जंतर-मंतर की 2,263 खबरें, जीबी रोड की सिर्फ 3! दिल्ली में इन महिलाओं की आवाज़ कौन सुनेगा?

  • जीबी रोड की 500 से अधिक महिलाओं की मतदाता पात्रता पर सवाल
  • जंतर-मंतर से सिर्फ तीन किलोमीटर दूर जीबी रोड की समस्याएं मीडिया से दूर क्यों?

जंतर-मंतर की 2,263 और जीबी रोड की सिर्फ 3 सुर्खियां! कौशिक बोस ने दिल्ली में मीडिया कवरेज, यौनकर्मी महिलाओं के मताधिकार, मतदाता सूची, नागरिक सुविधाओं और लोकतांत्रिक अधिकारों की अनदेखी पर सवाल उठाए हैं। जानिए दिल्ली के इस जमीनी विश्लेषण के आंकड़े।

कॉकरोच और अनदेखा मतदाता : दिल्ली दूर का नारा सुन लेती है। तीन किलोमीटर दूर के मतदाता की आवाज़ क्यों नहीं सुनती?

कौशिक बोस

2,263 जंतर मंतर वाले शीर्षक

3 जीबी रोड वाले शीर्षक

3.0 किमी सीधी रेखा में दूरी

दिल्ली कई दिनों से एक कॉकरोच के पीछे है। यह रसोई वाला कॉकरोच नहीं है, जो बत्ती जलते ही भाग जाए। यह कॉकरोच जनता पार्टी है। इसके समर्थक हैं, राजनीतिक माँगें हैं और सुर्खियाँ बटोरने की क्षमता भी। मतदाता सूची में संशोधन पर सवाल उठे। पुलिस ने बैरिकेड लगाए। कैमरे पहुँच गए। लेकिन क्या वोट का सवाल सिर्फ वहीं है, जहाँ कैमरा है?

लगभग तीन किलोमीटर दूर जीबी रोड है। सरकारी नाम स्वामी श्रद्धानंद मार्ग। नीचे हार्डवेयर और वाहन के पुर्ज़ों की दुकानें हैं। ऊपर यौनकर्मी महिलाएँ रहती और काम करती हैं। द गार्जियन की सितंबर की पड़ताल के अनुसार, लगभग 650 पूर्व-पंजीकृत यौनकर्मियों में कम-से-कम 500 ‘स्थानांतरित’ चिह्नित थीं या दस्तावेज़ों के अभाव में पात्रता स्थापित नहीं कर पाई थीं। ये अखबार के आँकड़े हैं; मैंने स्वतंत्र गिनती नहीं की है। विवादित प्रविष्टि का मतलब स्थायी रूप से वोट का अधिकार छिन जाना भी नहीं है।

अब सवाल देखिए। वोट के अधिकार पर नारे लगाने वाले सबको दिख रहे थे। उसी अधिकार के लिए अपना नाम साबित करने की कोशिश कर रही महिलाएँ लगभग अदृश्य थीं। मुद्दा दोनों का लोकतंत्र था। फर्क यह था कि एक तरफ लाउडस्पीकर था।

01 खबर का भी एक पता होता है

मैंने इस अंतर को गिनकर देखने का फैसला किया। अपने भूस्थानिक शोध प्रकल्प में 1 सितंबर से 12 अक्टूबर के अंग्रेज़ी गूगल न्यूज़ शीर्षक जाँचे। दोहराव हटाने पर 2,263 शीर्षकों में जंतर मंतर का नाम मिला। जीबी रोड का नाम सिर्फ तीन में था। अकेले 10 अक्टूबर को 132 समाचार संस्थानों के 493 शीर्षकों में जंतर मंतर आया।

आँकड़े चौंकाते हैं। पर उनकी सीमा समझिए। यह मेरे जुटाए सर्च-फीड का नमूना है, पूरे भारतीय मीडिया का स्वतंत्र ऑडिट नहीं। गूगल न्यूज़ की अपनी चयन-प्रक्रिया और नतीजों की सीमा है। खबर जीबी रोड पर हो सकती है, भले शीर्षक में नाम न हो। द गार्जियन की रिपोर्ट ऐसी ही थी। नाम हटने की एक अन्य खबर मेरे फीड में आई ही नहीं। इसलिए यह जगह के नाम वाले शीर्षकों की गिनती है, समुदाय पर हुई सारी रिपोर्टिंग की नहीं।

क्या यह सिर्फ जीबी रोड के साथ हुआ? नहीं। जीबी रोड समेत दस इलाकों के नाम कुल 126 शीर्षकों में मिले। अकेले जंतर मंतर की संख्या उनसे करीब अठारह गुना थी। बात एक सड़क की नहीं। सवाल यह है कि एक मंच की आवाज़ इतनी बड़ी कैसे हो जाती है कि आसपास के मोहल्ले सुनाई ही नहीं देते?

