लखनऊ में बढ़ती गर्मी और उमस का संकट: सिंधु-गंगा के मैदानों में बदलते हीट रिस्क से जन-स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

लखनऊ में गर्मी और उमस वाले दिनों में बढ़ोतरी से हीट स्ट्रेस का खतरा बढ़ रहा है। इस खबर में जानिए सिंधु-गंगा के मैदानों में बदलते हीट रिस्क, गर्म रातों और जन-स्वास्थ्य पर पड़ते इसके प्रभाव को;

Update: 2026-08-28 02:44 GMT

लखनऊ में बढ़ती गर्मी और उमस क्यों बन रही हैं नया हीट रिस्क?

  • 10 वर्षों में लखनऊ में 35% बढ़े गर्मी और उमस वाले दिन
  • मानसून के दौरान क्यों बढ़ रहा है कंपाउंड हीट स्ट्रेस?
  • गर्म रातें बढ़ा रही हैं लखनऊ के लोगों का स्वास्थ्य जोखिम
  • सिंधु-गंगा के मैदानों में नमी और जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव
  • अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट: अनियोजित शहरीकरण कैसे बढ़ा रहा है लखनऊ की गर्मी?

लखनऊ : बढ़ती उमस सिंधु-गंगा के मैदानों में हीट रिस्‍क को दे रही है नया आकार

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ दिन-ब-दिन एक नए तरीके के हीट स्ट्रेस से लगातार जूझ रही हैा एक ऐसी मुश्किल स्थिति, जिसमें चढ़ता तापमान बढ़ती उमस के साथ जोड़कर शहर के लोगों को ऐसी गर्मी का एहसास कर रहा है, जिसे किसी थर्मोमीटर से नहीं नापा जा सकता। यह शहर सिंधु-गंगा के उन मैदानों के हृदय स्थल में बसा है, जिन्हें कंपाउंड हीट के सबसे ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों के तौर पर पहचाना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन इलाकों में तेज गर्मी के साथ-साथ खेती तथा मानसून की गतिविधियों के चलते काफी मात्रा में नमी रहती है। साथ ही घनी आबादी और तेजी से होता शहरीकरण मिलकर हीट स्ट्रेस के खतरनाक स्तरों को जन्म देते हैं।

वैज्ञानिक शोध अब अकेले तापमान के बजाय गर्मी और उमस के संयुक्त प्रभाव को जानने के लिए हीट इंडेक्स और वेट बल्ब टेंपरेचर (डब्ल्यूबीटी) जैसे संकेतकों पर और ज्यादा भरोसा करने लगे हैं।

लखनऊ के लोग ज्यादा संख्या में गर्मी और उमस भरे दिन महसूस कर रहे हैं

काउंसिल ऑन एनर्जी एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) के वर्ष 2015 से 2024 के बीच मौसम से संबंधित दैनिक डाटा के एक आकलन से यह पता लगता है कि लखनऊ के लोगों ने गर्मी और उमस भरे 289 दिन काटे हैं। इन दिनों में अधिकतम तापमान कम से कम 35 डिग्री सेल्सियस और उमस 60% या उससे ज्यादा रही है। पिछले एक दशक के दौरान लखनऊ शहर ने कंपाउंड हीट एक्स्पोजर में साफ तौर पर बढ़ोत्तरी देखी है।

यह रुख लगातार एक हकीकत बनता जा रहा है :

● वर्ष 2015 से 2019 के बीच लखनऊ में गर्मी और नमी वाले 123 दिन रिकॉर्ड किए गए इस तरह से इन पांच वर्षों के दौरान इनका सालाना औसत 24.6 दिन रहा।

● वर्ष 2020 से 2024 के दौरान यह संख्या 123 से बढ़कर 166 हो गई जो पिछले 5 वर्षों के मुकाबले करीब 35% ज्यादा रही और अगर औसत देखें तो यह प्रतिवर्ष 33.2 दिन था।

● वर्ष 2020 में सबसे ज्यादा 45 दिन भीषण गर्मी और उमस भरे रहे जिससे यह जाहिर होता है कि उमस भरी गर्मी वाले दिन लगातार बढ़ रहे हैं।

