अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 2026: महात्मा गांधी का हिंदी प्रेम और डिजिटल युग में भारतीय भाषाओं की चुनौती
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर गांधी के हिंदी प्रेम और भारतीय भाषाओं की स्थिति पर विमर्श। डिजिटल युग में यूनीकोड और भाषा स्वाभिमान की चुनौती।
International Mother Language Day 2026: Mahatma Gandhi's love for Hindi and the challenge of Indian languages in the digital age
अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का ऐतिहासिक संदर्भ
- दक्षिण अफ्रीका की जेल से गांधी का मातृभाषा आग्रह
- 1915 का प्रसंग: विद्यार्थियों को मातृभाषा का संदेश
- तमिल बनाम अंग्रेजी विवाद: औपनिवेशिक मानसिकता की झलक
- वायसराय के सामने हिंदी में भाषण की शर्त
- महावीर प्रसाद द्विवेदी और साहित्य की सभ्यता
- डिजिटल युग में हिंदी और भारतीय भाषाओं का संकट
- यूनीकोड, इंटरनेट और मातृभाषा का भविष्य
- मातृभाषा, स्वाभिमान और बौद्धिक जिम्मेदारी
दक्षिण अफ्रीका की जेल से लेकर वायसराय के दरबार तक—महात्मा गांधी ने मातृभाषा को स्वाभिमान और स्वराज से जोड़ा। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर यह प्रश्न फिर सामने है: क्या डिजिटल युग में हिंदी और भारतीय भाषाएँ अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं? यूनीकोड, इंटरनेट और नई पीढ़ी की भूमिका पर गंभीर विचार...
आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है। भाषाई विविधता, सांस्कृतिक अस्मिता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्मरण दिवस। किंतु इस अवसर पर प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी भाषाओं के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के पुरोधा थे? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने मातृभाषा को केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राष्ट्रीय स्वाधीनता का आधार माना है। दक्षिण अफ्रीका की जेल में गुजराती में पत्र लिखने से लेकर विद्यार्थियों को अंग्रेजी के स्थान पर मातृभाषा अपनाने के आग्रह तक उनका दृष्टिकोण बिल्कुल स्पष्ट था। आज, डिजिटल युग में वही आग्रह नई चुनौतियों के साथ हमारे सामने खड़ा है। पढ़िए प्रोफेसर जग्दीश्वर चतुर्वेदी का लेख...
आज अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस है महात्मा गांधी के हिंदी प्रेम से गुजरते हुए
गांधीजी के जेल अनुभवों में से एक अनुभव याद आ रहा है। उन्होंने लिखाः महानिष्क्रिय - प्रतिरोध के कारण जब वे एक बार दक्षिण अफ्रीका के एक जेल में थे, तब उन्हें उनकी धर्मपत्नी की बीमारी का सूचक तार मिला। यदि वे जुर्माना अदा कर देते तो उन्हें जेल से छुटकारा मिल जाता और वे अपने घर जाकर अपनी पत्नी के औषधोपचार आदि का प्रबन्ध कर सकते। पर ऐसा करना उन्होंने अपने सिद्धान्त के प्रतिकूल समझा। अतएव जेलर की आज्ञा प्राप्त करके अपनी पत्नी को उन्होंने गुजराती में पत्र लिखा। इस पत्र को देखकर जेलर चौंका, क्योकि वो उसे पढ़ न सका। खैर, उस पत्र को उसने जाने दिया। पर हिदायत दी कि गांधी जी अपने अगले पत्र अँग्रेजी में लिखें।
गान्धीजी ने कहा, मेरे हाथ के गुजराती पत्र, इस बीमारी की दशा में, मेरी पत्नी के लिए दवा का काम देंगे। इस कारण, आप मुझे गुजराती में ही लिखने की आज्ञा दीजिए। पर जेलर न माना। फल यह हुआ कि गान्धी जी ने अँग्रेजी में लिखने से इन्कार कर दिया। उन्होंने कहा मेरी रोगाक्रान्त पत्नी और आसन्न-मरण पत्नी को मेरे पत्र मिलें चाहे न मिलें, पर मैं अँग्रेजी में पत्र नहीं लिखूंगा।
