"शाम की टपरी": डॉ. कविता अरोरा की नज़्में महसूस होती हैं, सुनी नहीं जातीं

A critical review of Dr Kavita Arora’s “Shaam Ki Tapri”, exploring nasri nazm, prose poetry, memory, emotion and its place in modern Urdu-Hindi literature.

By :  Hastakshep
Update: 2026-02-02 05:34 GMT

Shaam Ki Tapri poetry book review

“शाम की टपरी”: गद्य कविता जिसे महसूस किया जाता है, सुना नहीं जाता

  • उर्दू-हिंदी साहित्यिक परंपरा में नस्री नज़्म को समझना
  • बॉदलेयर से लेकर आधुनिक दक्षिण एशियाई गद्य कविता तक
  • समकालीन गद्य कविता में डॉ. कविता अरोरा का स्थान
  • “शाम की टपरी” में भाषा, बिंब और भावनात्मक तीव्रता
  • डॉ. कविता अरोरा की नज़्मों का प्रभाव रूप से परे क्यों है
  • उनकी लेखन में स्मृति, रोज़मर्रा की ज़िंदगी और संवेदी विवरण
  • जब गद्य अनुभव बन जाता है: नस्री नज़्म की शक्ति
  • “शाम की टपरी” एक साहित्यिक और भावनात्मक यात्रा के रूप में…

डॉ. कविता अरोरा की "शाम की टपरी" का एक क्रिटिकल रिव्यू, जिसमें नस्री नज़्म, गद्य कविता, यादों, भावनाओं और आधुनिक उर्दू-हिंदी साहित्य में इसकी जगह के बारे में बताया गया है।

"शाम की टपरी" पर कुछ बातें - सुहेल आज़ाद

नसरी नज़्म, शायरी की एक ऐसी विधा ( सिन्फ ) है जिसमें काव्यात्मक भाव, कल्पनाशीलता ( तख्य़ुल )और सौंदर्य ( हुस्न ) तो होता है, लेकिन उसमें बहर क़ाफिया-रदीफ की पाबंदियाँ नहीं होतीं। यह गद्य यानी नस्र के रूप में लिखी जाती है लेकिन उसका असर और बयानिया पूरी तरह से कवितामय यानी शायराना होता है।

उर्दू -हिंदी शायरी में नसरी नज़्म का तसव्वुर यूरोपीय साहित्य, ख़ास कर फ्रांसीसी और अंग्रेज़ी शाएरी से आया।

चार्ल्स बौडेलेयर (Charles Baudelaire) जैसे कवियों ने 19वीं सदी में नसरी नज़्में लिखी थी।

उर्दू में नसरी नज़्म जदीद अहद (Modernism) से प्रभावित हुई। यूं समझ लीजिए कि 1950 /1960 ई. के आस - पास हिंदुस्तानी शायरी में नसरी नज़्म को रिवाज मिला, तब से लेकर आज तक लगभग पिछले 70 सालों में ख़ूब नसरी नज़्में कहीं जाने लगी।

शायरी का यह ज़माना, post modern age (उत्तर आधुनिक युग) कहलाता है, यानी इन नज़्मों को वक़्त के साथ मजी़द इस्तहकॉम ( stablishment ) मिलता गया।

खै़र यहां नसरी नज़्मों की तारीख़ बताना मक़सद नहीं है, ना ही उन तनक़ीद निगारों पर बहस करना है कि जिन्होंने इन नज़्मों की ताईद या इन नज़मों पर तनक़ीद की बल्कि यहां तो "शाम की टपरी" की मुसन्निफ़ा डॉ. कविता अरोरा की नसरी नज़्मों पर बात करना मक़सद है।

मैं बिना किसी तकल्लुफ़ के कह सकता हूं कि डॉ. कविता अरोरा की नसरी नज़्मों में एहसास की शिद्दत और अल्फ़ाज़ की बुनत का फ़न नुमाया है। आपकी इस किताब में शामिल नज़्में अपने अंदाज़-ए-बयान, अल्फ़ाज़ के चुनाव और ख़याल की गहराई के ज़रिए पढ़ने वाले के दिल-ओ-दिमाग़ पर सीधा असर करती हैं। इस किताब को पढ़कर तो मैं यह कह सकता हूं कि अदब की दुनिया में इन नसरी नज़्मों का एक अहम और ख़ास मक़ाम है। डॉ. कविता अरोरा के यहां ऐसा सलीका़ है कि जिसने शायरी की रूह को बाक़ी रखा है।