आम ख्याल यह होता है कि हीट स्ट्रेस मानसून से पहले होने वाली एक घटना है लेकिन लखनऊ के कंपाउंड हीट बर्डन का ज्यादातर असर मानसून के महीनों यानी जून से सितंबर के दौरान ही देखा जाता है और पिछले एक दशक में शहर में गर्मी और उमस वाले कुल 289 में से 257 दिन इन्हीं महीनों में दर्ज किए गए हैं।

यह मौसमी बदलाव उल्लेखनीय है क्योंकि ज्यादा उमस की वजह से पसीने के जरिए शरीर को खुद को ठंडा रखने की क्षमता कम हो जाती है जिससे ज्यादा तापमान वाले गर्मी के दिनों के मुकाबले कम तापमान होने पर भी हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। उमस भरी रातों की वजह से रात भर में होने वाली क्षतिपूर्ति भी कम हो जाती है, जिससे खासतौर पर खुले में काम करने वाले कामगारों तथा बुजुर्गों बच्चों एवं गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों पर अतिरिक्त भार पड़ता है।

रात के तापमान में वृद्धि

भारत में गर्मी का जोखिम सिर्फ दिन के तापमान से ही नहीं जुड़ा है बल्कि लगातार गर्म हो रही रातों से भी इसका संबंध है। रातों का अधिक तापमान दिन में पड़ने वाली गर्मी से हुए नुकसान की भरपाई की रफ्तार को कम कर देता है और साथ ही साथ इससे स्वास्थ्य तथा आजीविका से संबंधित दुष्प्रभाव भी और गहरे हो सकते हैं।

लखनऊ की रातें औसतन ज्यादा गर्म हो रही हैं। इसका अंदाजा इस बात से होता है कि वर्ष 1981 से 2000 के बीच जहां रात का औसत तापमान 18.92 डिग्री सेल्सियस था, वह 2001 से 2024 के बीच 19.35 डिग्री सेल्सियस पहुंच चुका है जो कि 0.43 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी है। दरअसल बीच में बसा होने के कारण लखनऊ में रात का तापमान आसपास के ग्रामीण इलाकों के मुकाबले लगभग 5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा रहता है।

लखनऊ में गर्म रातों का सिलसिला लगातार बना हुआ है। वर्ष 2024 में जहां ऐसी रातों की संख्या 126 रिकॉर्ड की गई थी, वहीं 2015 में यह 124 और 2016 में 128 रही। यहां तक कि वर्ष 2018 में न्यूनतम होने के बावजूद ऐसी रातों की संख्या 93 थी, जिससे यह जाहिर होता है कि रात के वक्त का बढ़ता तापमान अब कोई कभी-कभार होने वाली घटना नहीं बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया बन गई है।

भारतीय मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉक्टर के. जे. रमेश ने कहा, "ग्लोबल वार्मिंग की वजह से तापमान में बढ़ोत्‍तरी के साथ-साथ खासकर सिंधु-गंगा के मैदानी इलाकों में नमी के स्तर में भी अपेक्षाकृत काफी इजाफा हुआ है। लखनऊ सिंधु-गंगा के मैदानों के बीचों-बीच बसा है। इस इलाके की कम ऊंचाई और बेसिन जैसी भौगोलिक बनावट के चलते हवा ठहरी रहने की वजह से नमी बरकरार रहती है। नमी का ऊंचा स्तर उमस भरी गर्मी के असर को और बढ़ा देता है जिससे सेहत से संबंधित जोखिम खासकर सांस और गर्मी से जुड़ी बीमारियां बढ़ जाती हैं और लखनऊ जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में लोगों को काफी दुश्वारियां होती हैं।"

अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट" : तेजी से होता शहरीकरण हीट एक्स्पोजर को और बढ़ा रहा है

जहां स्थानीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन सिंधु गंगा के मैदानों में नमी की मात्रा को बढ़ा रहा है, वहीं लखनऊ का तेजी से और अधिकतर अनियोजित तरीके से हो रहा फैलाव अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट (यूएचआई) के जरिये स्थानीय स्तर पर गर्मी को कई गुना बढ़ा रहा है।

पिछले दो दशकों के दौरान लखनऊ में नई आवासीय कालोनियां, वाणिज्यिक भवन, सड़क नेटवर्क और परिवहन संबंधी मूलभूत ढांचे का काफी तेजी से विकास हुआ है। इस वजह से उत्तर प्रदेश की राजधानी में यूएचआई का प्रभाव बढ़ा है। इसमें से ज्यादातर विकास गतिविधियों की वजह से हरी भरी जमीन कंक्रीट के जंगल में तब्दील हो गई है, जिसके कारण दिन के समय उसमें गर्मी का अवशोषण ज्यादा मात्रा में होता है, जो रात में धीरे-धीरे निकलती है।

