भारत की हरित ऊर्जा में ऐतिहासिक छलांग
भारत ने पहली बार सौर और पवन ऊर्जा से 100 गीगावॉट से अधिक बिजली उत्पादन का रिकॉर्ड बनाया। कुल बिजली आपूर्ति में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी 42.79% तक पहुंची;
Environment Renewable Energy
42.79% बिजली आपूर्ति में रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती भूमिका
- बढ़ती बिजली मांग के बीच कैसे बना नया रिकॉर्ड?
- ऊर्जा भंडारण और ग्रिड आधुनिकीकरण क्यों बनेंगे अगली चुनौती?
- विशेषज्ञों ने भारत की इस उपलब्धि को क्यों बताया ऐतिहासिक?
भारत ने रचा नया ऊर्जा इतिहास: पहली बार 100 गीगावॉट के पार पहुंची सौर और पवन बिजली, बिजली आपूर्ति में 42.79% हिस्सेदारी
भारत ने रचा नया रिकॉर्ड, पहली बार 100 गीगावॉट के पार पहुंची सौर और पवन बिजली
नई दिल्ली, 21 जुलाई 2026. भारत की बिजली व्यवस्था ने एक ऐसा रिकॉर्ड बनाया है, जो कुछ साल पहले तक मुश्किल माना जाता था।
इस महीने 13 और 14 जुलाई को पहली बार देश में सौर और पवन ऊर्जा, यानी वेरिएबल रिन्यूएबल एनर्जी (VRE), का उत्पादन 100 गीगावॉट के पार पहुंच गया। इतना ही नहीं, इन दोनों स्रोतों की हिस्सेदारी देश की कुल बिजली आपूर्ति में 42.79 प्रतिशत तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर है।
13 जुलाई को दोपहर 12 बजकर 5 मिनट पर सौर और पवन ऊर्जा से बिजली उत्पादन 103.7 गीगावॉट के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा। इससे एक दिन पहले शाम के समय पवन ऊर्जा उत्पादन भी 36.6 गीगावॉट के अपने अब तक के सबसे ऊंचे स्तर पर दर्ज किया गया।
यह उपलब्धि ऐसे समय पर आई है जब भारत में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है।
इस साल भीषण गर्मी, लंबे हीटवेव और एयर कंडीशनर समेत शीतलन उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल के कारण देश की बिजली मांग दो बार 270 गीगावॉट के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंची। लेकिन इस बढ़ती मांग के बीच रिन्यूएबल एनर्जी ने भी पहले से कहीं बड़ी भूमिका निभाई। 25 अप्रैल को जब बिजली मांग 270 गीगावॉट तक पहुंची, तब सौर ऊर्जा ने पीक डिमांड के दौरान 57 गीगावॉट और दोपहर में 81 गीगावॉट बिजली उपलब्ध कराई, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड था।
रिपोर्ट के मुताबिक इस साल अप्रैल से अब तक कुल बिजली आपूर्ति में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी 35 से 42 प्रतिशत के बीच रही है। अगर जलविद्युत और परमाणु ऊर्जा को भी शामिल कर लिया जाए, तो गैर-फॉसिल फ्यूल स्रोतों की हिस्सेदारी लगभग 50 प्रतिशत तक पहुंच जाती है।
भारत के लिए यह रिन्यूएबल एनर्जी का एक ऐतिहासिक वर्ष है। उनके मुताबिक देश का बिजली ग्रिड अब 100 गीगावॉट से अधिक रिन्यूएबल एनर्जी को बिना किसी बड़ी बाधा के संभालने में सक्षम साबित हुआ है। उनका कहना है कि आने वाले वर्षों में जैसे-जैसे नई परियोजनाएं जुड़ेंगी, बिजली आपूर्ति में रिन्यूएबल एनर्जी की हिस्सेदारी और बढ़ेगी। हालांकि इसके लिए ऊर्जा भंडारण क्षमता बढ़ाना पहले से कहीं अधिक जरूरी होगा, ताकि चौबीसों घंटे स्वच्छ बिजली उपलब्ध कराई जा सके।
National Solar Energy Federation of India के मुख्य कार्यकारी अधिकारी Subrahmanyam Pulipaka के मुताबिक यह उपलब्धि कई वर्षों के निवेश, ट्रांसमिशन नेटवर्क, बिजली पूर्वानुमान और ग्रिड संचालन में हुए सुधारों का परिणाम है। उनका कहना है कि अब अगला चरण ऊर्जा भंडारण, ग्रिड की लचीलापन क्षमता, ट्रांसमिशन नेटवर्क और बिजली बाजार में सुधार पर केंद्रित होगा।
ऊर्जा विश्लेषण संस्था Ember के वरिष्ठ ऊर्जा विश्लेषक Neshwin Rodrigues इसे भारत की बिजली व्यवस्था में एक संरचनात्मक बदलाव मानते हैं। उनके अनुसार रिन्यूएबल एनर्जी अब पारंपरिक बिजली उत्पादन की पूरक नहीं रह गई है, बल्कि देश की बढ़ती बिजली मांग पूरी करने का प्रमुख स्रोत बनती जा रही है। हालांकि वे चेतावनी देते हैं कि अब ऊर्जा भंडारण, ट्रांसमिशन और ग्रिड लचीलेपन पर तेज़ी से निवेश करना होगा, ताकि कम लागत वाली रिन्यूएबल एनर्जी का पूरा उपयोग हो सके।
यह उपलब्धि दिखाती है कि यदि नीतियां ग्रिड संचालन की चुनौतियों का समाधान करती रहें, तो वह समय दूर नहीं जब भारत अपनी अधिकांश दैनिक बिजली जरूरत रिन्यूएबल एनर्जी से पूरी कर सकेगा। हालांकि इसके साथ ऊर्जा भंडारण और स्वच्छ ऊर्जा उपकरणों से निकलने वाले कचरे के पुनर्चक्रण पर भी समान रूप से ध्यान देना होगा।
यह सिर्फ नई क्षमता जोड़ने की नहीं, बल्कि वास्तविक बिजली आपूर्ति में रिन्यूएबल एनर्जी की बढ़ती हिस्सेदारी का संकेत है। उनके मुताबिक अब अगली चुनौती बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडारण, अधिक लचीले ग्रिड और ऐसे बिजली बाजार विकसित करने की है, जो शाम के समय बढ़ने वाली मांग को भी स्वच्छ ऊर्जा से पूरा कर सकें।
यह रिकॉर्ड सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है।
यह दिखाता है कि भारत में रिन्यूएबल एनर्जी अब भविष्य की तकनीक नहीं रही।
वह तेजी से देश की रोजमर्रा की बिजली जरूरतों का अहम आधार बनती जा रही है।
अब अगली परीक्षा यह होगी कि इस बढ़ती स्वच्छ बिजली को हर मौसम, हर घंटे और हर राज्य तक भरोसेमंद तरीके से कैसे पहुंचाया जाए।
डॉ. सीमा जावेद
पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