राहुल गांधी का प्रतिरोध आह्वान: क्या भाजपा-आरएसएस के खिलाफ चुनाव पर्याप्त हैं?

  • फ़ासिज्म, लोकतंत्र और राहुल गांधी: प्रतिरोध की राजनीति पर प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी का विश्लेषण
  • क्या भारत में लोकतंत्र प्रतिरोध के बिना बच सकता है? राहुल गांधी के भाषण का राजनीतिक विश्लेषण
  • राहुल गांधी का नया राजनीतिक संदेश: चुनाव नहीं, प्रतिरोध होगा निर्णायक?
  • फ़ासिज्म के दौर में लोकतंत्र की लड़ाई: राहुल गांधी के प्रतिरोध मॉडल पर बहस





क्या केवल चुनाव लोकतंत्र बचा सकते हैं या व्यापक जनप्रतिरोध की आवश्यकता है? प्रो. जगदीश्वर चतुर्वेदी राहुल गांधी के हालिया प्रतिरोध आह्वान के बहाने फ़ासिज्म, लोकतंत्र, विपक्ष और भारत की राजनीतिक चुनौतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं...

  • राहुल गांधी के प्रतिरोध आह्वान का राजनीतिक महत्व
  • लोकतंत्र और फ़ासिज्म के बीच संघर्ष की नई चुनौती
  • भाजपा-आरएसएस और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नियंत्रण का प्रश्न
  • विपक्ष की राजनीति: चुनाव बनाम जनआंदोलन
  • लोकतंत्र में आत्मालोचना की आवश्यकता
  • क्या केवल चुनाव से सत्ता परिवर्तन संभव है?
  • प्रतिरोध की राजनीति और इंडिया गठबंधन की चुनौतियाँ

फ़ासिज्म और राहुल गांधी का प्रतिरोध आह्वान

प्रोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी

लोकतंत्र ने नेता और कार्यकर्ता को आरामतलब और यश आश्रित बनाया है। यह वह नेता है, जिसके आचरण और दल में लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों का अभाव है। वह जिस इलाके, मुहल्ले, गांव, जिले, राज्य में काम करता है, वहां उसे कभी लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रचार -प्रसार करते नहीं देखा गया। इस नेता के पास दल है, जाति है,शानदार गाड़ी है, शानदार ऑफिस है, नौकरशाहों से साठगांठ है। विभिन्न वैध-अवैध तरीकों से आमदनी का प्रवाह है। यह लोकतंत्र का नया औज़ार है। कहने को यह नेता जिस राजनीतिक दल में है, उस दल की लोकतंत्र के प्रति आस्थाएं हैं। पर, लोकतंत्र उसके आचरण से ग़ायब है। आचरण से लोकतंत्र ग़ायब करके और लोकतंत्र को सिर्फ कुर्सी और सरकार तक सीमित करके यदि देखेंगे तो लोकतंत्र पर बार-बार अलोकतांत्रिक ताकतों के हमले होंगे। दल-बदल होगा।

लोकतंत्र के पक्षधर नेताओं -दलों को गंभीरता से आत्मालोचना करनी चाहिए कि किस तरह लोकतंत्र बचाएं और लोकतंत्र का विस्तार करें ?

आरएसएस-भाजपा से लोकतंत्र बचाने और उसका विस्तार करने की उम्मीद करना बेकार है। उनका लोकतंत्र पर आरंभ से कोई विश्वास नहीं था, आज भी नहीं है।

भाजपा-आरएसएस लोकतंत्र बचाएंगे, यह मीडिया के द्वारा और उनके नेताओं के भाषणों के द्वारा पैदा किया गया भ्रम है। उनके लिए चुनाव एक औज़ार है जिसके माध्यम से वे लोकतांत्रिक संस्थाओं और संविधान के मूल लक्ष्यों पर हमले करते हैं। लोकतांत्रिक संस्थाओं और सिस्टम पर कब्जा करते हैं। अधिकांश विपक्षी दल इस सामान्य सच की अनदेखी करते रहे हैं। वे इस तथ्य की अनदेखी क्यों करते रहे हैं ? इस बात का उत्तर उन्हें खोजना चाहिए।

