कनाडा के जंगलों में आग अब नहीं रही प्राकृतिक, जलवायु परिवर्तन ने बनाया दोगुना ज़्यादा संभावित

कनाडा में जंगल की आग क्यों बढ़ रही है? जलवायु परिवर्तन ने आग की भीषण परिस्थितियों को दोगुना संभावित बनाया

क्या कनाडा के जंगल की आग जलवायु परिवर्तन से जुड़ी है?

हाँ। World Weather Attribution (WWA) की नई स्टडी के अनुसार, मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने कनाडा के ओंटारियो और नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में 2026 की भीषण जंगल की आग से जुड़ी गर्म, शुष्क और आग के लिए अनुकूल मौसमीय परिस्थितियों की संभावना करीब दोगुना या उससे अधिक बढ़ा दी है।

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  • क्या कनाडा की जंगल की आग जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही है
  • कनाडा में जंगल की आग को जलवायु परिवर्तन ने कितना बढ़ाया
  • 2026 में कनाडा के जंगलों में इतनी भीषण आग क्यों लगी
  • कनाडा की जंगल की आग कितनी बार जलवायु परिवर्तन के कारण होती है
  • जलवायु परिवर्तन कनाडा की जंगल की आग को कैसे प्रभावित करता है
  • कनाडा में जंगल की आग की परिस्थितियां दोगुना अधिक संभावित क्यों हुईं
  • World Weather Attribution कनाडा जंगल की आग स्टडी 2026
  • WWA Canada wildfire climate change study 2026

नई दिल्ली, 11 अगस्त 2026. कनाडा में जंगलों की आग कोई नई बात नहीं है। हर साल गर्मियों में जंगल जलते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आग का आकार, उसकी रफ्तार और उसका असर इतना बढ़ गया है कि वैज्ञानिक अब इसे सामान्य प्राकृतिक घटना नहीं मान रहे।

World Weather Attribution (WWA) की नई स्टडी बताती है कि इस साल कनाडा के ओंटारियो और नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में फैली भीषण जंगल की आग के पीछे मौजूद मौसमीय परिस्थितियों को इंसानों की वजह से हुए जलवायु परिवर्तन ने करीब दोगुना अधिक संभावित बना दिया। यानी अगर पृथ्वी आज जितनी गर्म नहीं हुई होती, तो ऐसी परिस्थितियां बनने की संभावना काफी कम होती।

इस साल जुलाई की शुरुआत से कनाडा के कई हिस्सों में आग तेजी से फैलनी शुरू हुई। अब तक 38 लाख हेक्टेयर से अधिक जंगल जल चुके हैं। हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े, जबकि लाखों लोग जहरीले धुएं की चपेट में आए। कई इलाकों में आग इतनी तेजी से फैली कि उसे नियंत्रित करना बेहद मुश्किल हो गया।

WWA के वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि इन आगों के पीछे जलवायु परिवर्तन की कितनी भूमिका थी। इसके लिए उन्होंने Daily Severity Rating (DSR) नामक वैज्ञानिक पैमाने का इस्तेमाल किया, जो यह बताता है कि गर्मी, सूखे और मौसम की अन्य परिस्थितियों के कारण आग बुझाना कितना कठिन हो सकता है। वैज्ञानिकों ने मौजूदा मौसम की तुलना उस दुनिया से की, जहां जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल से पैदा हुआ अतिरिक्त वैश्विक तापमान मौजूद नहीं होता।

स्टडी के मुताबिक आज के गर्म होते मौसम में नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में इस तरह की भीषण आग की परिस्थितियां हर 2 से 6 साल में देखने को मिल सकती हैं, जबकि ओंटारियो में ऐसी स्थिति 6 से 15 साल में एक बार बनने की संभावना है। लेकिन जलवायु परिवर्तन से पहले ऐसी परिस्थितियां 40 साल से भी कम बार देखने को मिलती थीं। वैज्ञानिकों ने जब मौसम के वास्तविक आंकड़ों और जलवायु मॉडलों को एक साथ देखा, तो पाया कि मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इन परिस्थितियों की संभावना लगभग दो गुना या उससे अधिक बढ़ा दी है।

