 87 वर्ष के सफरनामे में आकाशवाणी ने कई तैयारियां की हैं। 23 जुलाई, 192 को जब तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा पहले मुंबई केन्द्र का उद्घाटन किया गया, तो उद्देश्य अंग्रेजी हुकुमत के औपनिवेशिक हित साधना था। मुंबई केन्द्र के संचालन का लाइसेंस भी एक करार के तहत् साझा हुई इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कंपनी और एक निजी कंपनी को ही दिया गया था। रेडियो क्लब, मुंबई के नाम से शुरू हुए प्रसारण का नाम जून, 1936 में बदलकर आकाशवाणी हुआ। सिर्फ नाम नहीं बदला, आकाशवाणी ने अपना सूत्र वाक्य भी बदलकर ’बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय’ रख लिया।
जब भारत आजाद हुआ, तो आकाशवाणी के पास कुल छह केन्द्र, 18 ट्रांसमीटर और देश के ढाई प्रतिशत भूगोल और 11 प्रतिशत लोगों में इसकी पहुंच थी; आज आकाशवाणी के पास 413 प्रसारण केन्द्र हैं। देश के 92 प्रतिशत भूगोल और 99.19 प्रतिशत आबादी तक उसकी पहुंच है। लेह-तवांग जैसे सुदूर क्षेत्र, कठिन सीमायें और हमारे जाबांज सैनिक भी इस जद में शामिल हैं, जिन्हे आकाशवाणी के अलावा और कोई जनसंचार माध्यम बाकी दुनिया से नहीं जोड़ता। 23 भाषाओं और 146 बोलियो में इसके कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। सात भारतीय और 16 विदेशी भाषाओं के साथ आकाशवाणी का विदेश प्रसारण सेवा दुनिया के 54 देशों में अपनी पहुंच रखता है।
मनोरजंन और समाचारों के लिए मोबाइल सेट और डी2एच पर लोगों कही बढती रुचि को ध्यान में रखते हुए आकाशवाणी ने अपने कुल मौजूदा 584 ट्रांसमीटर में सबसे ज्यादा संख्या 391 एफ एम ट्रांसमीटर की ही रखी है। आकाशवाणी के प्रसारण व कार्यक्रम निर्माण की तकनीक पूरी तरह डिजीटल है। आकाशवाणी के पास राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक स्टूडियो सुविधा उपलब्ध है। डी2एच पर इसके 21 चैनल उपलब्ध है। आकाशवाणी के सभी प्रमुख कार्यक्रमों को अब आप कभी भी इंटरनेट पर सुन सकते हैं।
तकनीकी उत्थान के इस चित्र को सामने रखें, तो निस्संदेह हम कह सकते हैं कि चुनौतियों से निबटने के लिए रेडियो ने तैयारी की है। किंतु यदि आकाशावाणी के श्रोता अनुसंधान एकांश, मॉनीटरिंग एकांश की कार्यप्रणाली, उसके लिए उपयोग की जा रही तकनीक और परिणाम पर निगाह डालें, तो कह सकते हैं कि अभी और तैयारी की जरूरत है। यदि विदेश प्रसारण सेवा के प्रसारण लक्ष्य क्षेत्र से भटककर किसी दूसरे क्षेत्र में सुनाई दें, तो भी कहा जा सकता है कि तैयारी अभी पूरी नहीं हुई। विशेष श्रोता और स्थान विशेष के लिए एफ एम ट्रांसमीटरों का इस्तेमाल बड़े-बड़े राजमार्गों के बीच जन-जुड़ाव की पगडंडियों का एक विशाल संजाल खड़ा कर सकता है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि नई उपलब्ध तकनीक का जितना अधिकतम सदुपयोग संभव है, वह किया जाना अभी बाकी है।