लोकतंत्र का अर्थ ‘हम जीतेंगे, तुम जीतोगे’ नहीं है। ‘हमारी जीत तुम्हारी जीत’,लोकतंत्र की जीत नहीं है। अब तक यही भ्रम काम करता रहा है। इसके अलावा दूसरा भ्रम है भारतीय समाज धर्मनिरपेक्ष है। शिक्षित जनता धर्मनिरपेक्ष है। इन दोनों भ्रमों से बाहर निकलकर देखने की ज़रूरत है। सत्ता की समीक्षा के साथ जनता की समीक्षा भी जरूरी है। जनता महान है,इस भ्रम से बाहर निकलकर देखा जाना चाहिए।

  • जनता कैसे फासिस्ट बनाई गई ?
  • मध्यवर्ग और बुद्धिजीवी वर्ग कैसे फासिज्म का अनुयायी बना ?
  • फासिज्म का गांवों तक कैसे प्रसार हुआ ?
  • आरएसएस के ख़िलाफ़ समझौताहीन वैचारिक संघर्ष क्यों नहीं चलाया गया ?
  • सन् 2014 के संसदीय चुनाव के समय फासिज्म का खतरा नज़र क्यों नहीं आया ?
  • क्या नव्य आर्थिक उदारीकरण ने सांप्रदायिक ताकतों के विकास में मदद की ?

इन प्रश्नों पर आलोचनात्मक ढंग से विचार करने की ज़रूरत है।

चुनावी हार जीत, चुनावी धांधली, मतदाता सूची में धांधली, न्यायपालिका और लोकतंत्र का बंध्याकरण तो सन् 2014 के बाद सामने आता है। भाजपा-आरएसएस की राजनीति को गंभीरता से जानने के बावजूद विपक्ष द्वारा तदर्थवादी नज़रिए से क्यों देखा गया ?

अनेक सीमाओं के बावजूद संसद में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के हाल ही में इंडिया गठबंधन की बैठक में एक महत्वपूर्ण भाषण दिया। इस भाषण में उठाए सवालों और प्रतिरोध के आह्वान पर गंभीरता से विचार करने की ज़रूरत है।

इस भाषण की पहली ख़ास बात यह है कि इसमें पहली बार काँग्रेस के किसी बड़े नेता ने स्वीकार किया है कि भाजपा-आरएसएस ने देश के सभी संस्थानों पर कब्जा कर लिया है। विभिन्न लोग समय-समय पर यह बात कहते रहे हैं। लेकिन काँग्रेस के किसी बड़े नेता ने विपक्षी गठबंधन की मीटिंग में यह बात पहली बार कही है। इसके क्या मायने हैं ? क्या विपक्ष में इस पहलू पर राष्ट्रीय एकता बन पाएगी ? क्या विपक्ष अपनी छोटी-छोटी शिकायतों और व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठकर विचार विमर्श करके जनांदोलन खड़ा कर पाएगा ?

राहुल गांधी ने कहा, ‘ अगर आप सोच रहे हैं कि सोशल मीडिया निष्पक्ष है और विपक्ष को सपोर्ट मिल रहा है, तो आप दूसरी दुनिया में जी रहे हैं। पूरा आर्किटेक्चर- मीडिया, सोशल मीडिया, कानूनी व्यवस्था, कानूनी व्यवस्था, नौकरशाही, खुफिया एजेंसिंयां-सब इस सरकार को सत्ता में बनाए रखने के लिए संरेखित हैं।’

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही कि ‘अब जो आने वाला है ,वह अनियंत्रित है।’

राहुल गांधी का मानना है ‘निकट भविष्य में वे कुछ औज़ार भी काम करना बंद कर देंगे, क्योंकि बीजेपी और आरएसएस भारतीय राज्य पर पकड़ और मज़बूत कर रहे हैं।’

उनका मानना है प्रतिरोध ‘एक भावना है’, ‘संगठन नहीं। यह सोचने का तरीका है। और चाहे हम पसंद करें या नहीं, हमें वहीं जाना होगा। माइंडसेट बदलना होगा। माइंडसेट अब यह होना चाहिए कि हम एक-दूसरे से नहीं लड़ेंगे। हम प्रेस को हम पर हमला करने का मौका नहीं देंगे। हम प्रतिरोध करेंगे।’

