'वह दिन आएगा ज़रूर’: अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था के भीतर की सच्चाइयों को उजागर करता प्रवासी जीवन का मार्मिक उपन्यास
इला प्रसाद के उपन्यास ‘वह दिन आएगा ज़रूर’ पर अनिल पुष्कर की समीक्षा। यह कृति अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था, प्रवासी भारतीयों के संघर्ष और स्कूल सिस्टम की जटिलताओं को गहराई से सामने लाती है।

vah din aaega zaroor book review
‘वह दिन आएगा जरूर’ प्यासे का नखलिस्तान जैसा है
- वह दिन आएगा ज़रूर’ की समीक्षा: प्रवासी भारतीय शिक्षक के संघर्ष और अमेरिकी स्कूल सिस्टम की परतें
- अमेरिकी स्कूल व्यवस्था का सच: इला प्रसाद के उपन्यास ‘वह दिन आएगा ज़रूर’ पर विस्तृत समीक्षा
सपनों, संघर्ष और प्रवासी जीवन की कहानी: ‘वह दिन आएगा ज़रूर’ का साहित्यिक मूल्यांकन
समीक्षा - अनिल पुष्कर, इलाहाबाद (कवि, उपन्यासकार, आलोचक)
इस उपन्यास की बुनियाद एक ऐसे विषय को लेकर रखी गई है जो अमूमन भारत में रहने वाली पढ़ी लिखी आबादी है, वह यही मानती है कि भारत या इंडिया का जो एडुकेशन सिस्टम है, उसमें नामालूम क्यों इतनी खामियाँ हैं जिसका सुधार होना लगभग नामुमकिन है मगर वहीं दूसरी ओर ठीक इन्हीं लोगों के जेहन में यह खयाल भी बना हुआ है कि अमेरिकन एडुकेशन सिस्टम, करिकुलम और टेक्स्ट टीचिंग स्टाइल और मेथड, एग्जामिनेशन और एग्जामिनर स्टैंर्ड्स ये सारे इतने उम्दा और बेहतरीन है जिसका मुकाबला पूरी दुनिया में कहीं नहीं है। यही वजह है कि भारत से जाने वाल युवा पीढ़ी के छात्र अमेरिकन स्कूलिंग सिस्टम का हिस्सा बनना चाहते हैं ताकि वहाँ की पढ़ाई के ढंग को सीख सके और वहाँ की तनख्वाह का लुफ्त ले सके।
अब जहाँ तक सवाल है कि ‘वह दिन आएगा जरूर’ उपन्यास का तो यह मुगालता यहाँ टूटता हुआ और अपने सच्चे इरादों को सामने रखता हुआ दिखाई देता है - परत दर परत और रोज-ब-रोज की जिंदगी जीते हुए भारत से गयी जो पढ़ी लिखी युवा पीढ़ी है इस उपन्यास में उन्हीं की किस्सागोई तनुजा जैसे किरदार के बहाने की गयी है। तनुजा जो कि अपने पति अर्चित और बेटे कौस्तुभ संग अमेरिका में रह रही है। अर्चित एक केमिकल कम्पनी में काम करता है और तनुजा इसी अमेरिकन सोसाइटी का वह हिस्सा होना चाहती है, जो पूरी तरह से टीचिंग के पेशे से जुड़ा हुआ है। वो वहाँ के कल्चर, स्टाइल, डेली रूटीन को अपना लेना चाहती है मगर उसे क्या मालूम था असली परेशानी यहीं से शुरू होती है क्योंकि भारत के टीचिंग मेथड्स का जो स्पाइन है वो अमेरिकन पेडागोगी और प्रोफेशनल रेस्पॉन्सिबिलर्ट से बिल्कुल अलग है। यहाँ टीचर्स के होने के मायने बिल्कुल अलग लेवल के हैं, जिसमें स्टेट लेबल की परीक्षा शामिल है और उस परीक्षा को करवाने के लिए वहाँ पर कुछ नामी गिरामी प्राइवेट संस्थाएं हैं, जिनका ताल्लुक और सरोकार अमेरिका की बड़ी-बड़ी निजी और शुद्ध व्यावसायिक मुनाफा साधे उन कम्पनियों के माफिक स्कूली संस्थानों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। वह टीचर्स रिप्लेसमेंट, टीचर्स अप्पोइन्टमेन्ट और टीचर्स सब्स्टीट्यूट के सर्टिफिकेट तैयार करके संस्थानों को भेजते हैं।
तनुजा भारत से गयी है एक सब्स्टीट्यूट टीचर के तौर पर। जिसके लिए कोई विशेष योग्यता की जरूरत फिलहाल नहीं, क्योंकि कम्पनी जो टीचिंग अप्पोइन्टमेन्ट और सर्टिफिकेट देने के लिए एक मोटी रकम लेती है उसकी जिम्मेदारी है कि वह अलग अलग राज्य के स्कूलों में टीचरों का तबादला और नियुक्ति करा सके, जैसा कि अब भारत में देखने को मिल रहा है। HR कल्चर। टीचर्स की नियुक्तियों के लिए प्राइवेट संस्थानों का दख़ल। जिसके कारण एक ही लेबल के टीचर्स की सैलरी अलग अलग लोगों को उनके रिसोर्सेज़ और जान पहचान या ऊँचे पदों पर आसीन पदाधिकारियों से तय होती है।
