हॉर्मुज संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा: लंबी अवधि के लिए नई साझेदारियों की जरूरत
ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद करने के बाद भारत में गैस संकट गहराया। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी -ऊर्जा सुरक्षा के लिए भारत को तलाशनी होंगे नए वैश्विक विकल्प और साझेदारियां...
Threat to India's Energy Security Amidst the Hormuz Crisis: Need for New Long-Term Partnerships
हॉर्मुज जलडमरूमध्य का महत्व और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर
- भारत में रसोई गैस संकट: आपूर्ति शृंखला की कमजोरी उजागर
- सीमित विकल्प और बढ़ता आर्थिक दबाव
- ऊर्जा सप्लाई में विविधता: अमेरिका, रूस और अफ्रीका की भूमिका
- भारत-अफ्रीका साझेदारी: ऊर्जा और अक्षय विकल्पों की नई दिशा
- वित्तीय जोखिम: महंगाई, सब्सिडी और बढ़ता कर्ज
क्या भारत के लिए रणनीतिक बदलाव का अवसर बनेगा यह संकट ?
पश्चिम एशिया में युद्ध और हॉर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से भारत की ऊर्जा आपूर्ति पर गंभीर असर पड़ा है। रसोई गैस संकट के बीच विशेषज्ञों का मानना है कि यह समय भारत के लिए दीर्घकालिक ऊर्जा रणनीति और नए वैश्विक सहयोग बनाने का है...
भारत को लंबे वक्त की ईंधन सप्लाई सुरक्षा के लिए ढूंढनी होंगी नई साझेदारियां और विकल्प : विशेषज्ञ
मुम्बई, 19 मार्च 2026। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जारी युद्ध (The Ongoing War Between the US, Israel, and Iran) के दौरान ईरान द्वारा हॉर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने के बाद भारत में रसोई गैस सिलेंडर की गहरी किल्लत के बीच विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अपनी लंबे वक्त की ईंधन सप्लाई सुरक्षा के लिए नई साझेदारियां ढूंढने की जरूरत है।
बता दें कि दुनिया के कुल तेल उत्पादन का पांचवां हिस्सा और लिक्विड नेचुरल गैस (एलएनजी) का एक-चौथाई हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है।
एलएनजी की सप्लाई पर दबाव है, माल ढुलाई और बीमा की लागत बढ़ रही है और इसका असर एनर्जी मार्केट, व्यापार के रास्तों और खाने-पीने के सिस्टम तक पहुँचने लगा है। इस रास्ते से टैंकरों की आवाजाही में रुकावट के चलते कच्चे तेल और गैस का आयात बाधित होने से देश में रसोई गैस सिलेंडर की गहरी किल्लत सामने आई है।
भारत के लिए इस संकट का खतरा
भारत के लिए, यह संकट केवल अपनी सप्लाई चेन में आई रुकावट का सामना करने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अब यह देखना होगा कि क्या यह संकट वैकल्पिक सप्लाई की तलाश में मची आपाधापी से आगे बढ़कर भारत की मजबूती को बढ़ाने के काम में एक ट्रिगर की भूमिका निभा पाता है या नहीं।
इसी विषय पर चर्चा के लिए जलवायु थिंक टैंक 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' (Climate Trends) ने बीते मंगलवार को एक वेबिनार आयोजित किया। इसमें ओआरएफ मिडिल ईस्ट में ऊर्जा, जलवायु और ऊर्जा शाखा की निदेशक और फेलो मन्नत जसपाल, यूसी बार्कले के ऊर्जा प्रौद्योगिकी और नीति कार्यक्रम में एसोसिएट एडजंक्ट प्रोफेसर डॉक्टर निकित अभ्यंकर और एनआईपीएफपी में एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर सुरंजली टुंडल ने इस विषय के अलग-अलग पहलुओं पर विस्तार से बात की।
इन विशेषज्ञों का कहना था कि अगर भारत को अपनी ईंधन और ऊर्जा सप्लाई सुरक्षा को लंबे वक्त के लिए मजबूत करना है तो उसे दुनिया के स्तर पर नयी साझेदारियां और नये विकल्प ढूंढने होंगे। हालांकि इसकी भी अपनी अलग तरह की चुनौतियां हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाएगा संकट