यह घटना 1915 की है। सूरत जिले के संग्रामपुर के जैन विद्यार्थियों द्वारा स्थापित किए गए पुस्तकालय का उद्घाटन करने गांधीजी पहुँचे। वहां एक विद्यार्थी ने अंग्रेजी में भाषण दिया, दूसरे ने अंग्रेजी में निबन्ध पढ़ा। पर गांधीजी गुजराती में बोले। उन्होंने कहा- "जो युवक यह कहते हैं कि हम अपने विचार मातृभाषा द्वारा प्रकट नहीं कर सकते, उनसे मैं यही निवेदन करूँगा कि आप मातृभाषा के लिए भार रूप हैं। मातृभाषा की अपूर्णता दूर करने के बदले उसका अनादर करना- उससे हाथ ही धो बैठना - किसी सच्चे सपूत को शोभादायक नहीं है।... मैं आशा करता हूं कि यहाँ बैठे हुए समस्त विद्यार्थी यह प्रतिज्ञा करेंगे कि निरूपाय दशा के सिवा और कभी भी हम अपने घर पर अंग्रेजी न बोलेंगे।"
एक अन्य घटना का जिक्र करना समीचीन होगा।
यह घटना 1919 की है। मद्रास लेजिस्लेटिव कौंन्सिल के सदस्य नरसिंह अय्यर ने कौंसिल की बैठक में तमिल में भाषण देना आरंभ किया। इस पर ऑनरेबल मिस्टर राजगोपालाचार्य्य ने उनको टोका और एतराज किया। वे चाहते थे कि अय्यरजी अपना भाषण अंग्रेजी में दें, इस पर गवर्नर ने राजगोपालाचार्य का साथ दिया। अय्यरजी अपनी मातृभाषा तमिल में भाषण देना चाहते थे उन्होंने गवर्नर से अनुरोध किया कि उन्हें तमिल में भाषण देना दें, गवर्नर नहीं माने। अय्यर साहब ने अंग्रेजी में भाषण देने से इंकार किया और प्रतिवादस्वरूप चुपचाप बैठ गए। यहां मजेदार बात यह है कि राजगोपालाचारी ने अंग्रेजी में भाषण देने की अय्यर जी से मांग की और अय्यर ने अंग्रेजी जानते हुए भी तमिल में भाषण देने का आग्रह किया।
भारत के वायसराय ने एक बार एक मीटिंग में भाषण देने के लिए गांधीजी को आमंत्रित किया था। गांधीजी ने वायसराय के सामने शर्त रखी कि वे हिन्दी में ही भाषण देंगे। वायसराय ने उनकी शर्त मान ली।
ध्यान देने योग्य बातें-
1. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कहा -"जिस जाति विशेष में साहित्य का अभाव या उसकी न्यूनता आपको देख पड़े, आप यह निःसन्देह निश्चित समझिए कि वह जाति असभ्य किंवा अपूर्ण सभ्य है।" क्या इस धारणा की रोशनी में हिन्दी की दशा पर विचार करने की जरूरत है ?
2. हिन्दी लेखक कम्प्यूटर में हिन्दी लिखें और हिन्दी को समृद्ध करें। अन्यभाषाभाषी भी यह काम करें जिससे भारतीय भाषाओं को इंटरनेट पर समृद्ध किया जा सके।
3. आज के दिन हम सब कम से कम अपनी मातृभाषा में फेसबुक पर जरूर कुछ न कुछ लिखें। खासकर वे लोग जो अपनी भाषा के फॉण्ट का इस्तेमाल नहीं करते और गूगल की मशीनी अनुवाद प्रणाली का इस्तेमाल करते हैं, उनको अपनी भाषा के फॉण्ट को डाउनलोड करना चाहिए और अपनी भाषा में सीधे कम्प्यूटर पर लिखना आरंभ करना चाहिए।
4. एक जमाने में मध्यवर्ग बंगाली मातृभाषा में बोलना-लिखना गौरव की बात समझता था। महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु और सत्येन्द्र बसु जैसे लोग बंगला में विज्ञान की नई खोजों पर लिखते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। यह भाषा के पतन की सूचना है!
5. भारत में अधिकांश प्रतिष्ठित समाजविज्ञानी बुद्धिजीवी अपनी भाषा में नहीं लिखते, यह स्थिति बदलनी चाहिए।
6. हिन्दी के प्रतिष्ठित लेखक-प्रोफेसर-पत्रकार- एम.ए, बी.ए. लोग अभी तक इंटरनेट पर यूनीकोड हिन्दी फॉण्ट में नहीं लिखते, कैसे आएगा परिवर्तन ? यह मातृभाषा की विदाई की सूचना तो नहीं है ?
हिन्दी भाषी अभी भी इंटरनेट पर देवनागरी में नहीं लिखते, अन्य लोग अपनी भाषा में नहीं लिखते, ऐसे में मातृभाषा दिवस का क्या होगा ? यूनीकोड फॉण्ट में लिखे बिना मातृभाषा नहीं बचेगी।
प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी