मर्द होना आसान नहीं: पुरुषों के भावनात्मक अकेलेपन की अनसुनी कहानी

  • क्यों रो नहीं पाते मर्द? पुरुष मानसिक स्वास्थ्य पर एक जरूरी बातचीत
  • मर्दानगी का बोझ: जब एक आदमी इंसान नहीं, सिर्फ जिम्मेदारी बन जाता है
  • पुरुषों का दर्द क्यों दिखाई नहीं देता? मर्दानगी के दबाव की पड़ताल

क्या मर्द सिर्फ कमाने और संभालने के लिए हैं? पुरुष जीवन की अनकही सच्चाइयाँ

क्या पुरुष सचमुच मजबूत होते हैं, या उन्हें बचपन से मजबूत दिखने के लिए मजबूर किया जाता है? यह लेख मर्दानगी, भावनात्मक अकेलेपन, मानसिक स्वास्थ्य, जिम्मेदारियों और समाज की अपेक्षाओं के बीच फंसे पुरुषों की उस दुनिया को सामने लाता है, जिस पर बहुत कम बात होती है....

मर्द इंसान नहीं, भूमिका होते हैं।

मर्द होना आसान नहीं।

बस दिक्कत ये है कि मर्दों की मुश्किलें अक्सर “प्रिविलेज” के शोर में दब जाती हैं। समाज मर्द को ताकत की तरह देखता है, इंसान की तरह कम। उससे उम्मीद की जाती है कि वो कमाए, संभाले, लड़े, टिके रहे, टूटे नहीं। और अगर टूटे, तो चुपचाप टूटे।

लेकिन इस बातचीत को ईमानदारी से करने के लिए एक बात साथ-साथ समझनी होगी।

एक आदमी सुविधाओं वाला भी हो सकता है और भीतर से भावनात्मक रूप से खाली भी। ताकत और तकलीफ़ हमेशा एक-दूसरे के उलट नहीं होते। कई बार वही आदमी जो बाहर रौबदार दिखता है, भीतर अपनापन और नरमी के लिए तरस रहा होता है। एक पुरुष पितृसत्तात्मक व्यवस्था से कुछ फायदे ले सकता है, और उसी व्यवस्था से भीतर से टूट भी सकता है।

मर्द होने का सबसे बड़ा बोझ शायद यही है कि उसे बचपन से इंसान नहीं, “भूमिका” बनाया जाता है।

एक लड़का बहुत जल्दी सीख जाता है कि उसकी कीमत उसके होने में नहीं, उसके काम आने में है। जब तक वो ज़िम्मेदार है, कमाने वाला है, संभालने वाला है, तब तक उसकी जगह है। जिस दिन वो भावनात्मक सहारे की ज़रूरत वाला दिखा, उलझा हुआ दिखा, कमजोर दिखा, उसी दिन दुनिया का व्यवहार धीरे-धीरे बदलने लगता है।

ये बात बहुत कम कही जाती है कि लड़कों को भावनाओं की भाषा सिखाई ही नहीं जाती। उन्हें गुस्सा करने की छूट है। लेकिन डर नहीं। कमज़ोरी नहीं। रोना नहीं। असुरक्षा नहीं। अकेलापन नहीं।

इसलिए बहुत सारे मर्द भीतर से सुन्न होकर बड़े होते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि वो क्या महसूस कर रहे हैं। बस चिड़चिड़ापन, चुप्पी, काम में डूब जाना, ताने मारना, या हर समय व्यस्त रहना, इन्हीं रास्तों से भावनाएं बाहर आती रहती हैं। कई मर्दों की पूरी भावनात्मक भाषा बस इतनी होती है: “ठीक हूं” “कुछ नहीं” “थोड़ा तनाव है”। और समाज इसे उनकी असंवेदनशीलता समझ लेता है, जबकि कई बार वो भावनाओं को समझ न पाने की हालत होती है।

लेकिन ये सिर्फ “समाज” नहीं करता। पुरुषों की दुनिया खुद भी नरमी को सज़ा देती है।

स्कूलों में। छात्रावासों में। खेल के माहौल में। दोस्तों के बीच।

“मर्द बन।” “इतना भावुक क्यों है?” “रो क्यों रहा है?”

