ला नीना भी नहीं रोक पा रहा तापमान: भारत में जल्दी दस्तक दे रही हीटवेव, छोटी होती जा रही सर्दियां
भारत में सर्दियां छोटी और गर्म होती जा रही हैं। 2025 रिकॉर्ड के सबसे गर्म वर्षों में शामिल रहा और 2026 की शुरुआत में ही कई क्षेत्रों में हीटवेव जैसे हालात बनने लगे। वैज्ञानिकों के अनुसार जलवायु परिवर्तन ने La Niña के ठंडे प्रभाव को भी कमजोर कर दिया है
Even La Niña Fails to Curb Temperatures: Heatwaves Arrive Early in India as Winters Grow Shorter
भारत में मौसम चक्र का बदलता पैटर्न: जल्दी खत्म हुई सर्दियां
- जलवायु परिवर्तन बनाम La Niña: क्यों कम हो रहा ठंडक का असर
- रिकॉर्ड गर्म वर्ष: भारत में तापमान का बढ़ता रुझान
- जल्दी शुरू हुई हीटवेव: कई राज्यों में तापमान सामान्य से ऊपर
- मुंबई और दिल्ली में असामान्य तापमान
- हीटवेव और बढ़ता वेट-बल्ब तापमान: स्वास्थ्य के लिए खतरा
- कमजोर पश्चिमी विक्षोभ और सूखी सर्दियां
- महासागरों का बढ़ता तापमान और बदलती जलवायु प्रणाली
- भविष्य की चुनौती: अधिक हीटवेव और अनिश्चित मौसम
भारत में मौसम का पारंपरिक चक्र तेजी से बदल रहा है। 2026 की शुरुआत में ही कई हिस्सों में हीटवेव जैसे हालात बनने लगे हैं, जबकि सर्दियां फरवरी के पहले पखवाड़े में ही खत्म हो गईं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते जलवायु परिवर्तन ने La Niña जैसे प्राकृतिक ठंडे प्रभावों को भी कमजोर कर दिया है। इसी कारण तापमान लगातार बढ़ रहा है, हीटवेव के दिन बढ़ रहे हैं और सर्दियां छोटी तथा अधिक गर्म होती जा रही हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह बदलाव केवल मौसम तक सीमित नहीं है—इसका असर स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
भारत में जल्दी दस्तक दे रही हीटवेव और छोटी होती सर्दियां
ला नीना पर भारी पड़ा जलवायु परिवर्तन, भारत में जल्दी दस्तक दे रही हीटवेव और छोटी होती सर्दियां
नई दिल्ली, 13 मार्च 2026. भारत में इस वर्ष सर्दियों ने फरवरी के पहले पखवाड़े में ही विदाई ले ली, और इसके साथ ही असामान्य रूप से जल्दी गर्मियों का रास्ता साफ हो गया। लगातार एक और साल ऐसा देखने को मिला है जब वसंत ऋतु लगभग नदारद रही, और देश के कई हिस्सों में मौसम की सामान्य समयसीमा से काफी पहले ही हीटवेव जैसी परिस्थितियां बनने लगीं।
आमतौर पर ला नीना (La Niña) की स्थिति वैश्विक तापमान को कुछ हद तक ठंडा करने का काम करती है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में बढ़ती वैश्विक गर्मी ने इन पारंपरिक मौसमीय पैटर्न को बदलना शुरू कर दिया है।
वर्ष 2025 में पूरे भारत का वार्षिक औसत सतही वायु तापमान 1991 से 2020 के दीर्घकालिक औसत से 0.28 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया। दिलचस्प बात यह है कि ला नीना वर्ष होने के बावजूद 2025, 1901 के बाद से दर्ज आठवां सबसे गर्म वर्ष बन गया।
यह पहली बार नहीं है जब जलवायु परिवर्तन ने ला नीना के प्रभाव को पीछे छोड़ दिया हो। वर्ष 2020 के बाद से चार वर्षों में ला नीना की स्थिति बनी रही, जिनमें 2020 की गर्मियों से लेकर 2023 की शुरुआत तक चला दुर्लभ “ट्रिपल-डिप” ला नीना भी शामिल है। यह रिकॉर्ड पर दर्ज सबसे लंबी घटनाओं में से एक था। सामान्य परिस्थितियों में ला नीना वैश्विक तापमान को नीचे खींच लेता। लेकिन लगातार बढ़ते ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन ने तापमान को कम होने के बजाय ऊपर ही धकेला, और उन वर्षों में से हर एक वर्ष इतिहास के सबसे गर्म वर्षों की सूची में शामिल हो गया।
इस वर्ष गर्मी ने बिना किसी खास चेतावनी के जल्दी दस्तक दे दी है। फरवरी के दूसरे पखवाड़े से ही उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में तापमान मौसमी औसत से काफी ऊपर पहुंच गया है। कुछ स्थानों पर तापमान पहले ही हीटवेव की सीमा को छूने लगा है और कई मौसम केंद्रों को अलर्ट पर रखा गया है।
भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने भी ज्यादा राहत की उम्मीद नहीं जताई है। विभाग के अनुसार मार्च से मई के पूरे मौसम के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से अधिक हीटवेव दिनों की संभावना है।
10 मार्च को मुंबई में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जो सामान्य औसत से 7.6 डिग्री अधिक था। इसके साथ ही शहर में गंभीर हीटवेव (Severe Heatwave) जैसी स्थिति दर्ज की गई।
स्काइमेट वेदर में मौसम और जलवायु परिवर्तन के उपाध्यक्ष महेश पलावत के अनुसार,
“गुजरात और आसपास के क्षेत्रों के ऊपर बने लगातार एंटी-साइक्लोनिक सर्कुलेशन के कारण गर्म पूर्वी हवाएं मुंबई की ओर बढ़ रही हैं। इसके चलते समुद्री हवा के शहर तक पहुंचने में देरी हो रही है, जो आम तौर पर तापमान को कम करने में मदद करती है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है जो समय-समय पर दोहराई जाती है। लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में भविष्य में शहर को अधिक हीटवेव दिनों का सामना करना पड़ सकता है, क्योंकि औसत तापमान पहले से ही ऊंचा है।”
दिल्ली-एनसीआर में भी अधिकतम तापमान लगभग 35 डिग्री सेल्सियस के आसपास बना हुआ है, जो सामान्य से 5 से 7 डिग्री अधिक है। वहीं रात का तापमान भी औसत से 3 से 4 डिग्री अधिक, यानी करीब 17 डिग्री सेल्सियस के आसपास दर्ज किया जा रहा है।
गर्मी की शुरुआत
देश के कई हिस्सों में हीटवेव का असर अब साफ दिखाई देने लगा है। हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में हीटवेव से लेकर गंभीर हीटवेव जैसी परिस्थितियां दर्ज की गई हैं, जहां दिन का अधिकतम तापमान सामान्य से 5.1 डिग्री से 8 डिग्री सेल्सियस तक अधिक रहा।
इसी तरह महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में भी तापमान सामान्य से 3.1 डिग्री से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज किया गया है और क्षेत्र हीटवेव की चपेट में है।
स्काइमेट वेदर के मौसम और जलवायु परिवर्तन विभाग के उपाध्यक्ष महेश पलावत के अनुसार आने वाले दिनों में गर्मी और बढ़ने की संभावना है।
उन्होंने कहा,
“आने वाले दिनों में बढ़ती गर्मी से राहत के कोई संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। बल्कि हीटवेव का दायरा और बढ़ेगा और यह महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के अधिक इलाकों को अपनी चपेट में ले सकती है। पूर्वी और पश्चिमी तट के तटीय क्षेत्रों को भी राहत मिलने की संभावना नहीं है, जहां लोगों को गर्म और उमस भरे मौसम का सामना करना पड़ेगा। तापमान भले ही हर जगह हीटवेव की आधिकारिक सीमा को पार न करे, लेकिन बढ़ते वेट बल्ब तापमान के कारण मौसम बेहद उमस भरा और असहज महसूस होगा।”
तटीय क्षेत्रों में इन दिनों गर्म और अत्यधिक आर्द्र मौसम दर्ज किया जा रहा है, जो वातावरण में सापेक्षिक आर्द्रता (Relative Humidity) के धीरे-धीरे बढ़ने का संकेत देता है।
नमी बढ़ने से शरीर को महसूस होने वाला तापमान तेजी से बढ़ जाता है, जिसे “वेट बल्ब तापमान” (Wet Bulb Temperature) कहा जाता है। जब मानव शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है, तो शरीर को ठंडा करने के लिए पसीना निकलता है। लेकिन जब हवा में नमी अधिक होती है, तो यह प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है और शरीर के लिए गर्मी को बाहर निकालना मुश्किल हो जाता है।
ऐसी स्थिति में हीट स्ट्रेस, हीट एग्जॉशन और अन्य गर्मी से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है, और गंभीर परिस्थितियों में इससे मृत्यु के मामले भी बढ़ सकते हैं।
हीटवेव क्या है