उमस भरे हालत में इसके नतीजे खासतौर पर महत्वपूर्ण होते हैं :

● पेड़ों और खुली जगह की कमी से वाष्पीकरण से होने वाली कुदरती ठंडक कम हो जाती है।

● घनी आबादी वाले इलाकों में हवा का प्रवाह रुक जाता है, जिससे गर्मी और नमी वहीं पर फंसकर रह जाती हैं।

● इमारत और सड़कों में जमा गर्मी रात के तापमान के स्तर को ऊंचा बनाए रखती है जिससे गर्म दिनों के बाद शरीर को आराम नहीं मिल पाता है।

● एयर कंडीशनर के ज्यादा इस्तेमाल से पहले से ही गम शहर में और भी गर्मी भर जाती है जिससे एक ऐसा चक्र बन जाता है जो स्थानीय तापमान को और भी ज्यादा बढ़ा देता है।

मृत्‍यु दर

लखनऊ में अधिक गर्मी के कारण सालाना होने वाली मौतों का आंकड़ा प्रति हजार 0.2 से लेकर 0.4 तक है। लखनऊ जैसे चारों तरफ से घिरे शहरों में गर्मी से होने वाली मृत्यु की घटनाओं की दर तटीय नगरों के मुकाबले ज्यादा है। यह अंतर आंशिक रूप से निचले इलाकों में बसे शहरों में ज्यादा अर्बन हीट आईलैंड प्रभाव के कारण है, जहां रात में समुद्र से मिलने वाली ठंडक ना होने से मानव शरीर का तापमान कम होना मुश्किल हो जाता है।

ऐसा अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ज्यादा उत्सर्जन वाले हालत में लखनऊ में सभी आयु वर्गों के लोगों में गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों की संख्या में लगभग 50% की बढ़ोत्‍तरी होगी। नतीजतन प्रति हजार लोगों पर गर्मी से होने वाली अतिरिक्त मौतों का प्रतिशत 0.6 तक पहुंच जाएगा। नगरीय विस्तार को ध्यान में रखते हुए इसका मतलब है कि लखनऊ में हर साल गर्मी से लगभग 4000 लोगों की मौत होगी।

वरिष्ठ स्वास्थ्य सलाहकार डॉक्टर नायरा शकील ने कहा, "लखनऊ में जलवायु परिवर्तन और बेतहाशा गर्मी खासकर महिलाओं और बच्चों की सेहत के लिए जोखिम को उल्लेखनीय रूप से बढ़ा रहे हैं। गर्भावस्था के दौरान समय से पहले बच्चों का जन्म होने, बच्चों का वजन कम होने, जेस्टेशनल हाइपरटेंशन और नवजात शिशु की मौत का खतरा बढ़ जाता है। बहुत ज्यादा गर्मी से गर्भावस्था में मां की सेहत पर बुरा असर पड़ता है, जिससे हाइपरटेंशन से जुड़ी परेशानियों और प्री-एक्लेम्पसिया हो सकता है। इतना ही नहीं कई मामलों में बहुत ज्यादा डिहाइड्रेशन और तनाव की वजह से जेस्टेशनल डायबिटीज की समस्या भी पैदा हो सकती है, जिससे नवजात शिशु की मौत की वजहें बढ़ जाती हैं और जिन माताओं को जेस्टेशनल डायबिटीज और प्री-एक्लेम्पसिया होता है उन्हें समय से पहले प्रसव और कम वजन वाले बच्चे होने का खतरा ज्यादा होता है। एक और अहम बात यह है कि बहुत ज्यादा गर्मी और उमस कई तरह के जीवाणुगत और फंगल संक्रमण के लिए उपयुक्त माहौल तैयार करती है। मौसम में बहुत ज्यादा बदलाव ने हमें कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति संवेदनशील बना दिया है, इनमें महिलाएं और बच्चे खासतौर पर शामिल हैं।

