आत्मसम्मान और आज़ादी की लड़ाई: फ़लस्तीनी लोग न्याय मिलने तक संघर्ष जारी रखेंगे

नई दिल्ली के प्रेस क्लब में आयोजित परिचर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि फ़लस्तीन का संघर्ष केवल भू-राजनीति नहीं बल्कि आत्मनिर्णय, संप्रभुता और सम्मानजनक जीवन के अधिकार की लड़ाई है। वक्ताओं ने ग़ज़ा युद्ध, इज़रायली कब्ज़े और वैश्विक राजनीति पर गंभीर सवाल उठाए।

By :  Hastakshep
Update: 2026-03-12 17:16 GMT

Fight for self-respect and freedom: Palestinians will continue their struggle until justice is achieved

फ़लस्तीन का संघर्ष केवल भू-राजनीति नहीं, सम्मान से जीने का अधिकार है: दिल्ली चर्चा में उठी आवाज़

  • दिल्ली में फ़लस्तीन पर बड़ी चर्चा: ‘इंसाफ़ और आत्मनिर्णय के बिना शांति संभव नहीं’
  • ग़ज़ा युद्ध और पश्चिम एशिया की राजनीति पर दिल्ली में विमर्श, विशेषज्ञों ने फ़लस्तीन के संघर्ष को बताया न्याय की लड़ाई
  • नई दिल्ली में फ़लस्तीन मुद्दे पर महत्वपूर्ण परिचर्चा
  • फ़लस्तीनी संघर्ष की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और क्षेत्रीय राजनीति
  • फ़लस्तीन की ज़मीनी हकीकत: यात्रा अनुभव और प्रत्यक्ष गवाही
  • भू-राजनीति, संसाधन और संप्रभुता का प्रश्न
  • पश्चिम एशिया में धार्मिक-राजनीतिक विमर्श और ज़ायोनीवाद की बहस
  • भारत में एकजुटता और वैश्विक न्याय का प्रश्न

फ़लस्तीनी लोग आत्मसम्मान के साथ जीने के हक़ के लिए जीतने तक लड़ेंगे

नई दिल्ली, 12 मार्च 2026 (जॉयसिया थोरात)। इज़रायली क़ब्ज़े में जी रहे फ़लस्तीनी लोगों के जुझारूपन और सहनशक्ति के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी सुनने का अवसर दिल्ली के लोगों को मिला। इज़रायल ने क़रीब अस्सी वर्षों से फ़लस्तीन के लोगों को लगातार दमन, शोषण और नस्लभेद की स्थिति में रखा हुआ है। इस लगातार अपमान और इंसाफ़ से परेशान होकर ही हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इज़रायल पर हमला किया था जिसके बदले में ग़ज़ा में इज़रायल ने नरसंहार मचा दिया है और 80 हज़ार से भी ज्यादा लोगों को मार डाला है। जो लोग इज़रायल के इस ज़ुल्म का सामना कर रहे हैं, उनमें फ़लस्तीन में रहने वाले मुसलमान ही नहीं, बल्कि ईसाई और यहूदी भी शामिल हैं।

इंडो-फिलिस्तीन सॉलिडैरिटी नेटवर्क (आईपीएसएन) ने 06 मार्च, 2026 को नयी दिल्ली के प्रेस क्लब में "फिलिस्तीन, ज़ायोनी-साम्राज्यवादी प्रभुत्व, और बदलती भू-राजनीति" विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया, जिसमें पश्चिम एशिया के मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार डॉ. क़मर आगा, कवि, पत्रकार और मानवाधिकार कार्यकर्ता विनीत तिवारी, अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता, संपादक और लेखक पत्रकार डॉ. जॉन दयाल और आईपीएसएन की दिल्ली की समन्वयक जॉयसिया थोराट शामिल थीं।

