EV क्रांति का असर: 2025 में दुनिया ने ईरान के 70% निर्यात के बराबर तेल की बचत की

  • इलेक्ट्रिक वाहनों का बढ़ता प्रभाव: तेल खपत में ऐतिहासिक गिरावट
  • 1.7 मिलियन बैरल प्रतिदिन बचत: क्या कहते हैं आंकड़े
  • हॉर्मुज जलडमरूमध्य और वैश्विक ऊर्जा असुरक्षा का संदर्भ
  • आयात निर्भरता का संकट: एशिया पर सबसे ज्यादा असर
  • क्या घरेलू उत्पादन समाधान है? वैश्विक बाजार की वास्तविकता
  • EVs: ऊर्जा सुरक्षा का नया विकल्प और आर्थिक बचत
  • चीन, यूरोप और भारत: इलेक्ट्रिक वाहनों से हो रही बचत

क्या 2029 से पहले ही तेल की खपत अपने चरम पर पहुंच जाएगी?

दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ रही है और इसका असर अब तेल खपत पर साफ दिख रहा है। 2025 में EVs ने इतनी तेल बचत की जो ईरान के 70% निर्यात के बराबर है—यह वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में बड़े बदलाव का संकेत है।

दिखने लगा EVs का असर, 2025 में ईरान के 70% निर्यात के बराबर तेल की बचत.

नई दिल्ली, 19 मार्च 2026. दुनिया की सड़कों पर अब एक बड़ा बदलाव आ रहा है, जिसका असर तेल खपत के आंकड़ों में साफ दिखने लगा है। 2025 में वैश्विक स्तर पर इलेक्ट्रिक वाहनों ने मिलकर करीब 1.7 मिलियन बैरल प्रति दिन तेल की खपत टाल दी, जो लगभग ईरान के कुल तेल निर्यात के 70% के बराबर है।

यह आकलन ग्लोबल एनर्जी थिंक टैंक Ember ने जारी किया है, जो यह दिखाता है कि परिवहन क्षेत्र में धीरे-धीरे हो रहा विद्युतीकरण अब वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करने लगा है।

Ember की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान का लगभग 2.4 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल निर्यात मुख्य रूप से Strait of Hormuz के जरिए होता है, जो दुनिया के सबसे संवेदनशील ऊर्जा मार्गों में से एक है। यही वह क्षेत्र है जहां हाल के भू-राजनीतिक तनावों ने तेल बाजारों को अस्थिर किया है। ऐसे में यह तथ्य कि EVs अकेले इतनी बड़ी मात्रा में तेल की मांग को कम कर रहे हैं, ऊर्जा पर निर्भरता के बदलते समीकरण को दर्शाता है।

Ember के विश्लेषक Daan Walter के अनुसार, तेल अभी भी वैश्विक अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी बना हुआ है, और मौजूदा संकट ने खासकर एशियाई देशों की आयात निर्भरता को उजागर किया है।

एम्बर की यह ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि दुनिया की 79% आबादी ऐसे देशों में रहती है जो तेल आयात करते हैं, और तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की वृद्धि से वैश्विक आयात बिल में करीब 160 अरब डॉलर सालाना का इजाफा होता है।

इस निर्भरता का जोखिम खासतौर पर एशिया में ज्यादा है, जहां लगभग 40% आयातित तेल इसी हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर आता है। इसका मतलब है कि इस एक समुद्री रास्ते में किसी भी तरह की बाधा सीधे भारत, चीन और जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर सकती है।

रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल घरेलू तेल उत्पादन इस जोखिम से बचाव नहीं कर सकता, क्योंकि तेल की कीमतें वैश्विक स्तर पर तय होती हैं। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका के टेक्सास जैसे तेल उत्पादक क्षेत्र में भी हालिया संघर्ष के बाद पेट्रोल की कीमतों में 25% से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई।

इसी संदर्भ में इलेक्ट्रिक वाहन एक वैकल्पिक रास्ता प्रस्तुत करते हैं। इस विश्लेषण के अनुसार, यदि परिवहन क्षेत्र में आयातित तेल की जगह इलेक्ट्रिक विकल्पों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाए, तो वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन आयात (Fossil Fuel Imports) को एक-तिहाई तक कम किया जा सकता है, जिससे हर साल लगभग 600 अरब डॉलर की बचत संभव है।

इलेक्ट्रिक वाहन अपनाने की रफ्तार भी तेजी से बढ़ रही है। आज 39 देशों में इलेक्ट्रिक वाहनों की बिक्री हिस्सेदारी 10% से अधिक हो चुकी है, जबकि 2019 में यह संख्या केवल चार थी। चीन ने 2025 में पहली बार 50% का आंकड़ा पार किया, जबकि वियतनाम, थाईलैंड और इंडोनेशिया जैसे देश भी तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। भारत में इलेक्ट्रिक वाहन हिस्सेदारी अभी करीब 4% है, लेकिन वृद्धि की रफ्तार लगातार बढ़ रही है।

इस बदलाव का आर्थिक असर भी दिखने लगा है। मौजूदा इलेक्ट्रिक वाहन उपयोग के चलते चीन हर साल करीब 28 अरब डॉलर, यूरोप लगभग 8 अरब डॉलर और भारत करीब 0.6 अरब डॉलर के तेल आयात से बचत कर रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का अनुमान है कि वैश्विक तेल खपत 2029 तक अपने चरम पर पहुंच सकती है, लेकिन मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियां इस बदलाव को और तेज कर सकती हैं।

यह पूरी तस्वीर एक बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। ऊर्जा सुरक्षा अब केवल तेल आपूर्ति सुनिश्चित करने का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि देश कितनी तेजी से अपने परिवहन और ऊर्जा सिस्टम को विद्युतीकृत कर पाते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन इस बदलाव का एक अहम हिस्सा बन चुके हैं, और आने वाले वर्षों में उनका प्रभाव और स्पष्ट होता जाएगा।