यूजीसी 2026 विनियम: समता, समानता और सामाजिक न्याय पर असमंजस—क्या उच्च शिक्षा में वंचितों को मिलेगा वास्तविक संरक्षण?

  • यूजीसी 2026 अधिसूचना: समता का दावा और यथार्थ
  • एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून 1989: तीन दशक बाद क्या बदला?
  • संवैधानिक प्रावधान बनाम संस्थागत निष्पादन
  • आरक्षण बैकलॉग और एनएफएस: प्रतिनिधित्व का संकट
  • एनसीआरबी आँकड़े और विश्वविद्यालयों में बढ़ता जातिगत उत्पीड़न
  • समता समिति, हेल्पलाइन और समान अवसर केंद्र: पारदर्शिता के प्रश्न
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और ‘पूर्ण समता’ की अवधारणा
  • आवश्यक संशोधन: दंडात्मक प्रावधान, पुनर्समीक्षा और जवाबदेही
  • कागज़ी आश्वासन या संरचनात्मक बदलाव?

समता, समानता, सामाजिक न्याय व निष्पक्षता को लेकर असमंजस और अविश्वास की वजह :

(विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, 13 जनवरी 2026 अधिसूचना)

उच्चा शिक्षा संस्थानों में ‘समता के संवर्धन’ की खातिर जो नियम एससी, एसटी, ओबीसी वर्ग के अधिकारों, हितों और सामाजिक सुरक्षा के लिए बनाये गये जिससे उच्च शिक्षण संस्थानों में जो हिंसा हो रही है, दुर्व्यवहार हो रहा है जातिगत भेदभाव सहने के लिए अकादमिक संस्थानों - निजी और सरकारी दोनों ही में करने को मजबूर हैं. जबकि कानूनी तौर से इन्हें सामजिक सुरक्षा देने के लिए ही THE SCHEDULED CASTE AND SCHEDULED TRIBES (PREVENTION OF ATROCITIES ) ACT 1989 कानून बनाया गया. जिससे एससी एसटी के ख़िलाफ़ जो भी जातिगत हिंसा भेदभाव अत्याचार और उत्पीड़न यौन उत्पीड़न हो रहे हैं, उन्हें रोका जा सके. मूलतः इन अपराधों में शामिल जातिसूचक गाली देना, पब्लिक प्लेस में वंचित समुदाय को अपमानित करना और जमीन से जबरन बेदखल करना तथा यौन शोषण शामिल है इसके विरुद्ध- गिरफ्तारी, मुआवजा, पुनर्वास की व्यवस्था की गई जल्द से जल्द अपराध निवारण के लिए विशेष अदालतें बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ और 31 मार्च 1995 के दिन देशभर में समान नागरिक सुरक्षा एवं अधिकार के तहत इस कानून को लागु किया गया बावजूद इसके तब से अब तक इन बीते 30 बर्षों में क्या हुआ? अपराध की घटनाएँ बढीं या घटीं ? कितने प्रतिशत मामले दर्ज हुए और कितने निबटान हुए? क्या एस सी, एसटी, के साथ होने वाले अपराधों में कमी आई ? यहाँ तक कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति, जनजातीय आयोग बने. और कानूनी तौर से अनुच्छेद १७ अस्पृश्यता का अंत, अनुच्छेद 15 (४) और 16 (४) आरक्षण की अनुमति और जातिगत भेदभाव निषेध, अनुच्छेद ४६ शिक्षा में आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के लिए और अनुच्छेद ३४१-३४२ एससी एसटी की पहचान को सूचीबद्ध करने के लिए बनाया गया. साथ ही सामाजिक अन्याय के खिलाफ अनुच्छेद ३५ में जो शक्तियाँ निहित हैं उन्हें भी लागू किया गया. परन्तु देश में लागू इन कानूनों के असल मायने क्या हैं? अपराधों के आंकड़े क्या साबित करते हैं? सभी अपराधों में शामिल सबसे घृणित यौन हिंसा के मामलों में क्या कोई गिरावट आई? इन सभी सवालों का जवाब है नहीं, हरगिज नहीं. ऐसा कुछ भी नहीं हुआ जो कानूनी तौर से लागू हुआ. केवल कागज़ काले होते रहे और हर क्षण निर्दोष और मासूम बहुजन को जातिवादी हिंसक धार्मिक उग्रपंथियों, अकादमिक ब्राह्मणवादी कट्टरपंथी ताकतों के सामने खुल्ला छोड़ दिया गया. इस हवाले कि कानून बन गया अब अपना बचाव कर के दिखाओ.