डॉ. क़मर आगा ने स्थिति की ऐतिहासिकता और अमेरिका और इज़राइल की विस्तारवादी नीति के षड्यंत्रों को ज़ाहिर किया। उन्होंने कहा कि साम्राज्यवादी शक्ति के माध्यम से अमेरिका और इज़रायल दशकों से दूसरे देशों में हस्तक्षेप कर अपना विस्तार कर रहे हैं। ज़ायोनी शासन बाइबिल में उल्लेखित भू-भागों में बसने की अपनी 'ग्रेटर इज़राइल' योजना पर निर्माण का और उन इलाक़ों पर कब्ज़ा कर अपने में मिलाने का काम कर रहा है। हालाँकि 5000 साल पुराना यह क्षेत्र यहूदियों, ईसाइयों और मुसलमानों – तीनों ही इब्राहीमी धर्मों - के लिए पवित्र है। लेकिन धार्मिक बहानों के पीछे, ईरान पर युद्ध और ग़ज़ा में नरसंहार के अमेरिकी और इज़राइली युद्ध का मुख्य उद्देश्य भूमि, तेल, खनिजों, गैस और कीमती पत्थरों जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण हासिल करना है। द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद अमेरिका और इज़रायल को अरब देशों कि अधिकांश वैयक्तिक राजसी ऐयाश सत्ताओं का समर्थन हासिल होता रहा है।

डॉ. आगा ने ईरान और भारत के लोगों के सदियों पुराने संबंधों का एक सजीव ऐतिहासिक चित्र प्रस्तुत किया। बहुत पहले नहीं, ईरान और भारत के लोग व्यापार और धार्मिक उद्देश्यों के लिए सड़कों, ट्रेनों और समुद्र के रास्ते ईरान की यात्रा करते थे। इस मार्ग पर आज भी कई सराय मौजूद हैं जहाँ लोग रुकते थे और सस्ता और अच्छा भोजन प्राप्त करते थे। ईरान और भारत के रिश्ते दो सभ्यताओं के अंतसंबंधों से सदियों में बने हैं, जिन्हें भारत के मौजूदा शासक अमेरिका के डर के सामने शर्मिंदा कर रहे हैं।

विनीत तिवारी ने नवंबर में फ़लस्तीन की अपनी हाल की यात्रा के आधार पर एक सचित्र प्रस्तुति दी। उन्होंने इज़रायली सेना और सेट्लर उपनिवेशवाद द्वारा लागू क्रूर शासन से प्रभावित लोगों से बात करके प्राप्त अपनी कई अंतर्दृष्टियों को साझा किया। उन्होंने कहा कि सेट्लर उपनिवेशवाद ने फिलिस्तीन में एक घिनौने और अमानवीय रंगभेद (अपारथाइड) की स्थिति पैदा कर दी है, जो वहाँ स्पष्ट रूप से दिखायी देती है। एक ज़माने में जैसे यहूदियों के साथ पश्चिमी देशों ने अमानवीय व्यवहार किया था, अब इज़रायल के शासक फ़लस्तीनियों को उससे भी बुरी तरह से प्रताड़ित और उत्पीड़ित कर रहे हैं। यह विडंबना है कि यहूदियों के साथ जो अन्याय हुआ, उनके नाम पर यहूदी इज़रायली शासक अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहारे खुद वैसे ही अन्याय निरपराध, और निर्दोष फलस्तीनियों पर करते आ रहे हैं। उन्होंने ईसाइयों के सबसे बड़े तीर्थस्थल बेथलहम और जेरुसलम में और बाक़ी फ़लस्तीन में रहने वाले ईसाइयों की हालत भी बयान की।

विनीत ने फ़लस्तीन प्रवास की तस्वीरें भी प्रोजेक्टर से दिखायीं। उन्होंने इज़रायली शासन की कारगुजारियों को इस तरह से बताया कि उन्हें सुनते हुए अपनी मौजूदा सरकार द्वारा ईसाइयों और मुसलमानों के साथ किया जाने वाला व्यवहार याद आता रहा। उन्होंने कहा कि 100 साल से ज़्यादा समय से लोग फ़लस्तीन में लड़ रहे हैं। वे पैसे के मामले में आम भारतीय से अधिक समृद्ध हैं क्योंकि उनके पास ज़ैतून है और दुनिया में सबसे ज़्यादा है। लेकिन उन्हें इज़्ज़त से जीने का हक चाहिए। उन्हें इंसाफ़ चाहिए और उन्हें इज़रायल से आज़ादी चाहिए। फ़लस्तीन इज़्ज़त से जीने के हक़, इंसाफ़ और आज़ादी का पर्याय है।

