1996 से आज तक भारतीय वामपंथ का संकट: ज्योति बसु, सीपीएम नेतृत्व और वाम एकता | अरुण माहेश्वरी
भारतीय वामपंथ के संकट में 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव को सीपीआई(एम) केंद्रीय कमेटी द्वारा ठुकराए जाने और 2008 में UPA सरकार से समर्थन वापसी जैसे निर्णायक मोड़ों की कड़ी समीक्षा

arun maheshwari
1996 का ज्योति बसु प्रकरण, 2008 का UPA समर्थन वापसी और भारतीय वामपंथ की राजनीतिक दिशा
सुप्रसिद्ध चिंतक अरुण माहेश्वरी भारतीय वामपंथ के संकट में 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव को सीपीआई(एम) केंद्रीय कमेटी द्वारा ठुकराए जाने और 2008 में UPA सरकार से समर्थन वापसी जैसे निर्णायक मोड़ों की कड़ी समीक्षा करते हैं। लेख वाम एकता, जनवाद, फासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे और संसद तथा संसद के बाहर संघर्ष की रणनीति पर विचार करता है...
1996 में, जब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने के प्रस्ताव (proposal to make Jyoti Basu Prime Minister) को सीपीआई(एम) की केंद्रीय कमेटी (Central Committee of CPI (M)) ने ठुकरा दिया था, तब से लेकर आज तक सीपीएम के नेतृत्व ने पार्टी को और पूरे वामपंथ को राजसत्ता के लिए संघर्ष से अलग कर दिया है।
इसी नेतृत्व के 2008 में यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेने के निर्णय ने 2011 में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार (Left Front Government in West Bengal) के पतन की ज़मीन तैयार की।
1996 और 2008 भारतीय वामपंथ के इतिहास (History of Indian Left) में सर्वनाश के ऐसे बिंदु रहे हैं, जिनकी समीक्षा से मिलने वाली शिक्षा इसीलिये किसी काम की नहीं है क्योंकि वैसे मौक़े फिर कभी आने वाले नहीं है।
इन फ़ैसलों के लिये ज़िम्मेदार नेतृत्व किसी भी राजनीतिक दल के लिये सिवाय नुक़सान के और कुछ साबित नहीं हो सकता है। यह नेतृत्व वामपंथ के वर्तमान संकट की व्याख्या (Explanation of the current crisis of the Left) भी नहीं कर सकता है।
हम विशेष तौर पर अभी कम्युनिस्ट आंदोलन के इतिहास (History of the Communist Movement) के इन दो नुक़्तों को ही रेखांकित कर रहे हैं क्योंकि जब आपका सत्य ही दाव पर लग जाता हो, यही सवाल उठ जाता हो कि राजसत्ता के विषय में आप गंभीर है या नहीं, तब पूरे आंदोलन के घटनाचक्र की पुनरुक्ति के आधार पर विफलता की कोई सैद्धांतिकी हासिल नहीं की जा सकती है।
कहा जाता है कि कोई भी दुनिया क्यों न हो, उसका अपना स्वरूप कुछ खास बिंदुओं से ही तय होता है। इसी तर्क पर यह सच है कि पार्टियों की कठिनाइयों का कोई सार्वदेशिक रूप नहीं होता है, जैसे पार्टी के शत्रु के प्रचार का भी एक सार्वदेशिक रूप नहीं होता है। कम्युनिज्म की पूरी लड़ाई ही काल्पनिक है, हमला यहाँ से भी शुरू होती है।
पार्टी की कठिनाइयाँ को उन्हीं नुक़्तों पर पकड़ा जा सकता है, जिनमें वे किसी महत्वपूर्ण घड़ी में सबसे प्रकट रूप में सामने आती है। इसीलिए किन्हीं ख़ास बिंदुओं पर बल देना मूल विषय को किसी समग्रता के बोझ तले दबाने से बचना भी है।
भूलों की समीक्षाओं से शिक्षा ली जा सकती है। लेकिन इन भूलों की समीक्षा बेकार हैं। इसीलिए हमने इन्हें सर्वनाश करने वाली भूलें कहा है। सीपीआई(एम) का नेतृत्व भी इन्हें कभी छूने की भी हिम्मत नहीं करता है, क्योंकि ऐसी भूलों के बाद किसी के पास नेतृत्व में रहने का हक़ नहीं रह जाता है।