अब आइये बात करते हैं यूजीसी के अधिनियम २०२६ के बारे में.

चूँकि ना तो यूजीसी देश के बाहर है न यूजीसी का सिस्टम ताकतवर खण्डपीठों, मठाधीशों, अकादमिक तन्त्र के खूंख्वार अपराधियों से अलग है. न यहाँ लागू होने वाले आरक्षण की कोई बिसात है. न तो मजाल है कि कोई संस्थान यूजीसी और संविधान के तहत लागू एससी एसटी ओबीसी को मिलने वाले आरक्षित सीटों के खाली पद भर सके. एक तरफ सवाल है आज़ादी के बाद ७५ बर्षों से खाली पड़े एससी एसटी के पदों का जो बैकलॉक कभी भरा नहीं गया. जिसे एनएफएस ( ८०% से अधिक ओबीसी और ८३% से अधिक एससी एसटी पदों को अभी तक खली हैं.) घोषित कर हर तीसरे विज्ञप्ति में थर्ड टाइम इन्हीं पदों को विज्ञप्ति में जनरल कैटगरी में तब्दील किया जाता रहा है. इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन एससी एसटी ओबीसी समूहों की ओर से देशभर में कहीं देखने को नहीं मिला. जबकि आरक्षित पदों को असंविधानिक तरीके से अनरिसर्व कैटगरी को रेवड़ी की तरह बाँटे गये. इस मामले में यूजीसी और एससी एसटी ओबीसी आयोग ने कभी इस्का दस्तावेजीकरण नहीं किया ना ही इसे गम्भीरता से लेकर कोई विचारात्मक कार्रवाई की. न ही एससी एसटी रीजनल पार्टियों ने न ही संसदीय सदस्यों ने इस मामले को संसद में पेश किया. न ही कभी कोई समीक्षा बैठकें हुई. जिनके तहत इन मामलों में कोई गंभीर पुनर्विचार देखने को मिला..