हर सड़क को बराबर जगह देना संभव नहीं। लेकिन एक प्रदर्शन स्थल पर हजारों शीर्षक और दस मोहल्लों पर गिने-चुने शीर्षक क्यों? तख्ती की तस्वीर तुरंत मिल जाती है। बयान भी तैयार मिलता है। खराब नाली की खबर के लिए लौटकर देखना पड़ता है कि काम हुआ या नहीं। खबर का असर शाम के बुलेटिन से आगे भी जाना चाहिए।

यह विरोध प्रदर्शन के खिलाफ तर्क नहीं है। शांतिपूर्ण असहमति ज़रूरी है। कॉकरोच जनता पार्टी मतदान अधिकार का गंभीर सवाल उठा रही है। समस्या उसकी आवाज़ सुनने में नहीं। समस्या यह है कि बाकी लोगों को सुने जाने के लिए भी कोई तमाशा करना पड़े।

02 नक्शे पर सुविधा है तो मुश्किल क्यों है

मैं जीबी रोड के आसपास सुविधाओं की कमी खोजने निकला था। नक्शे ने अलग तस्वीर दिखाई। सुविधाओं, सड़कों और आबादी पर बने मेरे पैदल पहुँच सूचकांक में यह क्षेत्र 1,899 आबादी वाले दिल्ली क्षेत्रों के बीच 96वें परसेंटाइल पर था। यानी इस माप में करीब 96 प्रतिशत क्षेत्रों से आगे। कागज़ पर सुविधाएँ पास थीं।

फिर मैंने पूछा। इन सुविधाओं को बाँटने वाले लोग कितने हैं?

जीबी रोड के आसपास एक किमी पैदल दूरी के क्षेत्र में लगभग 58,000 निवासियों का अनुमान था। जंतर मंतर के आसपास 11,900। ये मॉडल से निकले अनुमान हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि 58,000 लोग जीबी रोड पर ही रहते हैं। नक्शे की गणना में जीबी रोड के आसपास करीब 9,700 निवासियों पर एक सार्वजनिक शौचालय था। जंतर मंतर के क्षेत्र में प्रति निवासी स्थिति बेहतर दिखी। लेकिन वहाँ काम करने वाले और आने वाले लोग इस निवासी गिनती में नहीं हैं।

क्या इसे सफाई की जाँच मान लें? बिल्कुल नहीं। नक्शे का निशान नहीं बताता कि नल में पानी है, शौचालय सुरक्षित है या पार्क सबके लिए खुला है। जंतर मंतर के यात्रियों और कर्मचारियों को भी याद रखना होगा। फिर भी मूल बात साफ है। सुविधा पास होना और सबके लिए पर्याप्त होना, दो अलग बातें हैं।

जनवरी 2025 की पीटीआई रिपोर्ट में भी जीबी रोड की सफाई, पानी और बिजली की समस्याएँ दर्ज थीं। शिकायत मौजूद है। कमी लगातार पूछे जाने वाले सवाल की है। काम कौन करेगा? बजट कितना है? पूरा कब होगा?

03 हरियाली कागज़ और वोट का अधिकार

उपग्रह की तस्वीर में भी फर्क दिखा। 10 अक्टूबर की तस्वीर के विश्लेषण में जंतर मंतर के एक किलोमीटर वाले नमूना क्षेत्र का 68 प्रतिशत हिस्सा वनस्पति की तय सीमा में आया। जीबी रोड के तुलनीय क्षेत्र में 16 प्रतिशत। यह पेड़ों की गिनती या गर्मी का आकलन नहीं, वनस्पति सूचकांक है। लेकिन दोनों इलाकों की बनावट कितनी अलग है, यह दिखता है।

अब मतदान देखिए। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2025 के आधिकारिक आँकड़ों में मतदान केंद्रों पर दर्ज मतदान बल्लीमारान में 63.90 प्रतिशत और नई दिल्ली में 56.41 प्रतिशत था। जीबी रोड के पास का बड़ा हिस्सा बल्लीमारान में आता है; जंतर मंतर नई दिल्ली में है। ध्यान रहे, यह विधानसभा क्षेत्रों की तुलना है। इससे किसी यौनकर्मी महिला या सड़क के मतदान का निष्कर्ष नहीं निकलता।

विडंबना देखिए। जिस इलाके को हाशिये पर मान लिया जाता है, उसके निर्वाचन क्षेत्र में अच्छी भागीदारी है। सत्ता के केंद्र वाले क्षेत्र में मतदान कम रहा। किसी नागरिक का पता हमें असहज करता है, तो क्या सरकार की जिम्मेदारी उसके लिए कम हो जाएगी?