तनुजा जिस स्कूल में है, वहाँ भी पढ़ाने से ज्यादा क्लेरिकल काम है उसके हिस्से में और यही टीचर्स की मुख्य जिम्मेदारी भी है। मसलन वर्क्स शीट बांटना, क्लास का निरीक्षण करना, स्टूडेंट्स की हाजिरी लेना और जो टीचर्स आज एब्सेंट हैं उसकी जगह पर स्टूडेंट्स को बाहर आने जाने की इजाज़त देना। और इसके बाद हालत ये है कि एक सब्स्टीट्यूट टीचर को किसी भी क्लास में कभी भी बुलाया जा सकता है। तनुजा के साथ भी ऐसे ही हालात हैं। हर रोज उसके पास नई-नई चुनौतियाँ और नई-नई क्लासेज मसलन हिस्ट्री, फ्रेंच, मैथ, साइंस कुछ भी पढ़ाने की रेस्पॉन्सिबिलिटी है। अमेरिकन स्कूल की खासियत ये है कि वहाँ टीचर्स की संख्या अमूमन एक स्कूल में कम से कम 70 - 80 है। मगर वहीं दूसरी तरफ एक चौथाई टीचर्स की गैरहाजिरी एक गम्भीर मसला है जिसके कारण एक अन्यथा दबाव नए अपोइंटेड टीचर्स पर बना रहता है। इसी परेशानी से गुजरने हुए तनुजा ने तय किया कि अगर सब्स्टीट्यूट टीचर ही बनना है तो अपने सब्जेक्ट का क्यों नहीं। इसीलिए उसने क्लीनिकल टीचिंग को चुना जिसके कारण वह अपना घर संभालते हुए एक परमानेंट टीचर के बतौर काम कर रही है। इस उपन्यास के भीतर एक और दिलचस्प बात यह है कि डिस्ट्रिक्ट स्कूलों के बिल्डिंग और एकेडमी में होने वाली कारगुजारियों को बाकायदा ब्योरेवार बेहतरीन तरीके से रखा गया है। जैसे तनुजा का 253 नम्बर कमरा, एक क्लास रूम और कमरे की दीवारों का डिस्क्रिप्शन, दाएं बाएं लगे हुए पोस्टर बैनर की खासियतें, बातें आदि-आदि।
उपन्यास के शुरुआत में ही शीर्षक इस बात को जाहिर करता है कि एक सवाल पढ़ते ही मन में उठेगा कि ‘वह दिन’ माने कौन सा दिन। किस दिन के आने की ख्यालबाजी में इस पूरे नॉवेल को रचा गया है। यहाँ मुलाकात होती है कुछ दिलचस्प किरदारों से। मसलन किंग्समिथ साइन्स स्पेशलिस्ट टीचर, डोना डोनाल्डसन स्पेनिश टीचर, कार्लो, भौतिक टीचर, जेफ़ स्पेन से विभागाध्यक्ष और इसके साथ ही साथ कुछ दिलचस्प किस्से इन सबके बीच लगातार चलते हैं जैसे नए टीचर्स को किस तरह के कायदे और तौर तरीकों का पालन करना होगा और शुरुआती दौर से ही हर नए पुराने टीचर्स के साथ मुलाकात का लंबा सिलसिला जिससे तनुजा सुनते सीखते भूलते याद रखते एक प्रोफेशनल दुनिया में दाखिल होती है। उसने एक वर्कशॉप में हिस्सा लिया जहाँ उसे भरोसा दिलाया गया की पक्की नौकरी के लिए किस किस हद से गुजरना होगा। इस बहाने से लेखिका इला प्रसाद ने अमेरिकन सोसायटी के स्कूलिंग सिस्टम के बारे में पुख्ता और तफसीलवार जानकारी दर्ज की है कि नए टीचर की बहाली के तौर-तरीके और प्राइमरी स्कूल में बिना दाखिल हुए इंटरमीडिएट की क्लासेज लेने के लिए कितनी तरह की दिक्कतों भरी तकनीकी और प्रोफेशनल आजमाइश से होकर गुजरना होता है।
इला जी के बहाने से ये भी पता लगा कि अमेरिकन स्कूलों का रवैया कैसा है। जैसे यहाँ नए टीचर्स की बहाली वर्कशॉप शुरू होने वाले दिन तक चलती रहती है और अगले दो महीनों तक टीचर जॉब फेयर में लगातार बहाली होने की गुंजाइश से भरे सभी टीचर्स भागदौड़ में लगे रहते हैं। एक सबसे बड़ा सवाल यह है इस पूरे अमेरिकन सिस्टम में कि कौन सा टीचर कितने दिन एक स्कूल में टिकेगा और अपनी नौकरी बचाये रखने के लिए किन-किन चैलेंगेस को पार करेगा, कौन सा टीचर छोड़कर चला जायेगा। जैसा कि तनुजा ने भी एक ही डिस्ट्रिक्ट के 25 स्कूलों में अप्लाई किया मगर एक भी इंटरव्यू की कॉल नहीं आई जहाँ उसे बुलाया भी गया वहाँ बतौर टीचर उसका सेलेक्शन भी नहीं हुआ। इसी स्ट्रगल के दौरान उसे मालूम हुआ कि उसे PPR के प्रशिक्षण से क्या हासिल हो सकता है क्योंकि यहाँ सम्पर्क मायने रखता है योग्यता नहीं। क्योंकि सर्टिफिकेट पाए हुए टीचर्स की तादाद बहुत लंबी है और उस फेहरिस्त में तनुजा कैसे टिकेगी? इसी बात की लड़ाई अमेरिकन टीचिंग सिस्टम में लगातार बनी हुई है। तनुजा किस पर भरोसा करे, किसका नाम लेकर आगे बढ़े? ये सब उसे ही तय करना है। क्योंकि सब्स्टीट्यूट टीचर्स ही क्लीनिकल टीचर का रोल निभाती है। यहाँ गोरे काले जैसे भेदभाव वाले मानसिकता के चयनकर्ता भी हैं। उसने देखा कि दो सौ नए शिक्षकों का आना इस साल डिस्ट्रिक्ट में हुआ है।