कई लड़के अपनी नर्मी और टूटन महिलाओं से नहीं, दूसरे पुरुषों से छुपाना सीखते हैं।

मर्दों की दुनिया अक्सर काबिलियत, दबदबे और बेइज़्ज़ती से बचने के डर पर चलती है। इसलिए बहुत से पुरुष भावनात्मक खुलापन को खतरे की तरह देखते हैं।

मर्द को प्यार भी अक्सर उसकी “काबिलियत” के बदले मिलता है।

अच्छी नौकरी हो। आत्मविश्वास हो। रुतबा हो। ज़िंदगी की दिशा साफ हो। फ़ैसले लेने की क्षमता हो।

बहुत कम पुरुषों ने बिना शर्त वाला भावनात्मक सुकून महसूस किया होता है। बहुत कम मर्दों ने किसी को ये कहते सुना होता है: “तुम असफल हो जाओ तब भी मैं तुम्हें इंसान की तरह देखूंगी।”

इसीलिए कई मर्द रिश्तों में प्यार कम, पनाह ज़्यादा खोजते हैं। वो ऐसी जगह ढूंढते हैं जहां कुछ देर के लिए अभिनय बंद हो सके।

एक असहज सच ये भी है कि बहुत सारे पुरुषों की अपनी कीमत का एहसास इस बात से जुड़ जाता है कि लोग उन्हें कितना चाह रहे हैं।

कितना ध्यान मिलता है। कितनी महिलाएं उनमें दिलचस्पी लेती हैं। वो खुद को कितना आकर्षक महसूस करते हैं।

इसलिए ठुकराया जाना कई पुरुषों को सिर्फ दिल टूटना नहीं लगता। वो उनकी पूरी पहचान हिल जाने जैसा लगता है। कई बार आदमी बिछड़ने से कम, किसी और से बदल दिए जाने से ज़्यादा टूटता है।

एक और अनदेखी चीज़ है। मर्दों का स्पर्श से वंचित रह जाना।

समाज महिलाओं के भावनात्मक अकेलेपन पर बात करता है, करनी भी चाहिए। लेकिन बहुत सारे पुरुष ऐसे हैं जिन्हें सालों तक स्नेह भरा स्पर्श नहीं मिलता। कोई बाल नहीं सहलाता। कोई माथा नहीं छूता। कोई बिना किसी उम्मीद के गले नहीं लगाता।

धीरे-धीरे शरीर भी भावनात्मक रेगिस्तान बन जाता है। फिर वही आदमी असहज हो जाता है। या सिर्फ शारीरिक चाहत में उलझ जाता है। या पूरी तरह कट जाता है।

और लोग सिर्फ उसका व्यवहार देखते हैं, उसकी कमी नहीं।

मर्दों की दोस्ती भी अक्सर अधूरी भावनात्मक जगह होती है।

दोस्त साथ हंसेंगे, शराब पिएंगे, मज़ाक भेजेंगे, लेकिन अवसाद, असफलता, अकेलापन, असुरक्षा, ठुकराए जाने का दर्द, इन सब पर शायद ही खुलकर बात करेंगे। क्योंकि हर आदमी दूसरे आदमी के सामने भी अपना “मजबूत रूप” बनाए रखने की कोशिश कर रहा होता है।

एक बहुत कड़वा सच ये भी है कि समाज मर्दों के दर्द को अक्सर शक की नज़र से देखता है।

अगर एक औरत कड़वी हो जाए, लोग उसके पीछे की चोट ढूंढते हैं। अगर एक मर्द कड़वा हो जाए, लोग उसे ज़हरीला कहकर आगे बढ़ जाते हैं।

लेकिन यहां एक और कठिन सच भी है।

हर घायल आदमी अच्छा आदमी नहीं बनता।

कई बार अनदेखा किया गया पुरुष दर्द नियंत्रण की भूख, गुस्से, नशे, भावनात्मक लापरवाही, धोखे या हिंसा में भी बदल जाता है। तकलीफ़ अपने आप इंसान को समझदार नहीं बनाती।