खासकर गलोब्लाइजेशन के बाद सन १९९० से जब अकादमिक जागरूकता बढ़ने लगी. लगभग १९९५ के बाद तब इसे बड़ी ही चालाकी से अकादमिक तन्त्र ने एनएफएस में तेजी बरती. और अंततः रोस्टर सिस्टम लागू कर हुआ. यहाँ पूरे तरीके से संविधान और आरक्षण को ताक पर रखकर बेख़ौफ़ आरक्षण विरोधी तन्त्र स्थापित किया गया. किन्तु यूजीसी ने कोई सवाल जवाब कभी नहीं किया. इसी तरह से पाठ्यक्रमों में भी जो बदलाव हुए खासकर इन 15 बरसों के भीतर यूजीसी ने इस पर भी कोई आपत्ति नहीं की. हालांकि यूजीसी २०२६ विनियम को वंचित समुदायों के हितों की खातिर खासकर जातिगत भेदभाव और उत्पीडन के मामले में बेहद क्रन्तिकारी माना जा रहा है इसे लागू करने के दौरान ही जो सवर्णों के आन्दोलन इसके विरोध में हुए उनके खिलाफ भी देशभर में यूजीसी और सरकारी तन्त्र ने कोई रोक नहीं लगाई बल्कि मीडिया और अकादमिक संस्थानों ने मिलकर इस आन्दोलन को और अधिक ताकत और मजबूती देने का काम किया. जबकि ओबीसी को १९९० में आरक्षण दे दिया गया ताकि वंचित समुदाय एक होकर अपना प्रतिनिधित्व कर सकें. मगर एक तरफ ८५% वंचितों की आबादी के लिए 49.5% आरक्षण. दूसरी तरफ 15% आबादी के लिए 50.5% हिस्सेदारी को ख़ामोशी से लागू किया गया और इतना ही नहीं पुरे देश में सम्पूर्ण संसाधनों पर 95% हिस्सेदारी हासिल की. ऐसे में मीडिया से लेकर अर्थतन्त्र के सारे संसाधन अनारक्षितों के हाथों में मजबूती से बने हुए हैं. जिन्हें एससी, एसटी, ओबीसी अल्पसंख्यक और महिलाएं चाहकर भी इनसे अपना हक़ ले नहीं सकते. असंवैधानिक तरीके से भरे हुए सभी पदों को न तो रिक्त करवाया जा सकता है न ही सवर्णों द्वारा संसद से लेकर लोकतंत्र के सभी स्तंभों पर जो भी उच्च कोटि के पद और रोजगार के अन्य संसाधन हैं जब इनके हाथों में पूरी तरह से सौंप दिया गया तब क्या ये मान लिया जाय यूजीसी और संविधानिक संस्थाएं वंचितों के पक्ष में इन्साफ करेंगी या ये केवल कागजी कार्रवाई कर सोची समझी साजिश कर रही हैं. लोकतंत्र के भीतर चल रहे राजनितिक सामाजिक सांस्कृतिक खेल में सारे अकादमिक संसदीय, संवैधानिक अपराधी, सन्यासी, मठ, मंदिर, हिन्दू धार्मिक कट्टरपंथी और लिबरल समूह इकट्ठे हैं और वंचितों के ख़िलाफ़ मोर्चे पर डटकर लड़ाई लड़ रहे हैं. वे अनुच्छेद 19 के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का इस्तेमाल कर रहे हैं. एकत्रित होने का अधिकार इस्तेमाल कर रहे हैं. जबकि वंचितों के लिए इन्हीं अधिकारों का इस्तेमाल करने पर प्रतिबन्ध मालुम होता है इस मजबूत कड़ी को तोड़ने के लिए राजनीतिक और प्रशासनिक साजिश और षड्यंत्र किये जा रहे हैं. जबकि हथियारबंद हिंदुत्त्व्वादी दस्तों और हिंसक जुलुस निकालने वाले सवर्णों के आन्दोलन को कानूनी व्यवस्था समर्थन दे रही है. घोषित रूप से कानून व्यवस्था और सवर्ण मीडिया ने इनके जुलुस, प्रदर्शनों को सार्वजनिक सुरक्षा दी और तोड़फोड़ अराजकता उपद्रव के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं की. चूँकि मामला सवर्णों का है तो कानून गांधी के तीन बन्दर बनकर मूक बैठा है मगर जब बात वंचितों के हक़ की आई तो कानूनी जामा ओढ़े यही बन्दर पागलों की तरह वंचितों के समुदायों में घुसकर तरह तरह से नोचने खसोटने काटने जख्म देने के लिए खुद हकमारी के लिए भीड़ के साथ उपद्रव में शामिल हैं वंचितों के विरुद्ध सड़कों पर उतरे हैं..

मात्र ३% सवर्णों के द्वारा यूजीसी विनियम २०२६ विरोधी आंदोलनों के बाद एससी एसटी ओबीसी अल्पसंख्यक समूह मिलकर उच्च शिक्षा में समता के संवर्धन हेतु यूजीसी २०२६ के पक्ष में रैली, जुलुस धरना प्रदर्शन और आन्दोलन कर रहे हैं. इनके ख़िलाफ़ प्रशासन की ओर से लाठीचार्ज और हिंसक कार्रवाई की गई.. पुलिस और कानून व्यवस्था अकादमिक तन्त्र के सवर्ण समूहों संग आरक्षितों के आन्दोलन के विरुद्ध आमने सामने मुकाबले में डटकर खड़े हैं.

जबकि अभी तो २०२६ विनियम के भीतर की कमियों खामियों और संशोधन करने और इसे किस तरह से और अधिक कड़ाई से लागु किया जाय इस पर कोई बात हुई ही नहीं. यूजीसी द्वारा दी गई प्रस्तावना देखें तो इसमें पारदर्शिता और विश्लेषण की बड़े पैमाने पर कमी है

