बिजली का ब्लूप्रिंट 2035: हरित ऊर्जा का उभार, लेकिन कोयला अभी भी रीढ़

2035 तक भारत की बिजली ज्यादातर ग्रीन होगी, लेकिन कोयला बना रहेगा मुख्य स्रोत। जानिए बिजली मांग, स्टोरेज और ग्रिड की असली चुनौतियां

Update: 2026-03-23 05:24 GMT

Environment Renewable Energy

बिजली का ब्लूप्रिंट: 2035 तक ज़्यादातर ग्रीन, मगर कोयला रहेगा कायम

  • एक दशक में दोगुनी होती बिजली की मांग
  • 2035 की तस्वीर: ग्रीन ऊर्जा का वर्चस्व, मगर कोयले की पकड़ कायम
  • सोलर क्रांति: पावर सिस्टम की बदलती संरचना
  • चुनौती उत्पादन नहीं, वितरण और उपयोग की है
  • 37 GW रिन्यूएबल क्षमता क्यों पड़ी है बेकार
  • ऊर्जा भंडारण (Energy Storage): भविष्य का निर्णायक कारक
  • बदलता भूगोल: बिजली उत्पादन और खपत के बीच दूरी
  • ऊर्जा सुरक्षा बनाम जलवायु संकट: भारत की दोहरी चुनौती

आगे की राह: संतुलन, योजना और बुनियादी ढांचे की कसौटी

2035 में आपके घर की बिजली कहाँ से आएगी—कोयला, सूरज या बैटरी? भारत की नई ऊर्जा योजना एक साथ दो कहानियाँ बताती है: तेज़ हरित विस्तार और कायम कोयला निर्भरता...

नई दिल्ली, 23 मार्च 2023. आपने कभी सोचा है कि आपके घर की लाइट जलने के पीछे की कहानी 10 साल बाद कैसी दिखेगी? क्या वह कोयले से आएगी, या सूरज से, या शायद बैटरी में जमा किसी पिछली दोपहर की धूप से? इस मामले में भारत का जवाब अब धीरे-धीरे साफ़ होने लगा है.

सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने अपना नया National Generation Adequacy Plan (2026–2036) जारी किया है. यह प्लान सिर्फ़ एक तकनीकी रिपोर्ट भर नहीं है. यह आने वाले दशक की बिजली, अर्थव्यवस्था और जलवायु की दिशा का एक संपूर्ण खाका है. और इस खाके में एक साथ दो कहानियाँ चल रही हैं.

तेज़ी से बढ़ती हरित ऊर्जा. और उतनी ही तेज़ी से बढ़ती बिजली की भूख.

एक दशक में दोगुनी हो जाएगी बिजली की आवश्यकता

भारत में बिजली की मांग अब सिर्फ़ बढ़ नहीं रही है, बल्कि तेज़ी से भाग रही है.

2024-25 में जहाँ कुल बिजली उत्पादन लगभग 1,725 बिलियन यूनिट (BU) है, वहीं 2035-36 तक यह बढ़कर 3,450 BU तक पहुँचने का अनुमान है.

यानी सिर्फ़ 10 साल में लगभग दोगुनी. पीक डिमांड का ट्रेंड भी यही कहानी कहता है. 2020-21 में यह करीब 190 GW था जो अब 2024-25 में यह 250 GW तक पहुँच चुका है. और यह सिर्फ़ शुरुआत भर है.

इलेक्ट्रिक वाहन, डेटा सेंटर, और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, ये सब आने वाले समय में बिजली की मांग को और तेज़ करेंगे.

2035 की बिजली : ज़्यादातर “ग्रीन”, लेकिन पूरी नहीं

इस योजना के मुताबिक, 2035-36 तक भारत की कुल स्थापित क्षमता 1121 GW तक पहुँच सकती है.

इसमें से करीब 70 प्रतिशत, यानी 786 GW, गैर-जीवाश्म स्रोतों से आएगा.

यह एक बड़ा बदलाव समझा जा रहा है, लेकिन पूरी कहानी इससे थोड़ी अलग है, क्योंकि कोयला अभी भी खत्म नहीं हो जाएगा.

इस रिपोर्ट के अनुसार 2035-36 तक कोयले की क्षमता लगभग 315 GW रहेगी. और सप्लाई में इसका हिस्सा अब भी सबसे बड़ा रहेगा. करीब 51 प्रतिशत बिजली कोयले से ही आएगी, इसके मुकाबले सोलर होगा, जो सबसे तेज़ी से बढ़ रहा है. यह करीब 509 GW क्षमता तक पहुँचेगा, और कुल सप्लाई में लगभग 27 प्रतिशत योगदान देगा. यानी सिस्टम शनैः-शनैः ग्रीन तो हो रहा है, लेकिन कोयला अभी backbone बना रहेगा.