डॉ. कविता अरोरा की, नसरी नज़्मों की बेहतरीन मिसालें हैं। आपकी नसरी नज़्म का सबसे बड़ा हुस्न यही है कि वह अपने उनवान पर पूरी तरह क़ायम रहते हुए एक ऐसे सफ़र पर ले जाती है जहाँ जज़्बात, तजुर्बात और तसव्वुरात का इज़हार बड़ी ख़ूबसूरती से होता है।

इन नसरी नज़्मों की एक और खा़सियत यह भी है कि इनमें न तो लफ़्ज़ों की ज़्यादती है और न ही बेमतलब तसल्सुल। हर जुमला, हर तहरीर, हर मिसरा अपने मक़सद को बख़ूबी बयान करता है। यह नज़्में महसूस होती हैं, सुनी नहीं जातीं; समझी जाती हैं, रटी नहीं जातीं। उनमें नज़्म निगार का दर्द, सोच, और जज़्बा खुलकर सामने आता है।

डॉ. कविता अरोरा की नसरी नज़्म में सबसे ज़रूरी चीज़ यह है कि वह अपने मौज़ू से हटकर कहीं भटकने नहीं देती। यह फ़न हर किसी के बस की बात नहीं। इसमें बहुत गहराई से सोचना पड़ता है और अल्फ़ाज़ की तर्जुमानी करना होती है जो एक ज़िम्मेदारी बन जाती है। लेकिन जब कोई नसरी नज़्म इस फ़न को बख़ूबी अदा करती है, तो वह सिर्फ़ एक तहरीर नहीं, बल्कि एक तजरबा बन जाती है — एक एहसास, जो देर तक दिल में ठहर जाता है।

यह कहना ग़लत न होगा कि इन नज़्मों में जो कुछ भी कहा गया है, वह सिर्फ लिखा नहीं गया, बल्कि जिया गया है। यह नसरी नज़्में अपने अंदाज़, अपने अल्फ़ाज़ और अपनी सच्चाई की वजह से याद रखी जाने के क़ाबिल हैं। और यही एक अच्छे नसरी नज़्म निगार की सबसे बड़ी कामयाबी है।

मैं अपनी बात की तस्दीक़ के लिए शायरा की वह नज़्म पेश करता हूं कि जो नज़्म किताब का उनवान बनी है-

"शाम की टपरी"

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चलो न संग मेरे,

तुम्हें क्षितिज तक ले चलूँ

देखना, वहाँ शाम कैसे धौल मचाती है,

धमक ज़मीन तक आती है

लाल-गुलाबी बादल दौड़ते हैं

रंगों के भीगे चोले में,

अल्हड़-सी खेलती है साँझ

इन बादलों के टोले में

उधर कोहसार में

छुपकर बहता दरिया

लपक लेता है

धूप का बचा टुकड़ा,

डुबो देने को छप्प से

सिंदूरी पानी के गड्ढे में

मुहल्ले-सी रौनकें लगती हैं

हर शाम उफ़ुक के अड्डे पे

कभी तो सहन की सीढ़ियाँ

उलाँघो,

बैठो छत की मुंडेर-बन्नी पे

देखो न छान कर

दिन की छन्नी से

कैसे

चाय की टपरी सजाती है

इक कत्थई शाम,

हर शाम

तुम्हें चाय पे बुलाती है

यह नज़्म एहसास की उन बारीक पर्तों को खोलती नज़र आती है, जो शायरा का ख़ास रंग है। इसे यूं भी समझा जा सकता है कि हर इंसान की नफ़सियात है कि वो हर possible या impossible तख़्य्युल को अपने sub conscious से बरामद करता है। यह वो एहसास हैं जो या तो उसकी याद और तसव्वुर के साथ हम रंग और हम साज़ हैं या जिन को उसकी तमाम ज़हनी कायनात पर फैला हुआ महसूस किया जा सकता है। एक और ख़ास बात यह है कि इस नज़्म में जो अल्फ़ाज़ इस्तेमाल हुए हैं वो बहुत मज़ेदार हैं ( इसी नज़्म में नहीं ब्लिक बाक़ी नज़्मो में भी अल्फ़ाज़ का इस्तेमाल बहुत ख़ास सलीक़े से किया गया है ) जैसे मुंढेर, धूप का टुकड़ा, कत्थई शाम वग़ैरा। आप शायद महसूस करते होंगे कि शायरा का बयानिया बहुत सादा है यानी, वह "किसी" को क्षितिज तक ले कर चलना चाहती है, जहां एक स्याह शाम चाय पर इंतज़ार कर रही है। बज़ाहिर यह एक सादा सा ख़्याल हो सकता है मगर इस में पोशीदा ख़्वाहिश, तमन्ना, इंतज़ार, आरज़ू, मोहब्बत और पुराने वक़्त की महक ने हज़ारहा रंग और पर्तें अता कर दी हैं जिनको पढ़ने वाला, खोल कर हैरान हो सकता है।