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, हीटवेव वह स्थिति है जब किसी क्षेत्र में वायु तापमान इतना अधिक हो जाता है कि लंबे समय तक उसके संपर्क में रहने पर यह मानव शरीर के लिए खतरनाक या घातक साबित हो सकता है।
हीटवेव की परिभाषा किसी क्षेत्र में दर्ज वास्तविक अधिकतम तापमान या फिर सामान्य तापमान से उसके विचलन (departure from normal) के आधार पर तय की जाती है। दूसरे शब्दों में, यदि किसी स्थान का तापमान सामान्य से काफी अधिक हो जाए, या निर्धारित सीमा से ऊपर चला जाए, तो उसे हीटवेव की स्थिति माना जाता है।
सर्दियां छोटी हो रही हैं, और ज्यादा गर्म भी
हाल के वर्षों में दिख रही प्रवृत्ति इस साल भी जारी रही। हिमालयी राज्यों और इंडो-गैंगेटिक मैदानों में दिसंबर में सर्दियों की शुरुआत के साथ ही न तो पर्याप्त बारिश हुई और न ही सामान्य स्तर की बर्फबारी देखने को मिली।
जनवरी के महीने ने भी शुरुआती राहत नहीं दी। महीने का अधिकांश समय सूखा ही रहा। बाद में पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के दो लगातार दौर आए, जिन्होंने उत्तर और मध्य भारत में लंबे समय से चले आ रहे शुष्क दौर को तोड़ा।
पहला पश्चिमी विक्षोभ 21 से 24 जनवरी के बीच सक्रिय रहा, जबकि दूसरा 26 से 28 जनवरी के दौरान आया। इन दोनों मौसम प्रणालियों के कारण उत्तर और मध्य भारत के कई हिस्सों में बारिश और बर्फबारी हुई, जिससे लंबे समय से बने सूखे हालात में कुछ राहत मिली।
फरवरी सर्दियों के तीन महीनों में सबसे ज्यादा सूखा महीना रहा। इस दौरान वर्षा में 81 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। पूरे महीने में सिर्फ 4.2 मिमी बारिश हुई, जबकि सामान्य तौर पर इस अवधि में 22.7 मिमी वर्षा होती है।
दिलचस्प बात यह रही कि ऐसा उस समय हुआ जब पश्चिमी हिमालय के ऊपर से सामान्य से अधिक पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) गुजरे। उत्तर भारत में ऐसे कुल नौ सिस्टम सक्रिय हुए, जो सामान्य तौर पर आने वाले पांच या छह सिस्टम से लगभग दोगुने थे।
हालांकि इनमें से अधिकांश मौसम प्रणालियां इतनी कमजोर थीं कि वे पर्याप्त वर्षा नहीं करा सकीं। केवल तीन सिस्टम ही ऐसे थे जिन्होंने कुछ जगहों पर बारिश या ओलावृष्टि कराई, और वह भी उत्तर-पश्चिम तथा मध्य भारत के मैदानी इलाकों में हल्की बारिश तक ही सीमित रही।
ला नीना से मिलने वाली अस्थायी ठंडक दीर्घकालिक गर्मी के रुझान को नहीं बदल सकती
वर्ष 2025 की शुरुआत और अंत दोनों ही ला नीना परिस्थितियों के साथ हुआ। इसके बावजूद यह वर्ष रिकॉर्ड पर दर्ज तीन सबसे गर्म वर्षों में से एक रहा, जिससे वैश्विक तापमान में लगातार हो रही असाधारण वृद्धि का सिलसिला जारी रहा।
दरअसल पिछले 11 वर्ष, इतिहास में दर्ज 11 सबसे गर्म वर्ष रहे हैं, और महासागरों का तापमान भी लगातार बढ़ता जा रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, ला नीना के कारण आने वाला ठंडा प्रभाव बहुत अल्पकालिक होता है। यह वातावरण में मौजूद ग्रीनहाउस गैसों की रिकॉर्ड मात्रा से पैदा हो रहे दीर्घकालिक तापमान वृद्धि के रुझान को पलट नहीं पाता।
स्काइमेट वेदर में मौसम और जलवायु परिवर्तन विभाग के अध्यक्ष जी. पी. शर्मा कहते हैं,
“ला नीना एक जलवायु पैटर्न है जिसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर की सतह का तापमान सामान्य से कम हो जाता है, जिससे वैश्विक तापमान कुछ हद तक दब जाता है। लेकिन बदलती जलवायु परिस्थितियां और वैश्विक तापमान में लगातार बढ़ोतरी इस पर बड़ा प्रभाव डाल रही हैं। ENSO की ये स्थितियां अस्थायी रूप से मौसम को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन वे जलवायु परिवर्तन के दीर्घकालिक प्रभावों को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकतीं। ऐसा प्रतीत होता है कि एल नीनो, ला नीना और इंडियन ओशन डाइपोल जैसी प्राकृतिक जलवायु घटनाएं भी अब मानवजनित जलवायु परिवर्तन से गंभीर रूप से प्रभावित हो रही हैं।”