यहाँ तरह तरह के एक्सपेरिमेंट हैं। पश्चिमी नाच गानों के तौर तरीकों से तनुजा बिलकुल वाकिफ नहीं है इसलिए डिस्ट्रिक्ट डिरेक्टर सौन्द्रा विलियम्स को स्टेज पर नाचते देखकर वह हैरान है जिसने नीली मिनी स्कर्ट पहन रखी है। सौन्द्रा ने अपने बारे में जो जानकारी दी उससे तनुजा को भलीभांति यह समझ में आया कि उसकी समझ, सीमाएं और क्षमताएं क्या है। हर दिन एक लॉटरी जैसा जहाँ उसका नाम इनाम के तौर पर अब तक नहीं निकला। तनुजा देख रही है कि इस पूरे सिस्टम में उसे अब तक खानपान का जो मौका मिला उसमें भारतीय शाकाहार और अमेरिकन शाकाहार में एक बड़ा अंतर है। तनुजा के बगल में खड़ी एक टीचर को वहाँ का शाकाहार पशुओं का चारा लगा, जो कि नार्थ कैरोलिना से है।
विभाग में एक नया अप्पोइन्टमेन्ट हुआ है नाम कार्लोस, जो स्पेन से है। एक गौर करने वाली बात इस नॉवेल में यह है कि अमेरिकन कल्चर में पले, बढ़े और ढले आसपास के देशों के जो लोग यहाँ पढ़ाना चाहते हैं, उन्हें तो आदर, सम्मान और सुरक्षा मुहैया कराई जाती है लेकिन भारत जैसे तीसरे दर्जे के देश से गये हुए लोगों को शिक्षा संस्थान की नौकरियों में भी बहुत हद तक जातीयता और नस्लभेद का सामना करना पड़ता है और यह केवल टीचर्स के लिहाज से ही नहीं बल्कि अमेरिकन स्कूल में पढ़ने वाले छात्रों के मामले में भी ठीक ऐसी ही मानसिकता अपनाई जाती है।
यहाँ के शिक्षण संस्थानों का आलम यह है कि यहाँ तकनीकी, प्रक्टिकल और क्लेरिकल तरीकों का पढ़ाई में ज्यादा दर्ज़ा है इस्तेमाल है। बज़ाफ्ते मौखिक और बौद्धिक रूप से कोर्स को सही तरीके से बच्चों के मन मस्तिष्क में उतारने की कोशिशें के बजाय। मसलन यहाँ छात्रों के कई विभाजन हैं जिनके सेक्शन लाल ब्लॉक, बैंगनी ब्लॉक, नारंगी ब्लॉक, नीला ब्लॉक, हरा ब्लॉक जैसा पार्टीशन में बंटे हैं। टीचिंग के लिहाज से इन सभी ब्लॉक्स के अलग-अलग छात्रों के ग्रुप्स हैं मानसिक, व्यावहारिक और सामाजिक दर्जे देखते हुए और उसकी औसत दिमागी क्षमता के अनुसार उन्हें इन ब्लॉक्स में पढ़ने भेजा जाता है, मसलन - लाल ब्लॉक, जहाँ इन छात्रों को पढ़ाने के लिए तरह-तरह के दिशा-निर्देश की फाइलें हैं, जिनका पालन कानूनन तरीके से करना जरूरी है, वरना टीचर् की नौकरी हमेशा खतरे में है। बैंगनी ब्लॉक के छात्रों को ‘ऐट रिस्क’ की कैटेगरी में रखा गया है, माने ये छात्र बीच में ही पढ़ाई छोड़ने के लिए तैयार हैं। नारंगी ब्लॉक में वे छात्र हैं जो ‘क्रिटिकल केस’ में आते हैं, माने किसी बीमारी या जिस्म की दुर्बलता की वजह से जिन्हें बिना दवाओं के जिंदगी गुजर बसर करना मुश्किल है। इन छात्रों के लिए स्कूल, नर्स अप्पोइंटेड है, जो टीचर को बताएगी कि उन छात्रों के साथ कैसा सुलूक करना है।
‘क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन’ वाली श्रेणी में वो छात्र हैं जिनके माँ बाप के बीच तलाक के केस चल रहे हैं या तलाकशुदा हैं। ऐसे छात्रों में उनके पिता को बारह फीट दूर से ही मिलने की इजाजत है और इन नियमों को तोड़ने पर कानूनी कार्रवाई होना जायज है। नीला ब्लॉक वह है, जहाँ छात्रों को ज्यादा सहायता, ज्यादा समय मिले, जिससे वे अपना होमवर्क कर सकें। यहाँ तक कि एग्जाम में भी ज्यादा समय का अधिकार मिलता है। हरा ब्लॉक वह है, जहाँ दिमागी तौर से अत्यधिक प्रतिभाशाली या ‘गॉड गिफ्टेड’ एक्स्ट्रा टैलेंटेड छात्र होते हैं, जिनसे यह उम्मीद की जाती है कि वे अपनी क्षमता से अधिक बेहतर रिजल्ट देंगे।