दो और नज़्में मुलाहिज़ा फ़रमाएं -

"उम्र का झूला"

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सुबह-सवेरे का वक्त था।

वो कमरे की क़ैद से छूटकर

टहलने निकला —

जैसे कोई परिंदा

आसमान देखकर

ख़ुश होता है

वो ख़ुश था

धीमे-धीमे क़दमों पर

दौड़ते मन को लिए

वो पार्क की ओर बढ़ा

पार्क के कोने में झूला था —

वो हौले से झूले पर जा बैठा,

और हवा की लय पर

धीरे-धीरे पींगें लेने लगा।

यूँ लगा, जैसे

बचपन का जिगरी दोस्त

पीठ पर धक्का देकर झूला ठेल रहा हो,

कहता हुआ —

“दो पींग बाद मेरी बारी है।”

बरगद की छनी धूप में

हवा माँ की तरह

बालों में उँगलियाँ फिरा रही थी।

वो माज़ी के लम्हों में था,

पर तभी —

कानों में अनजानी

हँसी की आवाज़ गूँजी।

उसने महसूस किया —

लोग देख रहे हैं शायद।

वो सकुचाया,

और फिर बचपन, दोस्त, माँ

और मन —

सबको वहीं छोड़

झूले से उतर गया।

पचहत्तर साल का लड़का —

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" वो भी क्या दिन थे"

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वो भी क्या दिन थे —

जब चौक के मेले में

हम-तुम खो जाते थे,

और मिलते तो

बहते गंगा-जमुना की धारों से।

वो भी क्या दिन थे —

जब चरखी के धागों में

उलझी हवाओं में

पतंग नहीं,

ख़्वाबों की उड़ान होती थी।

भटियारी सराय के मोड़ से पहले

एक पान की दुकान होती थी,

लगती थीं कबूतरों की बाज़ियाँ,

सराय-ए-फ़क़ीर में

मुर्ग़ों की लड़ाई,

और तमाशबीनों की भीड़ में,

चिलम गुड़गुड़ाते अब्बा का चिल्लाना,

और झरोखों से झाँकती लड़कियों का

झट से हट जाना।

कंधे पर अँगोछा,

अठन्नी-चार आना,

स्कूल के नुक्कड़ पर

रुकने का बहाना।

चाय की टपरी, कुल्हड़ की चाय,

गुरूदत्त से लड़के,

वो पुरानी सराय।

मधुबाला-सी लड़कियाँ,

खुलती-बंद खिड़कियाँ,

साइकिलों की ट्रिन-ट्रिन,

वो उड़ते दुपट्टे।

सादगी की बातों पर

लगते हुए ठठ्ठे —

जैसे धूप ने ली हो

बारिश की मीढ़।

सिनेमा की टिकट को

लगती हुई भीड़,

समोसे की ख़ुशबू,

सीटी-ताली का शोर।

वो काले-सफ़ेद दिन —

रंगीन जज़्बातों की डोर

थामे हुए,

धक्का-मुक्की में फँसी यादें

फिर से

बालकनी का टिकट चाहती हैं।

शायरा के यहाँ यादें हैं, ख़ुशबू है, पुराने दिनों की तस्वीरें हैं, आफ़ाक़ी मनज़र नामे ( horizontal pictures ) हैं और अपनापन है। कभी-कभी तो इन हसीन मिसरों से गुज़रते हुए यूं लगता है जैसे धूप, जंगल की बे करानी में मीठी बांसरी की धुन सुना रही हो या जैसे कोई देखने वाला या गुज़रने वाला यादों के तालाब से तरह-तरह की लहरों के बीच पहली बार बनते बिगड़ते ज़ावियों को देख कर मज़ा ले रहा हो।

डॉ. साहिबा को बहुत मुबारकबाद इस ख़ूबसूरत "नाम" के लिये, हसीन collection के लिये और उनके सतत लेखन के लिये।

उम्मीद है यह किताब एहले सुख़न के दिल में जगह बनायेगी।

सुहेल आज़ाद

हल्द्वानी ( नैनीताल )

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