पश्चिम बंगाल OBC आरक्षण विवाद: 17% से 7% तक की पूरी कहानी

पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7% होने के फैसले का कानूनी, संवैधानिक और राजनीतिक विश्लेषण। जानिए हाईकोर्ट के फैसले, मंडल आयोग और इसके सामाजिक प्रभाव;

Update: 2026-07-03 08:35 GMT

पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7%: कानून, राजनीति और सामाजिक प्रभाव

  • बंगाल में OBC आरक्षण घटा: हाईकोर्ट, राजनीति और संविधान का विश्लेषण
  • पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण पर नया विवाद: कानूनी और राजनीतिक समीक्षा

सारांश-

डॉ. रामजीलाल का यह लेख पश्चिम बंगाल में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को 17% से घटाकर 7% किए जाने की पृष्ठभूमि, संवैधानिक आधार और राजनीतिक प्रभाव का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस लेख में वाम मोर्चा सरकार, ममता बनर्जी सरकार और वर्तमान राज्य सरकार की नीतियों की तुलना करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के निर्णय, मंडल आयोग की सिफारिशों, इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (1992) के फैसले तथा जातीय जनगणना की आवश्यकता पर चर्चा की गई है। लेख यह भी बताता है कि इस निर्णय का सामाजिक न्याय, आरक्षण नीति, सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा और भविष्य की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।

इस लेख में जानिए -

  • पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7% क्यों हुआ
  • बंगाल OBC आरक्षण पर कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला
  • पश्चिम बंगाल OBC आरक्षण का नया नियम
  • क्या बंगाल में OBC आरक्षण घटा दिया गया
  • मंडल आयोग और पश्चिम बंगाल OBC आरक्षण
  • इंदिरा साहनी केस और 50 प्रतिशत आरक्षण सीमा
  • बंगाल में OBC आरक्षण विवाद का कानूनी विश्लेषण
  • पश्चिम बंगाल में मुस्लिम OBC आरक्षण विवाद
  • जातीय जनगणना और OBC आरक्षण
  • बंगाल भाजपा सरकार OBC आरक्षण नीति
  • ममता बनर्जी सरकार का OBC आरक्षण मॉडल
  • पश्चिम बंगाल OBC सूची में बदलाव
  • बंगाल हाईकोर्ट के फैसले का सामाजिक प्रभाव
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  • West Bengal Reservation Policy Analysis

पश्चिम बंगाल में ओबीसी आरक्षण 17% से घटकर 7% : जातीय और धार्मिक राजनीति -एक समीक्षा

प्रारम्भ में पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार (The Left Front government of West Bengal) ने वर्ग संघर्ष के सिद्धांत के आधार पर चलते हुए सामाजिक संरचना की अनदेखी करते हुए कहा था कि बंगाल में जाति-आधारित समाज नहीं है. परिणामस्वरूप काफी लंबे समय तक ओबीसी वर्गों को कोई आरक्षण नहीं दिया। लेकिन कालांतर में जब चुनावी जानाधार खिसकने लगा, तब भी मंडल आयोग की सिफारिश के आधार पर ओबीसी वर्गों को 27 फीसदी की जगह 7 फीसदी आरक्षण दिया. जिसे बाद में 3 फीसदी से 10 फीसदी और बुद्धदेव भट्टाचार्य ने नेतृत्व में बढ़ा कर 17फीसदी किया, जो कि फिर भी मडंल आयोग की संस्तुतियों से10 फीसदी कम था। परन्तु इसकी विशेषता यह थी कि इसमें हिन्दू और मुस्लिम के आधार कोई भेदभाव न करके दोनों को ही ओबीसी की सूची में सम्मिलित किया। अतः बंगाल में एससी को 22 फीसदी, एसटी को 6 फीसदी, ओबीसी को 17 फीसदी (10 फीसदी-ओबीसी-ए श्रेणी, 7 फीसदी ओबीसी-बी श्रेणी) कुल मिला कर यह 45 फीसदी हो गया जो कि अभी भी 5 फीसदी कम था.

आरक्षण के प्रावधान में बड़ा बदलाव सर्व प्रथम ज्योति बासु व बाद में बुद्धदेव भट्टाचार्य की वाम मोर्चा की 34 वर्ष से चली सरकार को सन् 2011 के विधान सभा चुनावों में धारा शाही करने के पश्चात 20 मई 2011 में ममता बनर्जी मुख्य मंत्री बनी।

ममता ने सता में आने पश्चात विकलांगों के लिए 3 फीसदी आरक्षण का प्रावधान किया। अतः बंगाल में कुल आरक्षण 48 फीसदी हो गया.