वर्कशॉप में टीचर को यह तक बताया जाता है कि इन छात्रों के मनोविज्ञान को कैसे समझे? क्योंकि ऐसे छात्र या तो उद्दंड होते हैं या आलसी या फिर अपने ख्यालों की अलग ही दुनिया में जीते हैं। वे इस बात से भी वाकिफ होते हैं कि वे बाकी ब्लॉक्स के छात्रों से भी ज्यादा क़ाबिल हैं। इसीलिए इनका छोटी क्लासेज से ही गिफ्टेड और टैलेंटेड होने का टेस्ट लिया जाता है और जो इसमें कामयाब होते हैं उन्हें उन्हीं के अनुरूप आगे भेज दिया जाता है। एक मुश्किल यह भी है कि ऐसे छात्र तरह-तरह की परेशानियाँ पैदा करने में माहिर होते हैं। इसी तरह से पीला ब्लॉक आदि-आदि। तनुजा जो अभी-अभी इन मामलों से दो चार हुई है, उसे वर्ड वाल करिकुलम कॉर्नर और अलग-अलग तरह के उपकरणों का इस्तेमाल करते हुए क्लास लेने का मौका भी है। वो इस मुगालते भी रही कि उसे अमेरिकन स्कूल सिस्टम की सही सही जानकारी हो चुकी है। मगर यही उसके लिए सबसे मुश्किल भरा लम्हा है। ऐसे में चार सेक्शन, 504 हैं, दो क्रिटिकल, 10 ऐट रिस्क और बाकी या तो गिफ्टेड हैं या नॉर्मल। यहाँ पेडागोगी, क्लीनिकल टीचिंग, सिम्पोजियम इन सबका अपना अलग-अलग दायरा है।
इसी तरह से यहाँ अमेरिकन और इंडियन के अलग-अलग खेमे हैं, H4 का मतलब अमेरिका में नौकरी करने का परमिट, H1 का मतलब अमेरिका में आवेदन। तनुजा जिस स्कूल में है वहाँ तनुशा, मुअर आदि हैं। अमेरिका में भी ऐसे हालात हैं जैसा कि अमूमन भारत के रोडवेज और ट्रेन ट्रैक्स और पब्लिक ट्रांसपोर्ट के बीच एक ऐसी कतारें पाई जाती है जहां समय से पहले पहुँचने के लिए भी आदमी को भीड़भाड़, ट्रैफिक जाम, मालगाड़ियों का शोर इन सबसे गुजरते हुए भी दफ्तर वक्त पर पहुंचना जरुरी है। ठीक अमेरिका में भी हालत लगभग वैसे ही दिखाई देते हैं। ऐसा तनुजा के जरिये अमेरिकी सुविधाएं नौकरी आदि पर और उसके जाने आने की भागमभाग से मालूम होता है। हालांकि अमेरिका में नौकरी के अपने नफे भी हैं। जैसे पेड लीव, हेल्थ इंश्योरेंस, रिटायरमेंट प्लान आदि। एक ही स्कूल में पढ़ाने की जो जद्दोजहद है, उसमें अपने ही सहकर्मियों के साथ जो षड्यंत्र साजिश के शिकार होने का चलन हैं तनुजा उसे भी देख रही है। n साजिशों से निबटने की कोशिशों में जद्दोजहद कार रही है।
यहाँ एक और बड़ी विशेष बात यह दिखाई देती है कि यहाँ नागरिकता का सवाल प्रवासी गरीबों की आपबीती मानो उसकी जिंदगी के तमाम हिस्सों में एक बड़ा हिस्सा है। ह्यूगो के बारे में उसने पता किया जो कि उसका सहकर्मी है तब उसको मालूम हुआ कि वो मैक्सिको से भागकर फलों के ट्रैक में बैठकर अमेरिका पहुँचा और छुपते-छुपाते अमेरिका की नागरिकता के लिए हर कोशिश की। डॉलर स्टोर में नौकरी की, फिर अमेरिकन औरत से शादी की जो तलाकशुदा थी और उसके बाद एक रेस्तरां में काम करते हुए बेरोजगारी भुखमरी से लड़ते लड़ते उसने टीचिंग कोर्स किया। नतीजा यह हुआ कि जैसे प्यासे को नखलिस्तान मिला। हाई स्कूल में टीचर को नौकरी मिली और यहीं से वो ह्यूगो से मिस्टर ह्यूगो हो चला। अच्छा खासा घरबार पैसा सब। साइंस स्पेसिसलिस्ट की नौकरी के बावजूद उसे एपी केमिस्ट्री पढ़ाने के लिए जद्दोजहद करते हुए देखा गया बतौर साइंस टीचर तनुजा को परेशान करने की नीयत बरकरार रखी। इसके पहले भी विभागाध्यक्ष को छका चुका था नाम जेफरी रिंगर। इतना ही नहीं स्कूल प्रशासन की नींद हराम करके वह अमेरिकन एडुकेशन सोसाइटी का मुख्य किरदार निभा रहा था।