1990 में प्रसार भारती कानून बनकर जब सामने आया, तो संभावना जताई गई थी कि अब आकाशवाणी व दूरदर्शन सरकार की छाया बनकर नहीं रहेंगे। फिर जब निजी टी वी चैनलों को मंजूरी मिलनी शुरु हुई, तब फिर कहा गया कि सरकारी छाया से मुक्त होना, आकाशवाणी-दूरदर्शन के लिए अब एक मजबूरी होगी। अदालत में पड़ी एक याचिका के बाद आज फिर कहा जा रहा है कि आकाशवाणी-दूरदर्शन जल्द ही सरकारी छाया से मुक्त हो जायेंगे। यहां विचारणीय प्रश्न है सुदूर इलाकों में लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए सरकार के पास आकाशवाणी और दूरदर्शन जैसे व्यापक पहुंच वाले क्या कोई और माध्यम उपलब्ध हैं ? कुछ सरकारी वेबसाइट, पोर्टल व सरकारी पत्रिकायें हैं। उनकी पहुंच सीमित है और गरीब की आवाज की सीधी उपस्थिति उनमें भी नहीं है। केन्द्र से लेकर राज्य व जिला स्तरीय सूचना व जनसंपर्क केन्द्र भी महज औपचारिक बनकर रह गये हैं।
ऐसे में आकाशवाणी-दूरदर्शन को सरकारी छाया से मुक्त होने से ज्यादा जरूरत, क्या सरकारी नीतियों, कानूनों व लोक योजनाओं की जानकारी तथा कार्यप्रणाली को और मुस्तैदी और ईमानदारी के साथ लोगों तक पहुंचाने की नहीं है ? जरूरत सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन और उसमें आ रही दिक्कतों को उजागर करने की है। जरूरत है कि एक लोक प्रसारक के रूप में आकाशवाणी सरकार व लोगों के बीच में डाकिये तथा लोक निगरानी तंत्र की भूमिका निभाये।
हाल ही में अखबारों में एक खबर आई - ’’35 बाल्टी पानी दो, वरना् गोली खाओ।’’ किसी डकैत द्वारा उत्तर प्रदेश के जिला बांदा के किन्ही गांवों को भेजे इस संदेश पर किसी लोकसभा-विधानसभा में हंगामा नहीं हुआ। क्योंकि यह खबर पढ़कर किसी राजनेता को तकलीफ नहीं हुई। मौके पर मौजूद अर्थशास्त्री डा संतोष महरोत्रा ने वाजिब संदर्भ उठाया। उन्होंने कहा कि 2004 से लेकर 2011 तक के जनगणना दस्तावेजों के मुताबिक भारत के एक-चौथाई अघ्यापक विद्यालय ही नहीं आते। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में डॉक्टर की उपस्थिति के आंकड़े बेहद निराशाजनक हैं। गरीबी रेखा से नीचे होते हुए भी बीपीएल कार्डधारक बन पाने का सपना कई को अभी भी इस जन्म में पूरा होता नहीं दिखता। उचित दर दुकानों से हक का राशन लेना गांवों में अभी एक जंग लड़ने जैसा है। आकाशवाणी जैसे लोकप्रसारक की असल भूमिका लोक जरूरत के ऐसे मसलों को सामने लाने की है। हालांकि ’स्वास्थ्य सेवाओं का स्वास्थ्य’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए आकाशवाणी यह भूमिका निभाता भी रहा है; किंतु अब जरूरत इससे आगे जाने की है। यह तभी संभव है, जब आकाशवाणी-दूरदर्शन के संवाददाता प्रेस विज्ञप्ति व बयान आधारित समाचारों की दुनिया से बाहर निकलें। कार्यक्रम निष्पादक स्टूडियो से बाहर निकलकर पगडंडियों के पैदल रास्ते पर चलकर गांवों की उस उपेक्षित दुनिया में जाने की खुद पहल करें, जिन्हे आज भी इंतजार है कि कोई आयेगा और एक न एक दिन उनकी आवाज सरकार द्वारा सुनी जायेगी। रेडियो सुनकर और उसके प्रसारक को अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराकर दायित्व निर्वाह की इस प्रक्रिया को हम दोतरफा बना सकते हैं। आइये, बनायें।


