साहित्यिक कलरव - Page 2
इन आँसूओं को 'शग़फ़' सब्र कैसे आएगा
शब्द | साहित्यिक कलरव ये उन का दावा मसीहाई का है मक्र-ओ-फ़रेब लिपट के उन से मुसलसल कोई मचलता रहा हमेशा अश्कों की ज़द में ही रात ढलती रही उमीद-ए-जाँ...
क्या संकीर्णता का कोई इलाज है? गांधी न सही “आजाद” को ही हटा दिया
मौलाना आज़ाद के नाम पर शुरू की गई "मौलाना आज़ाद नेशनल फ़ेलोशिप" बंद करने वालों को शायद नहीं मालूम कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद या अबुल कलाम गुलाम...











