एक दलित : अब मैं कोई जश्न नहीं मनाता हूँ
दलित उपलब्धियों के जश्न और वास्तविक पीड़ा के बीच का अंतर उजागर करती आनंद दास की प्रभावशाली कविता—एक गहरा सामाजिक दस्तावेज़।

Anand Das
आनंद दास की मार्मिक कविता ‘एक दलित : अब मैं कोई जश्न नहीं मनाता हूँ’— दलित प्रतिनिधित्व, जातिगत हिंसा और सामाजिक पाखंड पर तीखा हस्तक्षेप
(1) एक दलित
---- आनंद दास
एक दलित!
जब पढ़ लिखकर क़ाबिल बना,
हमारे गाँव ने ख़ुशियाँ मनाईं.
एक दलित!
जब अफ़सर और सिपाही बना,
पूरे मुहल्ले ने जश्न मनाया.
एक दलित!
जब ज़िला कलेक्टर व मुख्य सचिव बना,
पूरे इलाक़े में भव्य कार्यक्रम हुआ.
एक दलित!
जब चुनाव में प्रत्याशी बना,
पूरे दलित समाज ने भीड़ बढ़ायी.
एक दलित!
जब चुनाव जीता,
दलित युवकों ने जय भीम का नारा लगाया.
एक दलित!
कभी अभिनेता, कभी खिलाड़ी, कभी बिज़नेस मैन,
कभी साइंटिस्ट, कभी बुद्धिजीवी बना.
इस ख़ुशी में हमने सोशल मीडिया पर
स्टेटस लगाया.
एक दलित!
जब ग़रीबी, प्रताड़ना और हिंसक घटना का शिकार बना.
उसके दुःख को कोई नहीं समझा.
वह पढ़ा लिखा दलित,
सामने नहीं आया.
जिसके लिए ख़ुशियाँ मनाई थीं.
उस दलित अफ़सर और सिपाही ने,
मुँह फेर लिया.
जिसके लिए जश्न मनाया था.
वह दलित ज़िला कलेक्टर और मुख्य सचिव ने,
पहचानने से इंकार कर दिया.
जिसके लिए कार्यक्रम में शरीक हुए थे.
उस दलित नेता ने,
उजड़े घर को बसाने से
इनकार कर दिया.
जिसके लिए भीड़ बढ़ाई थी
और जय भीम के नारे लगाए थे.
ख़ैर उन अभिनेता, खिलाड़ी, बिज़नेस मैन,
साइंटिस्ट और बुद्धिजीवियों का क्या?
वे तो वर्चुअल थे!
असल ज़िन्दगी में उन दलितों ने,
मुझ जैसे दलितों का सिर्फ़ फ़ायदा लिया.
आवेग में आने के लिए.
अब मैं ना कोई जश्न मनाता हूँ.
ना कोई भीडतंत्र का पात्र बनता हूँ.
और ना ही कोई उनके जलसे-जुलूस में
शरीक होता हूँ.
बस्स बहुत हो चुका!
यह सब देखकर।
अब औरों की तरह,
चुपचाप आगे बढ़ जाता हूँ .........
(2)"ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें"
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
हमलोगों को रोज-रोज़
चमार तो कभी चमरोटा
कह कर बुलाते हैं।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली के कीड़े जैसी
जात है तुम्हारी।
चमरा, चमरोटा कहीं का !
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
नाली कितना भी साफ़ कर लो
साफ़ नहीं होती।
वैसी है तुम्हारी जात!
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
अभी मारूंगा तो ,
पूरे कपड़े में हगते-मूतते
घर जाओगे अपने ।
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोगों के ऊपर
थूकना चाहिए ,
और तुम्हारे जात पर भी !
ऐसे-ऐसे बोलते हैं हमें-
तुमलोग कभी नहीं सुधरोगे
ना ही कभी सुधरेगी,
तुम्हारी जात !
ऐसे-ऐसे कब तक बोलते रहेंगे?
कब तक इंसानियत का जनाजा निकालते रहेंगे?
अब ज़माना जात का नहीं,
फ़ेसबुक, इंस्टा और व्हाट्सऐप का है!
(आनन्द दास भारत के मूलत: हिन्दी भाषी प्रदेश से हैं पर उनका जन्म कोलकाता में हुआ। उन्होंने प्रारम्भिक शिक्षा राष्ट्रभाषा विद्यालय, सर्वोदय विद्यालय तथा एस. बी. मॉडर्न हाई स्कूल से प्राप्त की हैं। उन्होंने कोलकाता के ऐतिहासिक और विश्व विख्यात प्रेसिडेंसी कॉलेज (प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय) से हिन्दी में स्नातक की हैं। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर कलकत्ता विश्वविद्यालय से तथा शिक्षाशास्त्र में स्नातकोत्तर सी.डी.एल.यू.,सिरसा से की हैं। इसके अलावा यू.जी.सी. नेट(हिंदी) और स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) इग्नू से की हैं। कोलकाता के ए.जे.सी. बोस कॉलेज (बी.एड. विभाग) में अतिथि प्रवक्ता के तौर पर कार्य कर चुके हैं। पश्चिमबंग प्राथमिक शिक्षा पर्षद द्वारा संचालित प्रशिक्षण (प्राथमिक कार्यरत शिक्षकों के लिए) कार्यक्रम में बतौर प्रशिक्षक भी कार्य कर चुके हैं। आनन्द दास की हिन्दी में 15 से अधिक संपादित पुस्तकों में शोध लेख प्रकाशित हैं साथ ही हिन्दी के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में आनन्द दास की रचनाएं निरन्तर प्रकाशित होती रहती हैं। वर्तमान में श्री रामकृष्ण बी. टी. कॉलेज (Govt. Aided B.Ed. College), दार्जिलिंग में सहायक प्राध्यापक हैं तथा रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय में शोधरत (पी.एच.डी.) हैं।)