इस लिहाज से तीन बातें मूल रूप से गौर करने लायक है

1. पहली बात, राष्ट्रीय शिक्षा निति 2020 पूर्ण समता( equity )एवं समावेशन

जो नियम, शर्तें, इसमें जानबूझकर या गलती से, समयाभाव या मंशावश नहीं शामिल हो सकी वो कमियाँ क्या हैं? इन्हें उजागर करना जरुरी है. आखिर पूर्ण समता और समावेशन क्या है यह कैसे परिभाषित है ? इसकी विधिवत विस्तृत कोई विवरण विश्लेषण यहाँ नहीं मिलता. समता में सामाजिक न्याय (social justice ) और नस्लीय न्याय (racial justice ) दोनों अलग अलग हैं यूजीसी किस न्याय की ओर संकेत कर रही है? यह स्पष्ट नहीं है. चूँकि न्याय और समता के लिए अलग अलग विधान हैं. निष्पक्षता कितनी है? न्यायसंगत और तटस्थ है कितना यह समावेशन ? इसकी स्पष्ट रुपरेखा नहीं है.

2. समानता में व्यक्तिगत जरूरतों के आधार संसाधनों और अवसर पर अधिकार शामिल हैं –

3. जबकि समता में प्राकृतिक न्याय शामिल है जो पूर्वाग्रह और पक्षपात से मुक्त हो. यानि निष्पक्षता को बढ़ावा दे.

समता मूलतः जरूरतमंद समूहों के पास संसाधनों को जरूरत और अवसर की मांग के हिसाब सुविधा और अधिकार मुहैया करवाती है. जबकि समानता में जरूरतमंद व्यक्ति को फायदा और संसाधन तथा अवसर मुहैया किये जाते हैं ताकि वो सभी के समान बराबरी से खड़ा हो सके.

4. इक्विटी यानि समता वंचित समूहों के लिए आर्थिक आधार पर अधिकार की पक्षधर है.

5. विवि, अनुदान आयोग जिन समूहों, के साथ भेदभाव के विरुद्ध है उनके पक्ष में किस तरह के कड़े नियम पालन करने की अनुशंसा करता है. यह दण्डात्मक विधि-विधान उद्धत नहीं है.

6. यूजीसी १९५६ और २०१२ के जिन उपधाराओं का उल्लेख करती है उनका मकसद ही यह दिखता है कि सब धान एक पसेरी यानी अगड़ा, पिछड़ा, वंचित, शारीरिक रूप से अक्षम, आर्थिक रूप से कमजोर कोई भी वर्ग, वर्ण, नस्ल, धर्म आदि को बराबर मूल्य, मान्यता, आर्थिक और सामजिक तथा शैक्षणिक बराबरी का दर्जा और संसाधन मिलेंगे. तो फिर यह केवल वंचित वर्गों, समूहों, जातियों और गरीबी की रेखा से नीचे जीने वाली बहुजन आबादी की पक्षधर और प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था कैसे फैसला दे सकता है? फिर सवर्णों के विरोध और अनुचित मांगों पर सुप्रीम कोर्ट कैसे स्टे लगा सकता है? एक स्वायत्त संस्था होने की जिम्मेदारी और भारतीय संविधान के नियमों का अनुपालन करने वाली संस्था यूजीसी के उस संक्षिप्त शीर्षक (ग) का मतलब क्या रहा?

7. समता समिति का प्रमुख शिक्षण संसथान का प्रमुख पदासीन व्यक्ति होगा यह अपने आप में एक भेदभाव पूर्ण प्रणाली है. चूँकि केन्द्रीय और राज्य स्तरीय विवि. में ९८% सवर्णों का दबदबा है. फिर समता के अनुरूप वंचितों के हक़ में न्याय की उम्मीद कैसे मुमकिन है.

8. समता हेल्प लाइन कैसे पारदर्शी और निष्पक्ष होकर कार्य करेगी इसके लिए कोई सटीक व्याख्या मौजूद नहीं है.

9. समान अवसर केंद्र की क्या भूमिका होगी यह तंत्र कैसे सुनियोजित तरीके से क़ानूनी ढंग से काम करेगा इसका जिक्र विस्तार से नहीं किया गया.

10. संकाय सदस्यों में वंचितों का प्रतिनिधित्व ही नदारत है ऐसे में न्याय के लिए बनाई जाने वाली समिति में कैसे ठीक ठीक प्रत्येक एससी एसटी ओबीसी अल्पसंख्यक और हाशिये की स्त्रियों का बराबर विभाजन मुमकिन कैसे हो सकेगा. इसके लिए साल भ्र में रिक्त आरक्षित पदों को पहले भरा जाय और तब तक सभी विवि आपस में मिलजुलकर वंचितों के हक़ की खातिर समितियों को अपने संकाय सदस्य उपलब्ध करवाएं. यह प्रावधान इसमें जोड़ा जाय.