स्टडी यह भी बताती है कि कनाडा में आग का असर सिर्फ़ जंगलों तक सीमित नहीं रहता। आग से उठने वाला धुआं सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल जाता है। इस साल कनाडा के अलावा अमेरिका के मिडवेस्ट और उत्तर-पूर्वी हिस्सों में 12 करोड़ से अधिक लोग खराब वायु गुणवत्ता से प्रभावित हुए। जंगल की आग का धुआं सांस और हृदय संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ाता है, अस्पतालों पर दबाव बढ़ाता है और सामान्य जनजीवन को प्रभावित करता है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे ज्यादा असर दूर-दराज़ और स्वदेशी (Indigenous) समुदायों पर पड़ा है। कई समुदायों को बार-बार अपने घर छोड़ने पड़े हैं। लगातार होने वाली आग के कारण लोगों के लिए सामान्य जीवन में लौटना मुश्किल होता जा रहा है। सिर्फ़ घर ही नहीं, बल्कि पारंपरिक आजीविका, सांस्कृतिक गतिविधियां और मानसिक स्वास्थ्य भी गंभीर रूप से प्रभावित हो रहे हैं।

इम्पीरियल कॉलेज लंदन के डॉ. थियोडोर कीपिंग का कहना है कि 2023 के बाद से कनाडा में जंगल की आग का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। उनके अनुसार इस साल नॉर्थवेस्ट टेरिटरीज़ में आग की तीव्रता रिकॉर्ड स्तर के बराबर पहुंच गई, जबकि ओंटारियो में जला हुआ क्षेत्र पिछले रिकॉर्ड से लगभग दोगुना हो चुका है। उनका कहना है कि यह बदलाव जलवायु परिवर्तन का एक और स्पष्ट प्रमाण है और सिर्फ़ आग बुझाने की तैयारी अब पर्याप्त नहीं होगी।

स्टडी की सह-लेखक और जलवायु वैज्ञानिक डॉ. फ्रेडेरिके ओटो कहती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में फ्रांस, स्पेन, चिली, अर्जेंटीना और अब कनाडा, लगभग हर जगह एक जैसी तस्वीर दिखाई दे रही है। जलवायु परिवर्तन गर्म, शुष्क और ज्वलनशील परिस्थितियों को बढ़ा रहा है, जिससे जंगल की आग पहले की तुलना में अधिक बार, अधिक तीव्र और अधिक विनाशकारी हो रही है। उनके मुताबिक दशकों से विज्ञान यही चेतावनी देता आया है कि फॉसिल फ्यूल जलाने से ऐसी घटनाएं बढ़ेंगी, और अब वही वास्तविकता दुनिया के सामने दिखाई दे रही है।

रेड क्रॉस रेड क्रिसेंट क्लाइमेट सेंटर के रूप सिंह का कहना है कि एक साथ कई जगह आग लगने से अग्निशमन संसाधनों पर भारी दबाव पड़ रहा है। समुदायों को एक आग से उबरने का मौका भी नहीं मिलता कि दूसरी आपदा सामने आ जाती है।

WWA की विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि कनाडा के पिछले तीन जंगल-अग्नि सीजन असाधारण रूप से गंभीर रहे हैं। 2023 में भी संगठन ने पाया था कि क्यूबेक में भीषण आग की परिस्थितियों को जलवायु परिवर्तन ने सात गुना अधिक संभावित बना दिया था। तब से प्रकाशित कई वैज्ञानिक शोध भी यही संकेत देते हैं कि कनाडा में जंगल की आग का बढ़ता खतरा अब जलवायु परिवर्तन से गहराई से जुड़ चुका है।

यह अध्ययन भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संकेत देता है। हिमालयी राज्यों से लेकर मध्य भारत और पश्चिमी घाट तक, जंगल की आग की घटनाएं पिछले वर्षों में लगातार चिंता का विषय बनी हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ती गर्मी, लंबे सूखे और बदलते मौसम के पैटर्न दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में आग के जोखिम को बढ़ा रहे हैं। ऐसे में सिर्फ़ आग बुझाने की क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को धीमा करने, जंगलों को अधिक लचीला बनाने और शुरुआती चेतावनी प्रणालियों को मजबूत करने पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।