चेन्नई का बूथ: जब मौसम बनता है लोकतंत्र की परीक्षा

  • पांच राज्यों के चुनाव और बदलता जलवायु परिदृश्य
  • अप्रैल की गर्मी: आंकड़ों में बढ़ता संकट
  • बारिश, तूफान और अनिश्चितता: मौसम का बदलता मिज़ाज
  • वेट-बल्ब कंडीशन: जब गर्मी बन जाती है जानलेवा
  • प्राकृतिक आपदाएँ और बढ़ता मानवीय नुकसान
  • वैज्ञानिक दृष्टि: हिंद महासागर और प्री-मॉनसून का बदलाव
  • चुनाव आयोग की तैयारी और सीमाएँ
  • लोकतंत्र और कार्बन फुटप्रिंट: चुनाव भी जिम्मेदार?

क्या बदलना होगा चुनाव का कैलेंडर?

भारत में चुनावी प्रक्रिया पर बढ़ते जलवायु संकट का प्रभाव—गर्मी, वेट-बल्ब कंडीशन, और प्राकृतिक आपदाएँ कैसे लोकतंत्र की भागीदारी को प्रभावित कर रही हैं।

धूप में लोकतंत्र, पसीने में फैसला

चेन्नई के एक बूथ पर सुबह के नौ बजे हैं। बूथ अधिकारी की कमीज़ पीठ से चिपकी हुई है। बाहर कतार में खड़े लोग छाया ढूंढ रहे हैं, जहां छाया है ही नहीं। हवा में नमी इतनी है कि पसीना सूखता नहीं, बस शरीर पर ठहर जाता है। यह सिर्फ गर्मी नहीं है। यह वही गर्मी है, जो तय कर रही है कि कौन वोट देने आएगा, और कौन रास्ते से ही लौट जाएगा।

अप्रैल का महीना है, और देश के पांच राज्य चुनाव में हैं। पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी। 17.4 करोड़ मतदाता, 824 सीटें, 2 लाख से ज्यादा मतदान केंद्र। सब कुछ तैयार है। बस एक चीज़ है, जो हर साल और अनिश्चित हो रही है और वह है मौसम।

अप्रैल हमेशा से आसान महीना नहीं रहा। यह वो वक्त है जब उत्तर और मध्य भारत में लू की शुरुआत होती है, और पूर्वोत्तर में काल-बैसाखी के तूफान आते हैं। छोटे, तेज, और अक्सर बिना चेतावनी के। लेकिन अब यह पैटर्न बदल रहा है। पिछले कुछ सालों में अप्रैल का मिज़ाज और ज्यादा अस्थिर हुआ है।

2022 का अप्रैल रिकॉर्ड पर सबसे गर्म महीनों में था, सामान्य से 1.36 डिग्री ज्यादा। 2025 में भी यह अंतर 0.86 डिग्री रहा। यह सिर्फ नंबर नहीं हैं। इसका मतलब है कि दोपहर की लाइन में खड़ा रहना अब असुविधा नहीं, जोखिम बन चुका है।

बारिश का हाल भी वैसा ही बिखरा हुआ है। 2024 में देश में करीब 20 फीसदी कम बारिश हुई। 2025 में प्रायद्वीपीय भारत में 60 फीसदी ज्यादा, और पूर्वोत्तर में 21 फीसदी कम। यानी जहां पानी चाहिए, वहां नहीं, और जहां नहीं चाहिए, वहां ज्यादा।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) के ताज़ा अनुमान बताते हैं कि असम में मतदान से पहले गरज-बारिश और बिजली गिरने की संभावना है। बंगाल में छिटपुट बारिश। तमिलनाडु और केरल में एक अलग खतरा है। तीव्र गर्मी और तटीय नमी का वो मेल, जिसे वैज्ञानिक वेट-बल्ब कंडीशन कहते हैं। इसमें शरीर पसीना बहाता है, लेकिन ठंडा नहीं हो पाता। यही वो बिंदु है, जहां हीट स्ट्रेस धीरे-धीरे जानलेवा बन सकता है।

स्काईमेट वेदर के महेश पालावत कहते हैं, बढ़ते तापमान की वजह से प्री-मॉनसून गतिविधियां पहले से ज्यादा और जल्दी हो रही हैं। इसका सीधा असर लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर पड़ रहा है, और चुनाव भी इससे अलग नहीं हैं।

यह खतरा काल्पनिक नहीं है। गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में प्राकृतिक आपदाओं से केरल में 387, असम में 128 और तमिलनाडु में 120 लोगों की जानें गईं। पूरे देश में 2017 से 2022 के बीच हर साल दो हजार से ज्यादा जानें सिर्फ बिजली गिरने से गई हैं। लू से होने वाली मौतें अलग हैं।

आईआईटीएम के जलवायु वैज्ञानिक रॉक्सी मैथ्यू कोल इस बदलाव की जड़ हिंद महासागर के बढ़ते तापमान में देखते हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में बढ़ी नमी और अस्थिरता ने प्री-मॉनसून के पैटर्न को बदल दिया है। जो मौसम कभी अनुमान के दायरे में था, अब वह सरप्राइज़ देने लगा है।

इस बदलते परिदृश्य में चुनाव आयोग के सामने चुनौती भी नई है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त ओपी रावत कहते हैं कि आयोग ने कुछ व्यावहारिक कदम उठाए हैं, जैसे मतदान का समय सुबह सात बजे से शाम तक रखना, ताकि लोग अपेक्षाकृत ठंडे समय में वोट डाल सकें। कतार की जानकारी देने के लिए ट्रैकिंग सिस्टम और दिव्यांग मतदाताओं के लिए घर से मतदान की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई है।

लेकिन वे एक बड़ी कमी की ओर भी इशारा करते हैं। उनके मुताबिक चुनाव अधिकारियों, मौसम विभाग और आपदा प्रबंधन एजेंसियों के बीच रियल-टाइम समन्वय के लिए अभी तक कोई मानक कार्यप्रणाली नहीं है। यानी जैसे-जैसे मौसम बदल रहा है, वैसी संस्थागत तैयारी अभी उस गति से नहीं बढ़ी है।

रावत एक और अहम बात कहते हैं। चुनाव सिर्फ मौसम से प्रभावित नहीं होते, वे मौसम को प्रभावित भी करते हैं। रैलियों में प्लास्टिक, फ्लेक्स और ईंधन का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है, जो कार्बन उत्सर्जन बढ़ाता है। उनका मानना है कि अगर चुनाव का कैलेंडर नवंबर या दिसंबर जैसे ठंडे महीनों में शिफ्ट किया जाए, तो गर्मी और प्री-मॉनसून के जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

दोपहर के बारह बज चुके हैं। चेन्नई के उसी बूथ पर कतार अब छोटी हो गई है। कुछ लोग लौट गए हैं। बूथ अधिकारी के सामने रखा पानी का जग अब गुनगुना है। बर्फ कब की पिघल चुकी है।

मतदान अभी बाकी है। सवाल भी। इस बदलते मौसम में, लोकतंत्र कितनी देर तक धूप में खड़ा रह पाएगा।

डॉ. सीमा जावेद

पर्यावरणविद & कम्युनिकेशन विशेषज्ञ