मतदाता सूची सही होनी चाहिए। मृत व्यक्तियों और दोहरी प्रविष्टियों का सुधार ज़रूरी है। चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ भाजपा इस आरोप को खारिज करते हैं कि संशोधन किसी दल को लाभ देने के लिए किए गए। उनका पक्ष भी सामने आना चाहिए। लेकिन उन महिलाओं का पक्ष कौन सुनेगा जिनके कागज़ पूरे नहीं हैं? जो परिवार से अलग हैं या कम उम्र में तस्करी का शिकार हुई थीं? अधिकार की प्रक्रिया ऐसी हो कि हकदार व्यक्ति उसे पूरा कर सके।

04 शहर का जाम पहले से था

अक्टूबर के प्रदर्शन में मैंने रास्ते भी देखे। स्नैपशॉट में 10 अक्टूबर, शनिवार सुबह नई दिल्ली स्टेशन से केंद्रीय सचिवालय का सबसे तेज़ सुझाया मार्ग 12.3 किमी था। 12 अक्टूबर, सोमवार भोर से पहले 4 किमी। दो दूर के नियंत्रण मार्गों की लंबाई नहीं बदली। रास्ता बदलने का संकेत है। लेकिन दिन और समय अलग हैं। इससे प्रदर्शन के कारण यात्रियों के कितने मिनट गए, यह नहीं बताया जा सकता।

प्रदर्शन की सुबह श्रद्धानंद मार्ग पर आंशिक बंदी का संकेत था, फिर भी वाहन चल रहे थे। सोमवार को भी सड़क धीमी दिखी। संभव है, जाम वहाँ रोज़ की समस्या हो। मैं प्रदर्शन का असर खोजने गया था। नतीजे ने मेरे अनुमान पर ही सवाल लगा दिया। अच्छा हुआ। आँकड़ों का काम हमारी पसंद की कहानी पर मुहर लगाना नहीं है।

12 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने घोषणा की कि जंतर मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटा दिया गया है। विकल्प में रामलीला मैदान, बुराड़ी मैदान और सीबीडी ग्राउंड बताए। प्रशासन सार्वजनिक व्यवस्था की बात करता है। आलोचक पूछते हैं कि केंद्र से दूर करने पर विरोध का असर कितना बचेगा। 13 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर और प्रदर्शनकारी हिरासत में लिए गए। लोकतंत्र कहाँ बोल सकता है, यह बड़ी खबर है। कौन वोट दे सकता है, वह भी बड़ी खबर होनी चाहिए।

मतदाता सूची की अपील कोई एहसान नहीं। प्रक्रिया उस नागरिक के लिए भी आसान हो, जिसके पास स्कूल के कागज़, स्थायी पता या वकील की फीस नहीं है। सूची सुधारना ज़रूरी काम है। पर कमजोर नागरिक उसके रास्ते में ही हार जाए, तो व्यवस्था की जाँच भी ज़रूरी है। रिकॉर्ड में व्यक्ति का नाम न मिले तो क्या उसका अस्तित्व मिट जाता है?

दिल्ली दोनों जिम्मेदारियाँ निभा सकती है। शांतिपूर्ण विरोध की रक्षा करे और प्रतिबंधों का असर भी जाँचे। सूची की गलतियाँ सुधारे और हर वास्तविक मतदाता को सुनवाई दे। प्रदर्शन कहाँ होगा, यह पूछते समय उन गलियों को न भूलें जहाँ नागरिक रहते हैं।

मैंने पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया में रेडियो दूरबीन के बुनियादी ढाँचे पर वर्षों काम किया है। ब्रह्मांड के सबसे हल्के संकेत सुनने के लिए इंजीनियर आसपास का शोर कम करते हैं। इतनी शांति बनाने में बड़ी मेहनत लगती है।

दिल्ली में उलटा होता है। नारा पूरी राजधानी में गूँजता है। बैरिकेड ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाता है। नेता का गुस्सा स्टूडियो पहुँच जाता है। तीन किलोमीटर दूर एक महिला से अपने होने का प्रमाण माँगा जाता है। उसकी आवाज़ कौन सुनता है?

कॉकरोच जनता पार्टी ने खुद को अनदेखा करना मुश्किल बना दिया। लेकिन किसी मतदाता को सुनवाई के लिए पोशाक, भीड़ या टकराव क्यों चाहिए? उसका नागरिक होना ही पर्याप्त होना चाहिए।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)