ओबीसी वर्गों के लिए अब यह 17 फीसदी की जगह सिर्फ 7 फीसदी आरक्षण

बंगाल की वर्तमान भाजपा सरकार ने इस संबंध में कलकत्ता हाईकोर्ट के 2024 के फैसले को आधार माना। परन्तु यह दलील इस लिए उचित नहीं लगती क्योंकि ममता बनर्जी की सरकार में ओबीसी वर्गों आरक्षण 17 फीसदी जारी रहा। भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेताओं ने चुनावों में दलितों व पिछड़ों वर्गों के आश्वासन देकर आरक्षण सुरक्षित रखने का वायदा करके वोट लेने के लिए अपील की थी। परन्तु शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद सौगात देते हुए 17 फीसदी ओबीसी आरक्षण को 7 फीसदी कर दिया। सन् 2010 से पहले सूची में शामिल 66 समुदायों को बहाल कर किया गया। वर्तमान सरकार के इस निर्णय ने ममता बनर्जी सरकार की व्यवस्था को समाप्त कर दिया, जिसमें ओबीसी को श्रेणी में 10% और श्रेणी बी में 7% में विभाजित कर के कुल 17 % आरक्षण दिया जाता था। यह फैसला मंडल आयोग की 27 फीसदी आरक्षण की संस्तुति, जिसको इंदिरा साहनी विवाद में संवैधानिक व औचित्य पूर्ण माना था, का सरासर उल्लंघन ही नहीं अपितु 20 फीसदी कटौती करके पिछड़े वर्गों के हितों ठेस पहुंचाई है.

मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 16 नवंबर, 1992 को इंदिरा साहनी बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया विवाद में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया। इस ऐतिहासिक फ़ैसले की मुख्य बातें इस तरह हैं: पहला, OBCs के लिए 27% रिज़र्वेशन को संवैधानिक घोषित किया गया, दूसरा, सुप्रीम कोर्ट ने 50 पर सेंट रिजर्व कोटे की ऊपरी लिमिट घोषित की. तीसरा, जब मंडल कमीशन की रिपोर्ट की सिफ़ारिशें लागू की गईं, तो उसमें क्रीमी लेयर का कोई ज़िक्र नहीं था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में 'क्रीमी लेयर' जोड़ दिया। इस वजह से, मंडल कमीशन की सिफ़ारिशें 'कमज़ोर' हो गईं।

हम अपने पाठकों को बताना चाहेंगे कि 'क्रीमी लेयर' शब्द का इस्तेमाल पहली बार साल 1975 में केरल राज्य बनाम थॉमस केस में किया गया था।

जाति के आधार पर जनगणना--बहुत ज़रूरी

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद, आरक्षण की निर्धारित सीमा 50% से ज़्यादा नहीं हो सकती। अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs) के लिए 27%, अनुसूचित जनजातियों (SCs) के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों (STs )के लिए 7.5% आरक्षण का प्रावधान है, अन्य शब्दों में कुल आरक्षण 49.5% है। जबकि इन जातियों – (वर्गों) अन्य पिछड़े वर्गों (OBCs )की जनसंख्या 52%, अनुसूचित जनजातियों (SCs) की 15% और अनुसूचित जनजातियों (STs ) की 7.5% है, यानी इन तीनों श्रेणियों की कुल जनसंख्या भारत की कुल जनसंख्या का 74.5% है.

विधानसभा में पिछड़ा वर्ग विकास मंत्री गौरी शंकर घोष ने कहा कि यह फेरबदल कलकत्ता हाई कोर्ट के 22 मई 2024 के फैसले के अनुपालन के कारण किया गया है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने मार्च 2010 से मई 2012 के बीच जोड़े गए 77 समुदायों का ओबीसी दर्जा रद्द कर दिया था।

जस्टिस तापव्रत चक्रवर्ती और राजशेखर मंथा की खंड पीठ ने पाया कि कई समूह को केवल धर्म के आधार पर शामिल किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 15(4)व 16(4)का उल्लंघन है। यद्यपि सन् 2010 के बाद जारी सभी ओबीसी प्रमाण पत्र रद्द कर दिए, लेकिन पहले से नौकरी पा चुके व्यक्तियों को राहत दी गई।

कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए नई सरकार ने धर्म- आधारित वर्गीकरण खत्म कर सन् 2010 से पहले की सूची वाले 66 समुदायों को नियमित किया है। अब इन 66 समुदायों का सरकारी सेवाओं, पदों व कॉलेज प्रवेश में 7% आरक्षण मिलेगा। पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग ने कहा कि संशोधित नीति वास्तव में पिछड़े हिंदू समुदायों पर संविधान पर लागू होगी जो एससी व एसटी श्रेणी में नहीं हैं।

नई सूची में पारंपरिक कारीगर और कृषक जातियां शामिल हैं -कपाली, कुर्मी, नाई(नापित), तांती, धनुक, कसाई, कर्मकार, कुंभकार, स्वर्णकार, तेली, यादव, मोइरा, मोदक आदि. इनके अतिरिक्त हज्जाम ( मुस्लिम), पहाड़िया, मुस्लिम व जोलाहा (अंसारी ) जैसे कुछ समुदाय भी बरकरार हैं।ले किन पिछली 140 -समूह सूची के 74 के उप - जातियों को हटा दिया गया, उसमें अधिकांश मुस्लिम धर्म के अनुयायी हैं।