अर्थशास्त्री जया मेहता ने भू-राजनीति और अर्थव्यवस्था के बारे में बात करते हुए सबसे ज़्यादा खतरे में पड़ी हुई राष्ट्रों की संप्रभुता के मुद्दे का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि फ़लस्तीन का संघर्ष उसके लोगों द्वारा संप्रभुता हासिल करने की लड़ाई है, क्योंकि फ़लस्तीन पर इज़रायल का क़ब्ज़ा है। और फ़लस्तीन के बाद, वेनेज़ुएला, क्यूबा, और ईरान की संप्रभुता पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिशें अमेरिकी साम्राज्यवाद कर रहा है। यह केवल तेल या गैस पर क़ब्ज़े की लड़ाई मात्र नहीं है बल्कि यह कुछ लोगों द्वारा दुनिया के सभी संसाधनों और आम लोगों की जानों पर भी क़ब्ज़ा जमाने की कवायद है।

डॉ. मेहता ने ईरान पर हालिया हमले और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत इसकी अवैधता के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा कि "लोकतंत्र लाने" के बहाने का उपयोग सदियों से साम्राज्यवादियों द्वारा दूसरों के संसाधनों का शोषण करने के लिए किया जाता रहा है।

जॉन दयाल ने अपने वक्तव्य में भारत और दुनिया में ईसाई ज़ायोनीवाद (क्रिश्चियन ज़ायोनिज़्म) की निंदा की, इसे साम्राज्यवादी ताक़तों और युद्धखोरों के साथ मिलाजुला बताया।

डॉ. जॉन दयाल ने कहा कि इस इलाक़े में अनेक शताब्दियों से फ़लस्तीन में अरब ईसाई हैं, अरब मुसलमान हैं और अरब यहूदी भी हैं। यह वैसा ही है जैसे कश्मीर में रहने वाले कश्मीरी और तमिलनाडु में रहने वाले तमिल हैं, चाहे वह ईसाई हों, हिन्दू हों या मुसलमान। और सभी यहूदी ज़ायोनिस्ट यानि यहूदीवादी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि अनेक यहूदी लोग भी जो इज़रायल के नागरिक हैं, वे भी फ़लस्तीन के समर्थक हैं, जैसे कि 'ज़्यूज़ फॉर जीसस' समूह।

उन्होंने भारत के लोगों से फ़लस्तीनियों के साथ अपनी एकजुटता को फिर से मजबूती से प्रकट करने का आह्वान किया। उन्होंने लोगों से, विशेषकर भारत में ईसाइयों से, "अपनी आत्मा की खोज" करने को कहा। उन्होंने श्रोताओं को मौजूदा सरकार के पीछे की राजनीतिक शक्ति आरएसएस के कुतर्क की याद दिलाई, जो पहले तो एडॉल्फ हिटलर की प्रशंसा करती थी जिसने नस्लवाद का नाम लेकर लाखों यहूदियों का क़त्ल करवा दिया और अब उन्हीं यहूदियों के नाम पर चलाए जा रहे यहूदीवाद की प्रशंसा करती है क्योंकि यहूदीवाद इस्लाम से नफ़रत करने पर ज़ोर देता है।

कार्यक्रम के अंत में जॉयसिया ने धन्यवाद देते हुए दर्शकों को याद दिलाया कि उन्हें यह तय करना होगा कि क्या वे इतिहास के सही पक्ष में रहना चाहते हैं, या अमानवीय सैन्यवादी शासनों और अन्य लोगों की भूमि पर उनके विस्तार के समर्थकों के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं।

कार्यक्रम में एनएफ़आईडब्ल्यू कि राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री सईदा हमीद, सुश्री कोनिनिका रे, दीप्ति भारती, संगीता, एआईएसएफ़ के राष्ट्रीय महासचिव दिनेश श्रीरंगराज, एआईवायएफ़ के युवा नेता धीरेन्द्र तिवारी, शिजो वर्गीज़, दानिश बुक्स की सुनीता कुमारी, रेवलूशनेरी वर्कर्स पार्टी ऑफ़ इंडिया के योगेश स्वामी, पत्रकार सर्वेश, एन. के. रामकृष्णा, डॉ. अंशु एंथनी, तारा नेगी, वायएमसीए के आलोक मिचयारी, पीस के महिबुल, आदि अनेक पत्रकार, लेखक, विद्यार्थी, प्रोफ़ेसर शामिल हुए।

समापन के पूर्व उपस्थित प्रतिभागियों और दर्शकों ने फ़लस्तीनी आत्मनिर्णय के संघर्ष के समर्थन में फ़लस्तीन के पोस्टर और तस्वीरों के साथ खड़े होकर अपना समर्थन व्यक्त किया।

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