आलम ये था कि पूरी अमेरिका के तमाम स्कूलों में उसके दोस्त, टीचर एसोसिएशन में मेम्बरशिप और इतना ही नहीं तीन वर्षों तक लगातार बेस्ट टीचर अवार्ड से सम्मानित अब उसके लिए दूसरे किसी भी स्कूल में नौकरी पाना एक खेल था। उसके पास एक अद्भुत कला थी लोगों को घर बुलाना, पार्टियां देना, पीने खाने का इंतजाम करना, जिसके कारण ह्यूगो को सभी का सान्निध्य मिला हुआ था। मगर तनुजा जैसे टीचर्स के लिए अमेरिका में यह सालाना कॉन्ट्रैक्ट जॉब थी जिसे कभी भी बदला जा सकता था। और ऐसा कभी नहीं हुआ कि अमेरिका में किसी पूर्णकालिक टीचर की नौकरी गई हो जब तक कि उसने कोई गैर कानूनी काम न किया हो।
यहाँ भारतीय और स्पेनिश कल्चर की समानता भी इला जी के द्वारा दिखाई गई है। दूसरी तरफ भारतीय और अमेरिकन सोसायटीज का एक जैसा नक्शा और इसी नक्शे के ‘मैग्नोलिया काम्प्लेक्स’ में तनुजा ने अपना पहला ठिकाना ढूँढ़ लिया। इला की खासियत यह है कि नॉवेल के भीतर भारतीय सूरतें, सिरतें, पहचान, दखलंदाजी, खुराफातें, ऑफिसियल कल्चर में सुखद और तनावपूर्ण माहौल यह सब कुछ अमेरिका के एक छोटे से स्कूल की बनिस्बत दिखाई देती है। मजेदार यह भी है कि मिस्टर ह्यूगो जो इस नॉवेल के केंद्रीय किरदार हैं जिसके आगे पीछे यह नॉवेल बुना गया है, जिन्होंने रोडनी,जेफ, किंम, पेरेज किसी को भी अपनी शरारतों, बदमाशियों और तंगदिली से नहीं बख्शा।
हालांकि स्कूल खुलने के बाद की जो व्यवस्था है, यह एक दूसरा पहलू है नावेल का, जिसे बड़ी ही तरतीबवार तरीके से तनुजा के बहाने छात्रों के संग सम्पर्क, बातचीत, गार्डियन टीचर्स मीटिंग के समय में उन्हें प्रभावित करने वाले टीचर्स और छात्रों के सजावटी और आमन्त्रणप्रद कामकाज बड़े ही लुभावने तरीके से दिखाए गए हैं। मसलन ‘ओपेन हाउस’ में पैरेंट मीटिंग। इसके अलावा भी बहुत कुछ है, जैसे क्लास के नए प्रयोग, बच्चों को लुभाने वाले अत्यंत अद्भुत चमत्कारी पढ़ाने के रोचक तरीके आदि आदि।
जिस वक्त तनुजा ने स्कूल में जिम्मेदारी ली, तभी से मिस्टर ह्यूगो के नजर में वह खटकने लगी और ह्यूगो के छात्रों के जरिये तनुजा को लगातार तरह-तरह की परेशानियों में डाला जाता रहा। इसके अलावा टेक्स्ट बुक और वर्कशीट का खेल और तनुजा के एग्जिस्टेंस का सवाल बड़ा होता गया, मसलन ह्यूगो ने स्कूल छोड़ने की बात जब-जब सेमेस्टर के अंत में प्रशासन के सामने रखी तब-तब एक ही मुद्दा था कि उसकी तनख्वाह में इजाफा होता रहे, क्योंकि वह अनुभवी है, उसके ताल्लुकात अमेरिका के बड़े बड़े स्कूल के बड़े बड़े प्रशानिक अधिकारियों के संग बहुत बेहतर है। यहाँ तक कि ऐसा भी हुआ है कि प्रशासन ने ह्यूगो के लिए स्कूल के नियम और कायदे तक बदले वहीं दूसरी ओर तनुजा को लेकर माहौल में एक तंगनज़र बनी रही, लेकिन अब तनुजा को इतना समय बीत गया था कि उसे अब ये सब बातें समझ में आने लगी थीं। वह ये भी जान गई कि अमेरिका में टीचर की जॉब जाने के ख़तरे छात्रों को वजह से ज्यादा हैं।
इतना ही नहीं इस नॉवेल में जिस ‘माया सभ्यता’ और भारत का रिश्ता जिस तरह से दिखाया गया है वह एक दूसरे के बहुत करीब हैं। दूसरी तरफ अलग तरह की दिक्कतें और फिजिल ग्रोथ होने से अमेरिकन छात्रों के बीच प्रेम-सम्बंध जो कि किशोर अवस्था में ही शुरू हो जाते हैं, मसलन छठी कक्षा में पढ़ने वाले छात्रों का रोमांचक और रूमानी वातावरण मिलना जुलना इस नॉवेल में देखा जा सकता है। इसके अलावा यह जो भोग-विलास की जो पूरी संस्कृति है इसमें छात्रों को इस बात की तसल्ली है कि वे बड़ी साफ़गोई से झूठ बोल सकते हैं। माँ बाप के खिलाफ, टीचर्स के खिलाफ, दोस्तों व अन्य लोगों के खिलाफ।