स्काइमेट वेदर के उपाध्यक्ष महेश पलावत भी मानते हैं कि जलवायु परिवर्तन ने ला नीना के पारंपरिक प्रभावों को बदल दिया है।
उनके अनुसार,
“ला नीना आम तौर पर वैश्विक तापमान को नीचे लाता है, लेकिन हाल के वर्षों में वैश्विक तापमान में लगातार बढ़ोतरी ने इस ठंडक के प्रभाव को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया है। भले ही ला नीना के कारण समुद्र का तापमान कुछ कम हो, लेकिन जिस तेजी से वैश्विक गर्मी बढ़ रही है, उसके कारण हमें इस प्रभाव का स्पष्ट असर कम ही देखने को मिलता है।”
ला नीना क्या है
ला नीना वास्तव में एक महासागरीय-वायुमंडलीय घटना है, जिसे एल नीनो-सदर्न ऑसिलेशन (ENSO) का हिस्सा माना जाता है। इसमें भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के पानी का तापमान सामान्य से कम हो जाता है। यह स्थिति समुद्र की गहराई से ठंडे पानी के ऊपर आने (अपवेलिंग) के कारण बनती है।
ला नीना ट्रेड विंड्स की दिशा और गति को प्रभावित कर सकता है, जो भारत में सर्दियों के मौसम को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
उत्तर भारत में सर्दियों की बारिश के साथ भी ला नीना का संबंध माना जाता है। हालांकि एल नीनो की तुलना में इसका मौसमी प्रभाव हमेशा बहुत मजबूत नहीं होता, लेकिन फिर भी यह मौसमी परिस्थितियों को प्रभावित करने में अहम भूमिका निभाता है।
इस बीच हिंद महासागर का तेजी से गर्म होना भी वैश्विक समुद्री सतह तापमान (Sea Surface Temperature. SST) में बढ़ोतरी की बड़ी वजह बनकर उभर रहा है।
‘Future Projections for the Tropical Indian Ocean’ नामक एक अध्ययन के अनुसार, 1950 के बाद हिंद महासागर में कई ऐसे गर्म घटनाक्रम दर्ज किए गए हैं, जिनमें समुद्री सतह तापमान में असामान्यता 0.77 डिग्री सेल्सियस से अधिक रही। यह सीमा एल नीनो जैसी घटनाओं के बराबर मानी जाती है।
इन घटनाओं की दीर्घकालिक स्थिरता को देखते हुए वैज्ञानिक मानते हैं कि हिंद महासागर का गर्म होना और उससे जुड़ी जलवायु प्रक्रियाएं, भविष्य में जलवायु परिवर्तन और उसकी अनिश्चितताओं को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण संकेतक हैं।
1950 से 2020 के बीच हिंद महासागर का तापमान प्रति शताब्दी लगभग 1.2°C की दर से बढ़ा है। लेकिन जलवायु मॉडल संकेत देते हैं कि भविष्य में यह गर्मी और तेज़ी से बढ़ सकती है। अनुमान है कि 2000 से 2100 के बीच यह दर बढ़कर 1.7°C से 3.8°C प्रति शताब्दी तक पहुँच सकती है।
जैसे जैसे जलवायु परिवर्तन वैश्विक तापमान को तेज़ी से बढ़ा रहा है, वैसे वैसे ला नीना और एल नीनो जैसी प्राकृतिक जलवायु चक्रों की विश्वसनीयता भी प्रभावित हो रही है। इसका सीधा असर मौसमी मौसम पैटर्न पर पड़ रहा है, जो पहले की तुलना में कहीं अधिक अनिश्चित होते जा रहे हैं।
बढ़ता तापमान वायुमंडलीय परिसंचरण (atmospheric circulation) को बदल रहा है, पारंपरिक ठंडक देने वाले प्रभावों को कमजोर कर रहा है, और पूरे क्षेत्र में मौसम संबंधी परिस्थितियों को और अधिक गंभीर बना रहा है।
भारत के लिए इसका अर्थ साफ़ है।
अधिक बार और अधिक तीव्र हीटवेव, अनियमित और अस्थिर वर्षा, छोटी होती सर्दियां, और जलवायु चरम स्थितियों में बढ़ोतरी।
इन परिवर्तनों का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहता। यह स्वास्थ्य, कृषि, जल संसाधनों और आर्थिक उत्पादकता तक गहरा प्रभाव डालता है।
उभरता हुआ रुझान अब बिल्कुल स्पष्ट है।
जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का कोई दूर का खतरा नहीं रहा।
यह एक मौजूदा और लगातार तीव्र होता हुआ संकट है, जो भारत के मौसम चक्रों को नए सिरे से आकार दे रहा है और देश भर में विभिन्न सामाजिक और आर्थिक संवेदनशीलताओं को और गहरा बना रहा है।