आनंद जैन

आज कुछ लिखने का मन नहीं था। कुछ लिखा भी नहीं, मन विचलित था, शायद नहीं।

पिछले चुनावों के वक्त मैंने भाजपा को वोट देने का मन बना लिया था, जब तक कि मोदी की उम्मीदवारी घोषित नहीं हुई थी। कॉंग्रेस को एक ब्रेक देना बहुत जरूरी था। ब्लोटेड हो गई थी, बहरी और गूंगी भी।

फिर भाजपा ने मोदीजी को प्रोजेक्ट किया और उसी दिन से मेरा विरोध शुरू हो गया था। उनसे कोई व्यक्तिगत दुश्मनी तो नहीं थी, मगर उनके गुजरात के कार्यकाल ने यह ट्रेलर दिखा दिया था, कि इस इंसान की एक डेमोक्रेसी में कोई जगह नहीं है।

बहुत लोगों ने पूछा था, क्यों इतना विरोध करते हो ?

जवाब मेरा बहुत सीधा था। ये व्यक्ति हमारे देश के प्रधानमंत्री पद के योग्य नहीं है। यह व्यक्ति हमारे देश की एकता, संप्रभुता और उसके स्ट्रक्चर को नहीं संभाल पायेगा। आर्थिक समझ नहीं है और कूटनीतिक भी।

दुर्भाग्य यह हुआ कि हमारे प्रधानमंत्री जी ने मेरी कुशंकाओं को सही सिद्ध कर दिया, वह भी हजार गुना बढ़ा कर। ऐसा नहीं है कि आज जो कुछ हो रहा है वह पहले नहीं हुआ, हुआ है, कई बार हुआ है, मगर ऐसी असंवेदनशीलता पहली बार देखने को मिल रही है।

एक निर्भया के लिये पूरी दिल्ली सड़क पर उतर आई थी, आज उससे भी वीभत्स बलात्कार देखने को मिल रहे हैं, मगर देश संवेदनशून्य है। अखलाक मरा, तो देश में हल्का कंपन हुआ था, किंतु रोज हो रहे इन हमलों ने हमें संवेदनशून्य कर दिया है। यदि ऐसा हो रहा है, तो इसके पीछे एक ही कारण है, सरकार की कान फोड़ देने वाली चुप्पी। सरकार जी ने यह कह दिया है कि यह स्वीकार्य है और इसकी सजा नहीं है। बस इतना ही काफी होता है, लिंच मॉब्स को जागृत करने के लिये।

ये लिंच मॉब हमारे बीच हमेशा मौजूद रहते हैं, इनके मुंह में खून लगने की देर है और ये टूट पड़ते हैं, भेड़ियों की तरह।

सावधान हो जायें, यदि आप उन बहुत सारे लोगों में से हैं, जो इस पूरे घटनाक्रम के लिये एक जस्टिफिकेशन ढूंढ़ रहे हैं। इतिहास को कोस रहे हैं या मुसलमानों की बुराईयां निकाल रहे हैं। 72 हूरों की बातें कर रहे हैं, तो ठहर जाईये। जो पाकिस्तान में हो रहा है या ईराक में हो रहा है, या जो अफगानिस्तान जैसे खूबसूरत मुल्क को निगल गया है, वह यही जस्टिफिकेशन था। वहां के शासकों ने भी आप जैसों का ही इस्तेमाल किया था, एक भीड़ को उकसाने के लिये। वहां भी आप ही की तरह लोग तालियां बजा रहे थे।

और फिर वो गुलिस्तां रेगिस्तानों में बदल गये, अब वहां फूल नहीं खिलते, मुस्कुराहटें भी नहीं बिखरतीं, क्योंकि कभी किसी रोज़ लोग चुप कर गये थे या तालियां बजा रहे थे, किसी काफिर को मारने पर। आप भी यही कर रहे हैं, रंग झंडों के बदल गये तो क्या हुआ। रंग लहू का आज भी वही है, मारने वाले भेड़िये भी वही हैं, और मरने वाले इंसान भी।

तय कर लीजिये, आप किसमें अपना भविष्य ढ़ूंढ़ रहे हैं, जिन्ना के पाकिस्तान में, हिटलर के जर्मनी में या आज के सीरिया में। कितने टुकड़े करना चाहेंगे अपने देश के, कितनी लाईनों पर बांटेंगे, धर्म के नाम पर, जात के नाम पर, भाषा के नाम पर, आर्य - द्रविड़ के नाम, कितना बंटेंगे, कितना बांटेंगे - तय आपको ही करना है, क्योंकि यह देश किसी मोदी या गांधी का नहीं, आपका हमारा है। आपके बच्चे कैसे मुल्क में सांस लेंगे, यह भी आप ही तय करेंगे।

मैं, हमेशा फिरकापरस्ती का विरोधी रहा हूं, हमेशा रहूंगा। बाकि आज जो लोग निकल कर सड़कों पर आये, उनके जज़्बे को सलाम। हिंदुस्तान जिंदाबाद है जिंदाबाद रहेगा।

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