जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त/ शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त/ शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

जब कभी बिकता है बाज़ार में मज़दूर का गोश्त/ शाहराहों पे ग़रीबों का लहू बहता है : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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