11. शिकायत का अर्थ पीड़ित व्यक्ति जो इस विनियम में है. से संदर्भित किया गया है किन्तु पीड़ित व्यक्ति किसी भी समुदाय, वर्ग जाती, लिंग, धर्म और नस्ल का हो सकता है इससे अन्य शिकायतों के साथ गम्भीर उत्पीडन की शिकायतें मिश्रित होने की सम्भावना बढ़ जाती है. इसे पीड़ित व्यक्ति की बजाय वंचित समुदायों के लिए उपयोग होने वाली धाराओं का इस्तेमाल करना उचित होगा. छात्रों का उत्पीड़न के मामले तमाम तरीकों से होता है इसे स्पेसिफाई करने के लिए विनियम और एससी एसटी ओबीसी एक्ट की धारा THE SCHEDULED CASTE AND SCHEDULED TRIBES (PREVENTION OF ATROCITIES ) ACT 1989 से जोड़ा जाय.

12. संस्थान का प्रमुख हाई कोर्ट के तीन जजों की बेंच हो जिनमें एससी एसटी ओबीसी माइनॉरिटी वंचित समुदाय की कार्यकर्ता महिला मेम्बर की बेंच हो. जिसके अधीन संसथान का मुखिया भी हो. कुलपति इस कमिटी का हेड न बनाया जाय.

13. लोकपाल की नियुक्ति हर एक साल के लिए हो और इसमें उप लोकपाल तथा सहायक लोकपाल तीन सदस्य हों. जिन्हें आरक्षित वर्गों से चुना जाय. ताकि न्याय में कोई संदेह न रहे. न्याय मित्र विकल्प आधारहीन है.

14. समता संवर्धन के उपाय, भेदभाव की घटना के मामले में प्रक्रिया, अपील, निगरानी अनुपालन न करने के परिणाम ऐसे निर्दिष्ट हैं जैसे कोई NGO रजिस्टर्ड संस्था की कोई योजना हो जो सामूहिक और सर्वांगीण विकास के मातहत सभी वर्गों को एकसाथ समेटकर चल रही है. इसे ठोस और अधिक क़ानूनी तथा दण्डात्मक त्रिकोण को अधिक कड़ाई से लागू किया जाय.

क्या है जिसे इस विनियम में होना चाहिए :

दूसरी बात, भारतीय न्याय संहिता में जो मसौदे रखे गये थे एससी, एसटी ओबीसी अल्पसंख्यक और वंचित तबके की महिलाओं को लेकर (जिनमें शिकायतकर्ताओं ने यदि किसी भी फॉर्म में अपनी तकलीफ दर्ज की है उसके ख़िलाफ़ दंडात्मक कार्रवाई का आदेश क्यूँ नहीं हुआ.) उन फाइलों पर पुनर्विचार करने की मंजूरी मिले. विशेषकर RTI ACT 2005 के तहत लम्बे समय से लम्बित फाइलों और वंचितों के विरुद्ध फैसलों के ख़िलाफ़ दर्ज शिकायतों पर पुन्र्विर्चार समीक्षा बैठकें की जाएँ. और हर छह महीने के भीतर 50% मामलों का निपटारा किया गया यह तय किया जाय. लोकपाल के अधीन सन 2005 से लम्बित, निरस्त और वंचितों के विरुद्ध सभी मामलों में पुनर्समीक्षा की इजाजत दी जाय. वंचितों के द्वारा दर्ज सभी गंभीर मामलों में जो पक्षपातपूर्ण फैसले दिए गये उन्हें इस विनियम में शामिल किया जाय ताकि वंचितों के विरुद्ध हुए फैसलों पर पुनर्याचिका दाखिल की जा सके. तीसरा, वो कौन से मानक हैं जिनका समन्वय व निर्धारण किया गया बावजूद इसके कि ये मसौदा अभी पूरी तरह से इस्तेमाल करने के मामले में तमाम कमियों और खामियों से भरा है जिस वजह से अभी इस पर संदेह और अविश्वास लगातार बना हुआ है.