इसमें एक और जिक्र आया है, चार्टर्ड स्कूल बनाम प्राइवेट स्कूल और इस बात की ताकीद की गई है कि अमीरों के बच्चे बिगड़े हुए प्राइवेट स्कूलों में भर्ती होते हैं जिसके कारण आपस में छात्र छात्राओं के बीच सेक्स एजुकेशन के कारण एक्सपेरिमेंट शुरू हो जाते हैं। तनुजा को इस बात का भी डर है कि कहीं उसका बच्चा कौस्तुभ इसी कल्चर का हिस्सा तो नहीं हो जायेगा।
स्कूलों की एक और खासियत और दबाव यह भी है कि सेमेस्टर अंत होने के साथ ही जब स्कूल बंद होते हैं, तब भी टीचर्स के लिए कामों की फेहरिस्त बड़ी लंबी होती है। मर्फी, अल्टा डोना, ये दो नाम खासतौर पर इस नॉवेल को एक नई रोशनी से भर देते हैं। क्योंकि मर्फी ही एक मात्र ऐसा किरदार है, जो उसे पहले स्कूल से फारिग कर सकता है और दूसरे स्कूल में जॉइन करने की इजाजत दे सकता है।
तनुजा की चिंता है बावजूद इसके अपार्टमेंट का किराया 75 डॉलर से ज्यादा होने के कारण उसने अल्टा डेना में रहने का फैसला किया। यह वह जगह है जहाँ केमिकल फैक्टरियों का जमावड़ा है लगभग सौ साल पुराना शहर। यहाँ ‘ब्लू कॉलर’ वालों की तादाद बहुत है। आखिरकार विंटेज विला में तनुजा को दूसरा ठिकाना मिला। जहाँ बच्चों को वैदिक स्कूल में मनमुताबिक भर्ती किया। यहाँ उसे तरह-तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ा, जैसे दूषित वातावरण, दुर्गंध और अफवाहें आदि। हालांकि उसे इस बात की कतई जानकारी नहीं थी कि अब जहाँ रहने आई है, बारिश में उसका बरामदा लबालब भरा होगा।
वहीं दूसरी तरफ उसे नए स्कूल में छात्रों की नई खेफ मिली। नए तरह की बदमाशियां देखने को मिली और यहाँ के कुछ छात्र एम्बर रुवेन और लुइस उनके बीच तनिशा आई और सहायक प्रिंसीपल मिस्टर विल्सन इनके साथ उनकी नई परिधि और पढ़ाई का सिलसिला शुरू हुआ। ऐसा तीसरी बार हुआ था जब तनुजा को अप्रत्याशित रूप से व्यववस्थित होने में खुद को समय देना पड़ा। इसके अलावा दूसरे तरह की दिक्कतें जैसे टीचर्स के ऊपर फिदा टीनेजर्स मिले। मगर इन्हीं के बीच में अब तनुजा को यह एहसास भी हुआ कि जिंदगी कठिन ही सही मगर सुंदर है। यह समझने में उसे दो साल से ज़्यादा का वक्त बीत गया। यहाँ तक कि उसने अमेरिकन टीचर एसोसिएशन से भी किनारा कर लिया क्योंकि मिस्टर ह्यूगो की कंप्लेंट करने के बावजूद भी कोई एक्शन नहीं लिया गया। हालांकि ह्यूगो की जिंदगी इस नॉवेल में बड़ी ही ट्रैजेडी पूर्ण भी है। बीवी छोड़कर भाग गई है, जिंदगी अकेले ही बसर हो रही है। इसके बावजूद भी टार्चर करने का जो सिलसिला तनुजा के साथ उसका रहा वह खत्म नहीं हुआ।
यहाँ तरह तरह के डे मनाए जाते हैं। मसलन हेरिटेज वीक, पाजामा डे आदि। इसी के बीच में प्रशासन के नए-नए नियम आफत की तरह टीचर्स के ऊपर लटकते रहते हैं, मसलन एक तरफ पर्व, त्यौहार, पार्टियों की गहमागहमी, रोमांचक मुलाकातें, वहीं दूसरी तरफ ऑफिसियल काम का दबाव। माने वर्कशीट बनाना, पॉवर पॉइंट, वार्मअप, क्लोजिंग क्वेश्चन और इनके बीच छात्रों का समझदारी का लेबल इस तरह का है, जिसमें वे चाहते हैं कि डॉलर देकर ही सही ‘बी’ ग्रेड को अच्छी ग्रेड में तब्दील करवा लें। जिसके लिए तनुजा को जोसुआ ने प्रलोभन दिया था और तनुजा ने उसके मजे लिए थे। हर छह सप्ताह बाद ग्रेड बुक बनवाना, क्विज करवाना, फेल होने वाले स्टूडेंट्स के घर फोन के जरिये जानकारी देना। इतना ही नहीं जैसे ही पाँचवा सप्ताह शुरू होता है एक अफरातफरी छात्रों के बीच देखने को मिलती है कि जब पढ़ाई बंद और छात्रों को ज्यादा समय इस बात के लिए चाहिए कि वो ‘बी’ को ‘ए’ ग्रेड में और ‘एफ’ को ‘डी’ ग्रेड में बदलवा सकें। मगर अब तनुजा इन तमाम कामों में पूरी तरह से अभ्यस्त हो चली है। उसके लेशन प्लान में इतना कुछ है कि सबके लिए गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।