इस बदलाव से पहले, बंगाल में 17% ओबीसी आरक्षण था- ओबीसी-ए में 10% के तहत 81 समुदाय (मुस्लिम 56 मुस्लिम) और ओबीसी -बी में 7% के तहत 99 समुदाय (41 मुस्लिम). बंगाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि हाई कोर्ट के निर्णय से करीब 5 लाख ओबीसी प्रमाण पत्र प्रभावित हुए।

50% की सीमा का तर्क वर्ग

राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) ने पहले कहा था कि बंगाल में एससी, एसटी, ओबीसी का कुल आरक्षण 45% है। यानी इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ विवाद (16 नवंबर, 1992) मामले में की सीमा 50% के तहत अभी 5% की गुंजाइश बाकी की है।राष्ट्रीय पिछड़ा वर्गआयोग (एनसीबीसी ) ने ओबीसी कोटा 5% बढ़ाने की सिफारिश की थी इसके बिल्कुल विपरीत बंगाल की नई भाजपा सरकार ने ओबीसी कोटा 5% बढ़ाने घटा दिया और पिछली सरकारों पर ‘वोट बैंक राजनीति व असंवैधानिक धार्मिक समावेश ‘का आरोप लगाया।

बंगाल की भाजपा सरकार ने इसे संवैधानिक सुधार बताया है जब कि टीएमसी ने कहा कि कई समुदाय केंद्रीय सूची में अभी भी ओबीसी हैं। जिससे अजीब स्थिति बनी हुई है। अन्य शब्दों यह विरोधाभास की स्थिति है। ममता बनर्जी ने विधानसभा में कहा था कि नए सामाजिक -आर्थिक सर्वे के आधार पर 140 समुदायों-49 श्रेणी-ए और 91 श्रेणी सूचीबद्ध कर 17% का कोटा बहाल किया जाएगा।

460 सरकारी व सहायता प्राप्त कॉलेजों में प्रवेश प्रभावित हुए हैं क्योंकि जादवपुर व प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय अब 7% का पालन कर रहे हैं। यद्यपि कलकता हाई कोर्ट के फैसले के विरूद्ध तत्कालीन ममता बनर्जी की बंगाल सरकार ने 77 समुदाय के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील विचाराधीन है। परन्तु वर्तमान शुभेंदु अधिकारी की भाजपा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील वापस लेने के लिए याचिका दायर की है।

यह संशोधन जातीय गणना को नया आकार देगा व इसके दूरगामी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिणाम होंगे तथा इसके प्रभाव अन्य भाजपा शासित राज्यों पर पड़ने की संभावना दृष्टिगोचर होती है.

डॉ. रामजीलाल,

लेखक सामाजिक वैज्ञानिक, दयाल सिंह कॉलेज, करनाल (हरियाणा) के पूर्व प्रिंसिपल हैं।

FAQs

प्रश्न 1. पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण 17% से 7% क्यों हुआ?

उत्तर: कलकत्ता हाईकोर्ट के 22 मई 2024 के फैसले के बाद 2010 से 2012 के बीच OBC सूची में जोड़े गए 77 समुदायों का OBC दर्जा रद्द कर दिया गया। नई सरकार ने 2010 से पहले की सूची बहाल करते हुए कुल OBC आरक्षण 7% लागू किया।

प्रश्न 2. क्या हाईकोर्ट ने मुस्लिम समुदाय का OBC आरक्षण समाप्त किया?

उत्तर: नहीं। हाईकोर्ट ने धर्म के आधार पर किए गए वर्गीकरण को असंवैधानिक माना। जिन समुदायों को केवल धार्मिक आधार पर शामिल किया गया था, उनका दर्जा रद्द किया गया। कुछ मुस्लिम OBC समुदाय नई सूची में भी बने हुए हैं।

प्रश्न 3. इंदिरा साहनी मामले का इस विवाद से क्या संबंध है?

उत्तर: 1992 के इंदिरा साहनी फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने OBC के लिए 27% आरक्षण को वैध माना और कुल आरक्षण की सामान्य सीमा 50% निर्धारित की। इसी निर्णय का उल्लेख वर्तमान बहस में बार-बार किया जा रहा है।

प्रश्न 4. क्या पश्चिम बंगाल में OBC आरक्षण का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है?

उत्तर: हाँ। कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट में कार्यवाही का उल्लेख किया गया है। अंतिम कानूनी स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर निर्भर करेगी।

प्रश्न 5. इस बदलाव का सबसे अधिक प्रभाव किन क्षेत्रों पर पड़ेगा?

उत्तर: सरकारी नौकरियों, उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश, OBC प्रमाणपत्रों की वैधता तथा राज्य की सामाजिक एवं राजनीतिक संरचना पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है।

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