श्रमिकों की उत्पादकता पर प्रभाव

काम के सालाना घंटों का करीब 20% हिस्सा हीट स्ट्रेस के उन असुरक्षित स्तरों से प्रभावित होता है जब वेट बल्ब ग्लोब टेंपरेचर (डब्ल्यूबीजीटी) 30 डिग्री सेल्सियस की सीमा को पार कर जाता है। प्रदूषणकारी तत्वों के अधिक उत्सर्जन की स्थिति में यह हिस्सेदारी 30 से 40% तक बढ़ सकती है, नतीजतन उत्पादकता में उल्लेखनीय गिरावट होती है और प्रतिवर्ष अर्बन डॉलर का आर्थिक नुकसान भी होता है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन 'प्रायरटाइजिंग हीट एडॉप्शन मेजर्स एक्रॉस इंडियन सिटीज : अ बेनिफिट कॉस्ट एनालिसिस' (भारतीय नगरों में गर्मी से निपटने के उपाय को प्राथमिकता देना : एक लाभ लागत विश्लेषण) के मुताबिक इन हानियों से शहर की जीडीपी पर 4% तक का दुष्प्रभाव पड़ सकता है।

अध्ययन में बताया गया है कि अधिक उत्सर्जन वाली स्थितियों में वर्ष 2050 तक यह हानियां 50% तक बढ़ सकती हैं। एक अनुमान के मुताबिक लखनऊ की आबादी में काफी वृद्धि होगी और वहां आर्थिक नुकसान भी दोगुना हो सकता है। लखनऊ पर इसका असर बहुत ज्यादा होगा क्योंकि यहां के लोग बाहरी शारीरिक कार्यों जैसे कि दिहाड़ी मजदूरी, रेहड़ी लगाना, कृषि कार्य और गिग वर्किंग पर बहुत ज्यादा निर्भर हैं।

एनआरडीसी इंडिया में क्लाइमेट रेसिलियंस एंड हेल्थ के प्रमुख अभियंत तिवारी ने कहा, " लखनऊ में गर्मी से जुड़े जोखिम पर चढ़ते पारे, नमी और लगातार गर्म रहने वाली रातों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2015 से 2019 और 2020 से 2024 के बीच गर्मी तथा उमस वाले दिनों में 35% की वृद्धि खासतौर पर फिक्र पैदा करती है, क्योंकि ज्यादा नमी के कारण पसीना नहीं सूखता है और पसीना सूखने से मिलने वाली ठंडक कम हो जाती है। वहीं, गर्म रातों की वजह से दिन की गर्मी से शरीर को उबरने में परेशानी होती है। इन सभी चीजों का मिला-जुला प्रभाव गर्मी से बहुत ज्यादा थकान दिल और सांस से जुड़ी तकलीफ हो गुर्दे को नुकसान और गर्मी से होने वाली मौतों का जोखिम बढ़ा सकता है। इसका सबसे ज्यादा असर बुजुर्गों, पुरानी गंभीर बीमारियों से जूझ रहे लोगों और बाहर काम करने वाले लोगों पर पड़ता है। अब तरजीह इस बात को दी जानी चाहिए कि इन प्रमाणों के आधार पर ठोस कदम उठाए जाएं। जैसे कि गर्मी और सेहत से जुड़ी प्रारंभिक चेतावनी देना, जोखिम से घिरे लोगों की खास सुरक्षा करना और ऐसी शहरी योजनाएं बनाना जिससे छांव, हरियाली और कुदरत ठंडक वापस आ सके।

मुख्य निष्कर्ष

लखनऊ इस बात की मिसाल पेश कर रहा है कि किस तरह सिंधु-गंगा के मैदानों में हीट रिस्‍क का स्‍वरूप बदल रहा है। जहां अत्‍यधिक तापमान एक चिंता का विषय बना हुआ है, वहीं गर्मी, उमस और तेजी से हो रहे शहरीकरण के बीच बढ़ते आपसी असर की वजह से 'थर्मल स्ट्रेस' का दौर लंबा और अधिक खतरनाक होता जा रहा है। जैसे-जैसे उमस भरी गर्मी की घटनाएं बढ़ रही हैं, जन-स्वास्थ्य की रक्षा और शहर की आर्थिक उत्पादकता बनाए रखने के लिए अधिक हरियाली वाली शहरी योजना, मजबूत 'हीट एक्शन प्लान' और कमजोर तबकों के लिए खास सुरक्षा उपायों के जरिए ऐसे क्षेत्र बनाना जरूरी हो जाएगा जो बदलते मौसम का सामना कर सकें।

डॉ. सीमा जावेद

पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ

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