बहुत से भावनात्मक रूप से दूर रहने वाले पुरुष क्रूर नहीं होते। वो बस भावनाओं को जीना सीखे ही नहीं होते। उन्होंने अपने पिता को चुप देखा। दादाओं को कठोर देखा। उन्होंने जिम्मेदारी देखी, अभिव्यक्ति नहीं। तो कई पुरुष प्यार शब्दों से नहीं, जिम्मेदारियों से जताते हैं। बिजली का बिल भरना। रात में लेने आना। बीमार होने पर दवा लाना। चुपचाप त्याग करना। उनकी पीढ़ी में यही प्यार की भाषा थी।

फिर उम्र के साथ एक और परत जुड़ती है। ज़िम्मेदारी। परिवार। कमाई। माता-पिता। साथी। बच्चे। रुतबे की चिंता। तुलना। असफलता का डर।

मर्दों को अक्सर ये महसूस कराया जाता है कि उनका अस्तित्व उनकी कमाई और उपयोगिता से जुड़ा है। इसलिए कई पुरुष नौकरी छूटने, आर्थिक अस्थिरता, असफलता या ठुकराए जाने के बाद पहचान के संकट में चले जाते हैं। क्योंकि उन्होंने खुद को इंसान की तरह नहीं, एक काम की चीज़ की तरह जिया होता है।

...और ये दबाव हर पुरुष के लिए एक जैसा नहीं होता।

एक गरीब आदमी का मर्दानगी का बोझ ज़िंदा रहने से जुड़ा होता है। एक मध्यमवर्गीय आदमी का स्थिरता और रुतबे से। एक अमीर आदमी का उपलब्धियों और छवि से।

जाति, वर्ग, परवरिश, शहर, गांव, सब मर्दानगी को आकार देते हैं।

और फिर एक उम्र के बाद बहुत से पुरुष भावनात्मक अदृश्यता का शिकार हो जाते हैं।

उनका अकेलापन बातचीत का हिस्सा नहीं रहता। उनकी थकान सामान्य मान ली जाती है। उनके चाहे जाने का एहसास महत्वहीन हो जाता है।

वो बस चलते रहने वाली मशीनें बन जाते हैं।

और फिर भी, पूरी कहानी सिर्फ अत्याचार की नहीं है।

कई पुरुष जिम्मेदारी में सच्चा अर्थ भी खोजते हैं।

कमाना। सुरक्षा देना। काम आना। अपने परिवार के लिए खड़े रहना।

ये सिर्फ थोपा गया बोझ नहीं, बहुत से पुरुषों की पहचान, गरिमा और जीवन का उद्देश्य भी है।

समस्या ताकत में नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब ताकत का मतलब भावनाओं को दबा देना बना दिया जाता है।

और ये सब कहने का मतलब ये नहीं कि औरतों की तकलीफें कम हैं। बिल्कुल नहीं।

बस दिक्कत ये है कि स्त्री-पुरुष की बातचीत अब अक्सर मुकाबला बन गई है। कौन ज़्यादा दुख झेल रहा है।

जबकि सच ये है कि दोनों अलग-अलग तरह की मानसिक कैद में फंसे हुए हैं।

और शायद समझदार समाज वो होगा जहां एक लड़के को बचपन से ये सिखाया जाए कि मजबूत होने का मतलब भीतर से पत्थर हो जाना नहीं होता। कि भावुक होना कोई कमी नहीं। कि मदद मांगना कमजोरी नहीं। और कि कमाने वाले बनने से पहले इंसान होना ज़रूरी है। क्योंकि कई मर्द बाहर से मजबूत दिखते हैं, लेकिन भीतर सालों से बस किसी तरह जी रहे होते हैं। और कई बार उनकी पूरी जिंदगी बस इसी कोशिश में निकल जाती है कि कोई एक जगह तो मिले, जहां उन्हें हर वक्त खुद को साबित न करना पड़े।

निशान्त

सोशल कमेंटेटर