डॉक्टर अभ्यंकर ने कहा कि कम से कम कच्चे तेल के मामले में कुछ दूसरे संभावित विकल्प उपलब्ध लगते हैं जिनमें अमेरिका और रूस शामिल हैं। कुछ हद तक पश्चिम अफ्रीकी देश, नाइजीरिया, अंगोला, वगैरह, और भारतीय रिफाइनरियाँ उस कच्चे तेल को रिफाइन करने में सक्षम लगती हैं। लेकिन थोड़े वक्त में यह भारतीय उपभोक्ताओं और भारतीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचाएगा।
उन्होंने कहा कि जब भी हम किसी एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करते हैं तो वह लाज़मी तौर पर एक लंबे वक्त की योजना होती है। एक बार जब हम किसी इंफ्रास्ट्रक्चर में फंस जाते हैं, तो उससे बाहर निकलना या कम समय में कोई बड़ा बदलाव करना मुश्किल होता है। इसलिए अगले 6, 12, 18 महीनों में, भारत के पास जो विकल्प होंगे, वे सच कहूँ तो सीमित हैं।
सप्लाई में और अधिक विविधता लाने की आवश्यकता
डॉक्टर अभ्यंकर ने सप्लाई में और ज्यादा विविधता लाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा अमेरिका उन विकल्पों में से एक हो सकता है। कुछ पश्चिमी अफ्रीकी देश जैसे नाइजीरिया, अंगोला, वगैरह-वगैरह भी विकल्पों में से एक हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि रूस के बारे में अच्छी खबर यह है कि भारत पहले से ही उससे सक्रिय रूप से बातचीत कर रहा है। इसी तरह, नैचुरल गैस के लिए भी दूसरे विकल्प मौजूद हैं, जिनमें अमेरिका, रूस, और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। साथ ही, बहुत ही सीमित मात्रा में इंडोनेशिया या ब्रुनेई से भी गैस मिल सकती है। कुल मिलाकर सप्लाई में विविधता लाना उन विकल्पों में से एक है जो भारत के पास उपलब्ध होंगे।
भारत और अफ्रीकी देशों के बीच साझेदारी पर बल
मन्नत जसपाल ने भी भारत द्वारा अन्य विकल्पों के साथ व्यापक साझेदारी बनाने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि लिक्विड नेचुरल गैस के लिए हम ऑस्ट्रेलिया, मलेशिया, नाइजीरिया को देखते हैं। मगर उनके संसाधन भी ऐसे हैं कि भले ही वे कच्चे तेल का उत्पादन करने वाले सबसे बड़े देशों में से एक हैं, फिर भी वे अपने रिफ़ाइंड कच्चे तेल का ज्यादातर हिस्सा आयात ही करते हैं। इसलिए लगता है कि अफ्रीकी देशों और भारत के बीच साझेदारी की काफी गुंजाइश है।
उन्होंने कहा कि सिर्फ कच्चे तेल के मामले में ही नहीं बल्कि अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भी दूसरे देशों के साथ साझेदारी करने की काफी गुंजाइश है खासकर अफ्रीकी देशों के साथ। उदाहरण के लिए, मोरक्को अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में काफी काम कर रहा है। जब बात अक्षय ऊर्जा की आती है, तो अफ्रीकी देशों के साथ सहयोग करने की भी काफी गुंजाइश है। उन्होंने उम्मीद जताई कि ब्रिक्स के जरिए भारत और अफ्रीका के बीच ज्यादा सहयोग बढ़ेगा और भारत-अफ्रीका सहयोग के क्षेत्र में कुछ ठोस परिणाम जरूर सामने आएंगे।
जसपाल ने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी युद्ध की वजह से उत्पन्न संकट बहुत गंभीर है। दुनिया भर में कच्चे तेल और लिक्विड नेचुरल गैस सप्लाई का 20 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। खासकर भारत के लिए इसका असर बहुत ज़्यादा है क्योंकि हमारा 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात किया जाता है और उसका लगभग 60 से 70 फीसद इसी जलडमरूमध्य से होकर आता है, इसलिए साफ है कि इस पर हमारी निर्भरता और जोखिम बहुत ज़्यादा है।
उन्होंने कहा कि लिक्विड नेचुरल गैस के मामले में भी भारत की लगभग 50 से 60 प्रतिशत गैस कतर से आती है। इसलिए, गैस सप्लाई के मामले में भी हमारी निर्भरता बहुत ज़्यादा है जो इसी जलडमरूमध्य से होकर आती है। लिहाजा, किसी भी तरह की रुकावट का असर जाहिर है इस बात पर पड़ेगा कि देश इन संकटों का सामना कैसे करता है।
क्या इस स्थिति को संभाल पाएगा भारत?