जहाँ एक ओर इस नॉवेल में प्रशासनिक और स्कूली दबाव से राहत का दौर दिखाया गया। वहीं दूसरी ओर नॉवेल में अपार्टमेंट मैनेजमेंट की खामियों का और उससे पैदा हुई दिक्कतों से तनुजा और अर्चित को जूझते हुए परेशान हालत में देखा जा सकता है, मसलन जिंदगी कभी सुख से बिना दुःख के पूरी नहीं होती। तनुजा ने यह तक देखा कि स्कूल कल्चर में ओपेन सेक्स का माहौल जहाँ तहाँ छात्र छात्राओं को बाथरूम आदि कोने कतरों में मिल ही जाता है फिर भी वह जानती है, "एन्जॉय करना भी हरेक के हिस्से में नहीं आता। हम भटकते ही रहे प्यासे पानी की एक बूंद के लिए।"
यही किशोरावस्था का शगूफा है। सपनों में जीने और सपनों को पूरा करने की जिद्द। तीन बरस बीतने के बाद भी तनुजा अब भी डाउन टाउन के आसपास नई नौकरी की खोज में जुटी हुई है। वो मेक कनेक्शन का खेल भी जानती है। मसलन, "व्हाई शुड आई हायर यू? आई डोंट नो यू।" यह अमेरिका का स्कूली कल्चर है। इसी के पैरालेल भारत में भी जो सगे-संबंध का खेल है वह यहाँ के स्कूलों में भी दिखाई देता है। यहाँ तक कि लेखिका इला ने इस बात तक का जिक्र किया है कि अमेरिकन स्कूलों के भीतर हथियारों की बड़ी तेजी से चलन बढ़ा जो टीचर्स को डराने धमकाने के काम आता है। इस बात को तनुजा अपने जेहन में दिल्ली की यादों को रखे हुए यह समझती है कि दिल्ली में पॉलिटिक्स और अमेरिका में सेक्स, शूट और शैडीएस्ट नेचर उतना ही प्रभावशाली है।
‘ओपेन हाउस’ में गार्जियन पैरेंट मीटिंग की कई मुलाकातें माँ बाप के साथ कुछ इस तरह से दर्ज है कि जहाँ स्टूडेंट्स और उसके गार्डियन के पास लगातार शिकायतें हैं स्कूल प्रशासन के विरुद्ध, ठीक इसी जगह से तनुजा को मौका मिल गया कि वह भी गोपनीय तरीके से मिस्टर ह्यूगो के विरुद्ध करवाई को अंजाम दे सके। इन मायनों में वह एक हद तक कामयाब भी हुई। कुल मिलाकर दो बरस पूरे होते-होते स्कूल पॉलिटिक्स में तनुजा का अच्छा दखल हो गया। अमेरिकन स्कूल की एक बड़ी खासियत यह भी है कि वहाँ स्कूल के भीतर से ही छात्रों का चयन सीधे आर्मी में होता है।
हालांकि अभी भी तनुजा के लिए लिए मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी, पर बदलाव इतना हुआ कि वह प्रतिवाद करना सीख गई थी। प्रशासन का शख़्त आदेश था कि सारे बच्चे पास होने चाहिए किसी भी सूरत में और तनुजा इस सिस्टम को अच्छी तरह से समझ चुकी थी। बावजूद इसके कि नासमझ छात्रों की वजह से कोर्स और मैटेरियल पर भी सवाल लगातार उठते रहे। छात्रों के बदमाशियों का आलम यह था कि तनुजा को प्रिंसीपल के सामने रुंआसा तक होना पड़ा और तनुजा पर छात्रों को अंक देकर पास करने का शिकंजा भी कसता गया जिसकी खीझ उसके भीतर लगातार बनी रही।
अमेरिकन स्कूल की एक गजब केमिस्ट्री है कि अगर छात्र किसी सब्जेक्ट में पास नहीं होता है तो उसे किसी खेल में शामिल होने की इजाजत नहीं मिलती और खेल टीचर का दबाव यह होता है कि वह किसी भी तरह उस कोर्स के टीचर से मिलकर उसे पास करवाये। तनुजा के लिए यह भी एक बड़ी हुज्जत भरा समय था, मसलन, स्कुल टीचर की शिकायत "तुम उसे पास नहीं कर सकती? वह खेल नहीं पायेगा अगर उसे सत्तर प्रतिशत अंक न मिले तो।"
"तुम्हीं बताओ कहाँ से अंक दे दूँ मैं? मैंने उसे इतने अतिरिक्त अंक दिए हैं कि उसकी वजह से मुझे औरों के अंक बदलने पड़े। "
अमेरिकन स्कूल के छात्रों का आलम यह है कि माँ-बाप से अलग रहकर वे पिज्जा डोमिनोज आदि आदि की नौकरी करके पॉकेट मनी कमाते हैं। इन सभी चीजों के बीच तनुजा के पास सपनों की एक बड़ी दुनिया है। उसे लगता है, "सपनों की कोई उम्र नहीं होती! वे तो बने रहते हैं चिर युवा! सपने को ईश्वर क्यों नहीं कहता कोई! वही तो जिलाये रखते हैं हमें। आगे बढ़ाते जाते हैं उंगली पकड़ कर। आने वाले कल पर विश्वास का कोई कारण नहीं होता कई बार, तब भी आनेवाले कल पर हमारी सुई अटकी रहती है।।।।। क्योंकि एक सपना होता है अपने पास।