प्रस्तावना में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ‘पूर्ण समता एवं समावेशन’ के सभी फैसलों को बुनियाद के रूप में रखा गया है. ताकि सभी छात्र शिक्षा प्रणाली में आगे बढ़ें ये सुनिश्चित हो सके.

‘द वायर’ विश्वविद्यालय परिषद के आंकड़ों के अनुसार, विश्वविद्यालयों में जाति आधारित भेदभाव में 118% की वृद्धि हुई है। इस वृद्धि को रोकने के लिए क्या कुछ कड़ी नियमावली का पालन और निर्देशन नहीं नहीं चाहिए दोषियों को हमेशा के लिए रेस्तीकेट करना काफी नहीं उन्हें कानूनी तौर से सख्त सज़ा दी जानी चाहिए. चाहे वह कोई प्रशासनिक अधिकारी हो या फैकल्टी या फिर छात्र या कर्मचारी.

सलाह और संशोधन

जिस तरह जनवरी माह में उच्च शिक्षा संस्थानों से समानता समितियां और समान अवसर केंद्र, 24/7 हेल्पलाइन और अन्य ऑनलाइन शिकायत तंत्र स्थापित करने को कहा। इसी तरह से अन्य परामर्शदाताओं की तादाद में बढ़ोतरी करके समाधान के लिए अन्य उपायों पर विचार आमंत्रित करने चाहिए. वंचित समुदायों के छात्रों की समस्याओं शिकायतों और उत्पीडन व यौन शोषण के मामलों में अलग से वंचित समुदाय से चुने गये कम से कम एक मनोविज्ञान विभाग, समाजशास्त्र विभाग तथा शिकायतकर्ता के विभाग से वंचित समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले स्त्री-पुरुष दोनों अकादमिक अध्येताओं को मामले को शीघ्रता से निबटाने के लिए ‘COMMEETEE FOR DESCRIMINATION AGAINST (CASTE, CLASS, GENDER, AND PHYSICALY HANDICAPED) DEPRIVED CASTSE (SC, ST, OBC MINORITY AND DEPRIVED SECTIONS) एससी एसटी ओबीसी अल्पसंख्यक वंचित जातियों की सुरक्षा एवं शोषण, उत्पीडन यौन हिंसा निवारण कमिटी’ कमिटी में शामिल किया जाना चाहिए. हर विवि. में ये कमिटी गठित हों जिनका हर दो बरस में बदलाव होता रहे. इसकी हर विवि इस कमिटी की शिकायतें समाधान और निर्णायक मंडल की नियुक्ति की सुचना यूजीसी को प्रत्येक छह माह में देगा. ठीक ऐसी ही कमिटी प्रत्येक राज्य में HIGHER EDUCATION DIPARTMENT के भीतर भी बने जहाँ अनुभवी और उच्च गुणवत्ता वाले वंचित समुदाय के अधिकारीयों अधीनस्त कर्मचारियों को इक्वल अनुपात में गठित की जाय.

साथ ही एजुकेशन मिनिस्ट्री में भी ठीक ऐसी ही कमिटी वंचित समुदाय के अधिकारीयों और कर्मचारियों को लेकर बनाई जाय. ताकि किसी भी मामले का हर स्तर पर फिल्ट्रेशन हो सके. और कोई भी निर्णय निचले स्तर पर घालमेल या निजी दुराग्रह के चलते न लिया जा सके. इसी तरह से सेंट्रल एजुकेशन मिनिस्ट्री में भी ठीक इसी तरह की कमिटी गठित हो ताकि हायर अथोरिटी को इन मामलों का संज्ञान और समाधान के लिए समीक्षा बैठकें की जा सकें. निस्तारण के मामले में कोई कमी पाए जाने पर उचित कारवाई और दण्ड का प्रावधान हो. इतना ही नहीं इन सभी मामलों की वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जाय. ताकि वंचितों की सुरक्षा के मामलों में पारदर्शिता बनी रहे.