सोलर का उभार : बिजली की नई धड़कन

अगर इस रिपोर्ट में कोई एक सेक्टर सबसे ज़्यादा उभरकर सामने आता है, तो वह है सौर ऊर्जा सेक्टर.

2035 तक सौर ऊर्जा अकेले 45 प्रतिशत स्थापित क्षमता का हिस्सा बन सकती है. यह सिर्फ़ एक तकनीक का विस्तार भर नहीं है, बल्कि यह पॉवर सिस्टम की संरचना बदलने जैसा है. पहले बिजली “on demand” बनती थी. अब वह “on availability” बन रही है. जब सूरज है, तभी बिजली है. और यही बदलाव एक नई चुनौती भी लेकर आता है.

असली समस्या बिजली बनाना नहीं, पहुँचाना है

IEEFA की ऊर्जा विशेषज्ञ विभूति गर्ग इस रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू यही बताती हैं.

विभूति गर्ग के शब्दों में, “भारत ने रिन्यूएबल क्षमता बढ़ाने में शानदार प्रगति की है, लेकिन असली परीक्षा यह है कि इस बिजली का उपयोग कितनी प्रभावी तरह से हो रहा है.”

विभूति गर्ग एक चौंकाने वाला आंकड़ा भी बताती हैं. करीब 37 GW रिन्यूएबल क्षमता अभी भी stranded है. यानी बनी हुई है, लेकिन इस्तेमाल नहीं हो पा रही.

क्यों? इसका जवाब विभूति गर्ग देती हैं, क्योंकि ग्रिड तैयार नहीं है. ट्रांसमिशन लाइनें समय पर नहीं बनीं. और मांग और सप्लाई एक ही जगह पर नहीं हैं. यानी बिजली है, लेकिन वहाँ नहीं है जहाँ ज़रूरत है.

स्टोरेज : आने वाले समय का गेमचेंजर

इस समस्या का एक बड़ा हल है - energy storage.

रिपोर्ट के अनुसार 2035-36 तक भारत को लगभग 174 GW / 888 GWh स्टोरेज क्षमता की आवश्यकता होगी.

इसमें दो मुख्य हिस्से होंगे.

  • Battery Energy Storage Systems (BESS)
  • Pumped Storage Projects (PSP)

अभी भी कई प्रोजेक्ट्स निर्माण और योजना के चरण में हैं, लेकिन यह साफ़ है कि अगर स्टोरेज नहीं बढ़ा, तो रिन्यूएबल की पूरी क्षमता कभी इस्तेमाल नहीं हो पाएगी.

ग्रिड की नई चुनौती : बदल रहा है भूगोल

एक और बड़ा बदलाव बहुत खामोशी से हो रहा है. बिजली की मांग और सप्लाई अब अलग-अलग जगहों पर बन रही है. सौर और पवन ऊर्जा प्रोजेक्ट अक्सर दूरदराज़ इलाकों में लगते हैं, जबकि मांग शहरों, इंडस्ट्रियल क्लस्टर्स और डेटा सेंटर्स में होती है.

विभूति गर्ग कहती हैं, “जैसे-जैसे इलेक्ट्रिक वाहन और डेटा सेंटर बढ़ेंगे, यह असंतुलन और बढ़ेगा. इसलिए ट्रांसमिशन प्लानिंग को demand clusters के साथ align करना जरूरी है.”

यानी भविष्य का पॉवर सिस्टम सिर्फ़ उत्पादन का नहीं बल्कि कनेक्टिविटी का खेल है.

ऊर्जा सुरक्षा और क्लाइमेट : दोनों का संगम

इस पूरी योजना का एक बड़ा संदर्भ है- वैश्विक अस्थिरता. तेल और गैस की सप्लाई बार-बार भू-राजनीतिक तनाव से प्रभावित हो रही है. ऐसे में भारत के लिए नवीकरणीय ऊर्जा सिर्फ़ जलवायु या पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है. यह अब energy security का भी सवाल है.

विभूति गर्ग साफ़ कहती हैं, “तेज़ी से रिन्यूएबल इंटीग्रेशन अब सिर्फ़ जलवायु की जरूरत नहीं. यह आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की भी अनिवार्यता है.”

आगे की राह : संतुलन की चुनौती

इस पूरी रिपोर्ट को एक लाइन में समझना हो तो शायद यह कहा जा सकता है कि भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है. और ऊर्जा का स्वरूप भी बदल रहा है. सवाल अब यह नहीं है कि हम कितनी बिजली बना सकते हैं. सवाल यह है कि हम उसे कितनी समझदारी से इस्तेमाल कर सकते हैं. क्योंकि आने वाले दशक में बिजली सिर्फ़ विकास का साधन नहीं होगी. वह विकास की शर्त बन जाएगी.

डॉ. सीमा जावेद

पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ

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