खबरों के मुताबिक, लगभग 2.3 मिलियन टन माल ले जा रहे 28 भारतीय जहाज होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने के इंतजार में हैं। कतर से लिक्विड नेचुरल गैस की सप्लाई रोक दी गई है और पूरे देश में रेस्टोरेंट के पास गैस का स्टॉक अब बस कुछ ही दिनों का बचा है। रसोई गैस बेचने वाली दुकानों के बाहर लंबी-लंबी लाइनें लगी हुई हैं।
सरकार ने कई मोर्चों पर कदम उठाए हैं। चाहे वह भारतीय रिजर्व बैंक का खुले बाजार से एक ट्रिलियन रुपये के बॉन्ड खरीदना हो या फिर एक ट्रिलियन रुपये के 'आर्थिक स्थिरता फंड' की घोषणा करना हो। यह सब तो हो ही रहा है, लेकिन एक इससे भी गहरा सवाल है कि क्या भारत इस स्थिति को संभाल पाएगा? बात सिर्फ़ यह नहीं है कि भारत इसे संभाल पाएगा या नहीं, बल्कि हम यह समझना चाहते हैं कि ईरान-संघर्ष के फौरन बाद की स्थिति को संभालने से आगे बढ़कर, भारत को असली मजबूती हासिल करने के लिए और क्या-क्या करना होगा?
क्या है भारत का असली वित्तीय जोखिम
जब ऊर्जा विकल्पों की बात आती है, तो स्थिति और बिगड़ती जा रही है और जिस तरह से ब्रेंट क्रूड की कीमतें बढ़ रही हैं और रुपया दबाव में है उससे सब्सिडी का बिल भी बढ़ रहा है। ऐसे में भारत का असली वित्तीय जोखिम क्या है और वह कौन सा मोड़ है, जब यह स्थिति हमें सचमुच नुकसान पहुंचाना शुरू कर देगी, इस बारे में डॉक्टर सुरंजलि टुंडल ने कहा कि वित्तीय पक्ष के तीन ऐसे पहलू हैं जिन पर विचार करने की जरूरत है और इनमें राजस्व पक्ष सबसे पहला पहलू है।
पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यह युद्ध जितना लंबा चलेगा खर्च के मोर्चे पर इसके उतने ही ज्यादा सीधे असर होंगे और खाने-पीने की चीजों में महंगाई का असर होगा। तीसरा अहम पहलू कर्ज है। अगर सरकार इस समय खर्चों को पूरा करने के लिए दखल देती भी है तो कर्ज लेने की लागत ज्यादा होगी। इससे सरकारी खजाने पर मुश्किलें पैदा होती हैं। इससे भी बड़ी समस्या यह है कि घरेलू बाज़ार के भीतर ही संतुलन बिगड़ जाता है।
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