सबसे जरुरी बात, सं 2006 के बाद दर्ज वंचित वर्गों और जातियों से सम्बंधित छात्रों और अध्यापकों, विवि. कर्मचारियों अधिकारीयों के शिकायती मामलों को पुनर्परीक्षण, पुनर्विचार, पुनर्समीक्षा के लिए इन कमेटियों को सौंप जाय. खासकर वे मामले जिनमें वादी/ शिकायतकर्ता को न्याय नहीं मिल सका और इस्का खामियाजा उसके परिवार ने भुगता. साथ ही जो भी शारीरिक, मानसिक प्रताड़ना और उत्पीडन और यौन प्रताड़ना सहना पड़ा व सामाजिक-आर्थिक मानहानि सहनी पड़ी उन्हें सभी सरकारें राज्य-केंद्र दोनों ही मुआवजा, सम्मान सहित नौकरी और नुक्सान के एवज में ब्याज समेत मांगी गई उचित और मान्य रकम दे साथ ही सुरक्षा की गारंटी दे.

बिल में निहित कमियाँ : वंचित समुदायों के लिए विशेषकर प्रोबेशन के दौरान उन्हें विशेषाधिकार और सुरक्षा की गारंटी दी जाय. ताकि कोई ताकतवर आरक्षित/अनारक्षित वर्ग का व्यक्ति किसी वंचित जाति के प्रोबेशनर्स को न तो धमकी दे सके, न ओवर टाइम वर्क दे सके, न टॉर्चर करने के लिए कोई अनैतिक ग्राउंड वंचितों के विरुद्ध पूर्वाग्रह से बना सके. यदि ऐसा सिद्ध होता है तो विवि. प्रशासन और वंचित के अधिकारों के लिए बनी कमिटी में दोष सिद्ध होने पर उसे नौकरी से निष्काषित किया जाय. चाहे वह विभागीय अध्येता/ सीनियर/कर्मचारी स्वयं वंचित समुदाय से ताल्लुक क्यूँ न रखता हो.

उद्देश्य के अंतर्गत पूर्ण रूप से पारदर्शी तरीके और स्पेसिफाई तरीके से न्याय और दण्ड को परिभाषित नहीं किया गया.

एनसीआरबी 2020-2022 की रिपोर्ट बताती है कि जब राज्यसभा में मिनिस्ट्री ऑफ़ सोशल जस्टिस एंड इम्पोवेर्मेंट के जरिये जातिगत उत्पीडन के आकड़ों पर बात की गई तो मालुम हुआ कुल मिलाकर 36 राज्यों में 2020 में 50291 मामले, 2021 में 50900 मामले, 2022 में 57582 मामले सामने आये. जबकि राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो ने 67000 मामलों के दर्ज होने की पुष्टि की. इसके पहले ही 2015 में एससी एसटी एक्ट में संशोधन किया गया इसे और अधिक सख्त बनाया गया. इसके बाद 2018 में इसमें और अधिक सख्ती के साथ संशोधन किया गया. सन २०१९ से २०२१ के बीच ३५९५० छात्रों ने आत्महत्या की. जिसमें सामाजिक भेदभाद और अकादमिक उत्पीड़न मुख्य रूप से शामिल था. २०२२ में यौन हिंसा, उत्पीडन, बलात्कार के मामले ३१५१६ दर्ज हुए.

ऐसे तमाम हालत सामने हैं. कि किन वजहों से दमन, शोषण, उत्पीडन और यौन अपराध बढ़े हैं. इनकी तादाद हर साल बढ़ रही है. इसके मुकाबले यूजीसी 2026 का यह बिल कितना कारगर है इस पर शालीनता, गंभीरता और औपचारिक तरीके से कानूनविद, सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार सदस्यों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों, अल्पसंख्यक आयोग के प्रतिनिधित्व करने वाले व खासकर महिला आयोग में वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व करने वाली आयोग के पदाधिकारियों को इस मामले में बैठक करके इस मसौदे पर बात करने की जरूरत है. ताकि जो कमियां, खामियां और सुझाव हो. उन्हें इस बिल के लागू होने के साथ-साथ सालभर के भीतर जोड़ा जा सके. क्योंकि ऐसे तमाम मसौदे हैं जो अभी भी नदारत हैं जिन पर बात करने की सख्त जरूरत है.

अनिल पुष्कर

पोस्ट डॉक्टोरल फेलो,

आलोचक एवं साहित्यकार