यहीं से तनुजा की जिंदगी में बदलाव दिखाई देता है कि नई जगह पर नए पड़ोसी और उसके बच्चों के साथ तालुकात बड़े ही जहीन हैं। दूसरी तरफ इस नॉवेल के बहाने इला ने ऑनलाइन क्लासेज की खामियाँ और हैक आई डी को लेकर चिंता जाहिर की कि जब उसके बेटे कौस्तुभ का आई डी हैक हुआ तो उस पर क्या बीती। उसी तरह से कंप्यूटरीकृत एडुकेशन के क्या नुकसान और फजीहत है इस पर भी बात की है। तनुजा जानती है कि स्कूल प्रशासन उसके बच्चे की हैक आईडी को लेकर अपने स्कूल के टीचर की नौकरी बचाएगा और हैकर किसी टीचर की औलाद हुई तो एडमिन उसे बचाने के लिए सारा दोष कौस्तुभ पर डालकर हाथ झाड़ लेगा। इसीलिए यह भी तय हुआ कि एक वकील का इस मामले में दखलंदाजी करना बेहद जरूरी है। नतीजा कौस्तुभ के पक्ष में हुआ।
इस बहाने से इला ने इस ओर भी इशारा किया है कि किसी ताकतवर और प्रभावशाली आदमी की हिमाकत की वजह से प्रतिभाशाली गरीब बच्चे को बुरा असर झेलना पड़ सकता है। जहाँ एक ओर इस मसले का जिक्र है। वहीं दूसरी ओर इस बात का भी जिक्र है कि आर्य स्कूल में पढ़ने वाली छोटी बच्ची यानी किशोर उम्र की छात्रा की किताब का छपना और उस किताब पर उसे स्कूल में और स्कूल के बाहर देश में अंग्रेजी की किताब होने के कारण प्रसिद्धि मिलना अचरज भरा है।
जाहिरतौर से नॉवेल का मूल मकसद यही है कि अमेरिकन स्कूली सिस्टम का भीतरी और बाहरी खोल और पोल दोनों ही सामने लाकर रखी गई है। एक आखिरी घटना जो इस नॉवेल को संजीदा बनाती है वह है अमेरिकन कल्चर के त्रासद और भयावह, भीषण वक्त की दरयाफ्त करता है। ऑयल कम्पनी के स्टोरेज टैंक में आगजनी से जो अफरातफरी का माहौल पैदा हुआ और शहरी किनारों पर बसे लोगों की परेशानी का जो आलम दिखा ऐसा माहौल पॉश इलाकों में तब जाहिर हुआ जब धुँए का जरा सा असर वहाँ पहुँचने वाला था। प्रशासन मुस्तैद हुआ क्योंकि वहाँ रईस लोगों की तादाद ज्यादा है।
दूसरी तरफ अमेरिकन पढ़ाई और प्रशासन के बीच जो गहरे रिश्ते हैं वह समाज की खोखली बुनियाद की बड़ी वजहें हैं। तनुजा इस बात को अब भलीभांति जान गई है। इस नॉवेल में होमो कल्चर और अमेरिकन सोसायटीज की सहमति को भी दिखाया गया है और अंततः इस नॉवेल का जो आखिरी हिस्सा है वहाँ दो तरह की खुशियां हैं एक शहरी किनारे की भीड़भाड़ से हटकर तनुजा ने अपनी जगह बदल ली बेहतर इलाके में रहने चली गई। क्योंकि शहर लगभग पूरे तीन हफ्ते तक इस आग और धुँए से खौफजदा रहा। वहीं किम की शादी का न्यौता पाकर उसमें शरीक होना, मौजमस्ती करना और तनावमुक्त होना यह आखिरी हिज्जा है इस नॉवेल का। आखिरकार एक नए षड्यंत्र के सपने और संभावनाओं के साथ इस उपन्यास का अंत होता है।
कुलमिलाकर इस बात को समझा जा सकता है कि सपने कभी खत्म नहीं होते और संभावनाओं का कोई अंत नहीं। जिनकी जैसी फितरत है वह कभी बदलती नहीं। और जो बदलाव की सूरत के लिए दुनिया में लड़ रहे हैं उन्हें खुद भी बदलना होगा तकलीफें झेलते हुए, समझौते करते हुए और भविष्य की ओर कदम बढ़ाते हुए। इस मामले में यह शानदार है कि यहाँ नाउम्मीदी कहीं नहीं है और चकाचौंध डेवलप्ड कंट्री अमेरिकन स्कूलों का सच साफतौर पर यहाँ रखा गया है। इससे जाहिर होता है कि शिक्षा व्यवस्था चाहे विकसित देश की हो या विकासशील देश की, आपसी टकराहटें, खुराफातें, छात्रों की बदमाशियाँ और टीचर्स की परेशानियाँ ये पूरी दुनिया में लगभग एक जैसा है। इसीलिए कहा जा सकता है कि ‘वह दिन आएगा जरूर’ प्यासे का नखलिस्तान जैसा है।
उपन्यास - वह दिन आएगा ज़रूर / मूल्य – 400/-
लेखिका – इला प्रसाद, ह्यूस्टन, अमेरिका
प्रकाशन – विकल्प प्रकाशन, दिल्ली / दूरभाष- 92115 598 86