‘आप सोच रहे हैं कि चुनौती अगला चुनाव जीतने की है। अगला चुनाव जीत लिया गया है। कृपया समझिए, भारत की जनता में इतना गुस्सा है कि अगला चुनाव पहले ही खत्म हो चुका है। समस्या आरएसएस द्वारा भारतीय राज्य के औजारों पर कब्जा है। समस्या यह है कि आपको जीतने के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं मिलेगा। इसलिए हमें प्रतिरोध मोड़ में जाना होगा।’

राहुल गांधी ने कहा, ‘हमारे बीच झगड़े हैं, लेकिन अगर आप मुझसे कहें कि मैं केरल के मुख्यमंत्री को गले लगाऊँ, तो मैं नहीं कर सकता और नहीं करूँगा, क्योंकि मेरी उनसे राजनीतिक लड़ाई चल रही है।’

सवाल यह है प्रतिरोध आंदोलन में वाम को कैसे शामिल करें ? क्या वाम को बाहर रखकर व्यापक मोर्चा संभव है ?

भारत के राजनीतिक परिदृश्य का अत्यंत संक्षिप्त विश्लेषण करते हुए कहा, ‘मुझे अफसोस है कि इस समूह में कुछ भ्रम है। भ्रम यह है कि आप- SP,TMC,RJD - यह मानते हैं अब तक जो राजनीतिक औज़ार आप इस्तेमाल करते आए हैं, वे आगे भी काम करेंगे। दरअसल वे तभी काम करते थे जब देश का सिस्टम उन्हें निष्पक्ष मैदान उपलब्ध कराता था।वो मैदान अब नहीं बचा है।

बीजेपी देश के संस्थानों पर कब्जा कर चुकी है। कानूनी व्यवस्था को कंट्रोल करती है। बीजेपी नौकरशाही को कंट्रोल करती है। खुफिया एजेंसियों को कंट्रोल करती है। बीजेपी चुनाव आयोग को कंट्रोल करती है।’

राहुल गांधी का मानना है, ‘पिछले चुनाव में इस कमरे में मेरे अलावा किसी को यकीन नहीं था कि हम BJP को कभी हरा सकते हैं। अब इस कमरे में हर कोई यह विश्वास करना शुरू करे कि हम उन्हें हरा देंगे।इस विश्वास से शुरू कीजिए, और मैं गारंटी देता हूँ -राज्य दर राज्य, चुनाव दर चुनाव, चाहे वे धांधली करें या न करें, वे गिरेंगे।’

हकीकत यह है चुनाव से भाजपा नहीं हारेगी। वह प्रतिरोध से हारेगी। चुनाव तय हैं, और भाजपा की जीत भी तय है। जनांदोलन के बिना भाजपा हारेगी नहीं। प्रतिरोध का ब्लू प्रिंट कहां है ? क्या उस पर इंडिया गठबंधन में बातें होंगी ?

अभी इंडिया गठबंधन चुनावी मोड में है, चुनाव मोड से उसे कैसे निकालकर प्रतिरोध मोड में लाएं, यह बड़ी चुनौती है। अधिकांश विपक्षी दलों को संसदीय आरामतलबी ने घेर रखा है। आराम भाव से लोकतंत्र चलाने का जनप्रिय तरीका है चुनाव के जरिए लोकतंत्र चलाओ। चुनाव में भाग लो, पैसे खर्च करो। यश कमाओ, नेता का बिल्ला लगाओ, घर बैठो और आनंद करो, नेता के प्रविलेजों के लाभ उठाओ। इस मनोभाव में भाजपा-आरएसएस कभी हारेंगे नहीं। वे नियंत्रित लोकतंत्र के मॅाडल पर काम कर रहे हैं। इसके चलते कुछ नेता, विधायक-सांसद जीतेंगे, लेकिन सिस्टम पर भाजपा-आरएसएस का ही नियंत्रण रहेगा। आंदोलन की छूट होगी और दमन भी होगा, पर लोकतंत्र नहीं होगा। क्या चुनाव मोड का मोह छोड़कर संघर्ष के रास्ते पर विपक्ष जाएगा ? क्या चुनाव बहिष्कार करके दीर्घकालिक संघर्ष का कोई मॉडल अपनाएगा? भाजपा-आरएसएस को प्रतिरोध भावना मात्र से हराना संभव नहीं है। लोकतंत्र भावनाओं की चीज नहीं है। उसके लिए ठोस रूप से संगठन और नियमित आंदोलन जब तक नहीं चलेंगे तब तक लोकतंत्र की वापसी संभव नहीं है।