राजनीति में व्यक्ति की सीमित भूमिका से अच्छी तरह से परिचित होने पर भी जब मित्र वाम के आगे के रास्ते पर सवाल करते हैं तो हमारी राय में पुनरुद्धार के पहले बड़े क़दम के तौर पर सारे वामपंथी दलों को एक होने की दिशा में बढ़ना चाहिए। वामपंथ के आत्म-विश्वास का भव्य प्रदर्शन हो। मेहनतकश जनता की शक्ति की कामनाओं का एक मूर्त मायावी रूप।
इसके अंदर का जादू तभी बोलेगा जब यह एकता जनता के जनवाद के लक्ष्य के लिये संसद और संसद के बाहर, दोनों स्तरों पर संघर्ष की साफ़ समझ पर टिकी हो। इसके साथ फासीवाद के खिलाफ सभी जनतांत्रिक और धर्म निरपेक्ष ताक़तों की संयुक्त विशाल शक्ति भी प्रकट रूप से जुड़ी हो। वाम की शक्ति का व्यापक स्वरूप इसी संयुक्त मोर्चा की कारगर कार्यनीति से संभव है।
इस व्यापक मोर्चा के नेतृत्व के बारे में किसी की कोई शर्त नहीं होनी चाहिए। इस समुच्चय में हर किसी का स्थान उसके ऐतिहासिक स्वरूप से तय होगा। सभी जनतांत्रिक ताक़तों के संयुक्त मोर्चे के बीच से ही जनता के जनवाद की लड़ाई का भी नेतृत्व तैयार होना चाहिए।
सभी ताक़तों के बीच एक मामले में बिल्कुल स्पष्टता और दृढ़ता होनी चाहिए कि भाजपा को लाभ हो, वैसा मामूली क़दम भी कोई नहीं उठाया जाएगा। आज के समय में किसी भी कार्यनीति का यह एक बुनियादी संदर्भ बिंदु होना चाहिए। इसी से इस मोर्चे की प्रासंगिकता तय होगी।
इस मामले में वामपंथी दलों की समन्वित शक्ति पहल के साथ अगर सामने आती है तो भारतीय वाम के अपने गौरवमय अतीत को देखते हुए उसकी ज़बर्दस्त वापसी को कोई रोक नहीं सकता है। इस दिशा में वामपंथी दलों को ही रास्ता बनाना होगा।
-अरुण माहेश्वरी
FAQs
1. 1996 में ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव वामपंथ के लिए क्यों महत्वपूर्ण था?
1996 में संयुक्त मोर्चा सरकार के गठन के दौरान ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव भारतीय वामपंथ की राष्ट्रीय सत्ता में निर्णायक भूमिका की संभावना से जुड़ा था। सीपीआई(एम) केंद्रीय कमेटी द्वारा प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने को लेख भारतीय वामपंथ के इतिहास का एक निर्णायक मोड़ मानता है।
2. ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव किसने ठुकराया था?
प्रस्ताव को सीपीआई(एम) की केंद्रीय कमेटी ने स्वीकार नहीं किया था। पार्टी के तत्कालीन नेतृत्व ने ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनने की अनुमति नहीं दी।
3. ज्योति बसु ने प्रधानमंत्री बनने से इनकार क्यों किया था?
ज्योति बसु स्वयं प्रधानमंत्री बनने के पक्ष में थे, लेकिन अंतिम निर्णय पार्टी की केंद्रीय कमेटी का था। केंद्रीय कमेटी ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
4. 1996 का फैसला भारतीय वामपंथ के लिए क्यों महत्वपूर्ण माना जाता है?
लेख के अनुसार, यह फैसला इस प्रश्न से जुड़ा था कि भारतीय वामपंथ राष्ट्रीय राजसत्ता के लिए संघर्ष को किस गंभीरता से देखता है। इसी कारण इसे भारतीय वामपंथ के इतिहास के निर्णायक बिंदुओं में रखा गया है।
5. 2008 में सीपीआई(एम) ने UPA सरकार से समर्थन क्यों वापस लिया था?
2008 में भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के मुद्दे पर सीपीआई(एम) और उसके वाम सहयोगियों ने UPA सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। लेख इस निर्णय को बाद में पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा सरकार के राजनीतिक पतन से जोड़कर देखता है।
6. 2008 में UPA से समर्थन वापसी का पश्चिम बंगाल पर क्या प्रभाव पड़ा?
लेख के अनुसार, 2008 में UPA से समर्थन वापस लेने के निर्णय ने ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां बनाने में योगदान दिया, जिनकी पृष्ठभूमि में 2011 में पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार का पतन हुआ।
7. भारतीय वामपंथ के वर्तमान संकट की व्याख्या कैसे की जा सकती है?
लेख का तर्क है कि वामपंथ के संकट को केवल घटनाओं की सामान्य पुनरावृत्ति या गलतियों की सूची से नहीं समझा जा सकता। इसके लिए उन निर्णायक राजनीतिक बिंदुओं की पहचान जरूरी है, जहां पार्टी की रणनीतिक और वैचारिक दिशा सबसे स्पष्ट रूप से सामने आई।
8. भारतीय वामपंथ के पुनरुद्धार के लिए क्या रास्ता सुझाया गया है?
लेख सभी वामपंथी दलों को एकता की दिशा में आगे बढ़ाने को पुनरुद्धार का पहला बड़ा कदम मानता है। इसके साथ संसद और संसद के बाहर जनतांत्रिक संघर्ष की स्पष्ट राजनीतिक समझ पर जोर दिया गया है।
9. वामपंथी एकता और व्यापक जनतांत्रिक मोर्चे में क्या संबंध है?
लेख के अनुसार, वामपंथी एकता को व्यापक जनतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष शक्तियों के संयुक्त मोर्चे से जोड़ना चाहिए। इसका उद्देश्य जनवाद की रक्षा और फासीवाद के खिलाफ व्यापक राजनीतिक शक्ति का निर्माण है।
10. लेख में संसद और संसद के बाहर संघर्ष को क्यों महत्वपूर्ण माना गया है?
लेख के अनुसार, जनता के जनवाद का संघर्ष केवल संसदीय राजनीति तक सीमित नहीं होना चाहिए। वामपंथ को संसद के भीतर राजनीतिक हस्तक्षेप और संसद के बाहर जनसंघर्ष—दोनों को एक समन्वित रणनीति के रूप में देखना चाहिए।
11. भाजपा के संदर्भ में लेख की मुख्य रणनीतिक बात क्या है?
लेख का स्पष्ट आग्रह है कि ऐसी कोई राजनीतिक कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिससे भाजपा को लाभ मिले। इसे वर्तमान समय में व्यापक विपक्षी और जनतांत्रिक राजनीतिक रणनीति का एक बुनियादी संदर्भ-बिंदु माना गया है।
12. भारतीय वामपंथ के लिए संयुक्त मोर्चा क्यों जरूरी है?
लेख के अनुसार, वामपंथ की शक्ति को व्यापक रूप तभी मिल सकता है जब वह लोकतांत्रिक, धर्मनिरपेक्ष और फासीवाद-विरोधी शक्तियों के साथ प्रभावी संयुक्त मोर्चा बनाए। इससे वामपंथ का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव दोनों व्यापक हो सकते हैं।
13. क्या लेख केवल सीपीआई(एम) के संकट की चर्चा करता है?
नहीं। लेख सीपीआई(एम) के कुछ निर्णायक फैसलों को भारतीय वामपंथ और कम्युनिस्ट आंदोलन के व्यापक संकट को समझने के उदाहरण के रूप में देखता है और समाधान के रूप में समूचे वामपंथी राजनीतिक परिदृश्य में एकता की आवश्यकता पर जोर देता है।
14. भारतीय वामपंथ की वापसी के लिए नेतृत्व की भूमिका क्या होनी चाहिए?
लेख के अनुसार, व्यापक जनतांत्रिक मोर्चे में नेतृत्व किसी पूर्व निर्धारित शर्त पर तय नहीं होना चाहिए। विभिन्न राजनीतिक शक्तियों का स्थान उनके ऐतिहासिक और वास्तविक राजनीतिक स्वरूप से तय होना चाहिए।
15. लेख का केंद्रीय संदेश क्या है?
लेख का केंद्रीय संदेश है कि भारतीय वामपंथ के पुनरुद्धार के लिए अतीत के निर्णायक राजनीतिक फैसलों की गंभीर समीक्षा, वामपंथी दलों की एकता, जनतांत्रिक संघर्ष और व्यापक फासीवाद-विरोधी संयुक्त मोर्चे की जरूरत है।


