फ़िलिस्तीन पर भोपाल में एक गंभीर साहित्यिक संवाद

  • कुमार अंबुज की प्रस्तावना: इतिहास और समकालीन राजनीति का संदर्भ
  • विनीत तिवारी का आँखों-देखा बयान: फ़िलिस्तीन के संघर्ष की मानवीय कहानी
  • जब जीवन ही प्रतिरोध बन जाता है: फ़िलिस्तीनी समाज की वास्तविकता
  • कला, हास्य और उम्मीद: संकट के बीच सृजन की निरंतरता
  • प्रतीकों की भाषा: वॉल आर्ट, ऑलिव के पेड़ और केफ़ियेह
  • राजेश जोशी की टिप्पणी: किताबों से परे वास्तविक पीड़ा की समझ
  • साहित्य, साक्ष्य और वैश्विक न्याय की तलाश

जहां अस्तित्व ही प्रतिरोध है…फ़लस्तीन का दर्द

भोपाल, 7 मार्च 2023. शनिवार 28 फरवरी की शाम को भोपाल में आयोजित एक कार्यक्रम में फ़लस्तीन से लौटे कवि-विचारक विनीत तिवारी ने जब धरती के उस हिस्से का आंखों देखा हाल सुनाना शुरू किया तो वक्त मानो थम सा गया। जब उन्होंने फ़लस्तीन के बारे में, वहां के लोगों के बारे में, वहां के साहित्य के बारे में, आम जन-जीवन के बारे में, उनकी रोजमर्रा की कठिनाइयों के बारे में बताना शुरू किया तो लगा मानो हम कितना कम जानते रहे? इतने अरसे से हम जिस सहानुभूति को जी रहे थे, विनीत ने उसे समानुभूति में बदल दिया।

यह अवसर था प्रगतिशील लेखक संघ की भोपाल इकाई द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम का जिसका शीर्षक था ‘जहां अस्तित्व ही प्रतिरोध है।’

कार्यक्रम के आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए वरिष्ठ कवि-कथाकार कुमार अम्बुज ने अपने विशिष्ट और नपे-तुले अंदाज में बहुत सलीके से विषय को श्रोताओं के सामने खोला। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि जिस समय यह कार्यक्रम हो रहा है, ठीक उसी समय इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर एक अनचाही जंग थोप दी है। ऐतिहासिक संदर्भों का हवाला देते हुए उन्होंने इजरायल के एक भौगोलिक देश होने की बात को प्रश्नांकित किया।

इजरायली रचनाकारों अमोस ओज और येहुदा अमिचाई को उद्धृत करते हुए उन्होंने इजरायल के मौजूदा रुख और दुनिया भर में इस समय बढ़ते चरमपंथ की कड़ी पड़ताल की। उनका संबोधन समीचीनी साहित्यिक और ऐतिहासिक संदर्भों से भरा एक ऐसा वक्तव्य था जिसने विषय को श्रोताओं के समक्ष स्पष्ट कर दिया था और विनीत तिवारी के संबोधन के लिए उचित मंच तैयार कर दिया था।

विनीत तिवारी ने अपने ‘आंखों देखे हाल’ या कहें वक्तव्य की शुरुआत इजरायल के गठन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और 1948 में फ़लस्तीन पर बमबारी की घटनाओं के जिक्र से की। उन्होंने विस्तार से बताया कि इजरायल के लगातार हमलों और हालात को मुश्किल बनाने के बीच फ़लस्तीन के लोगों की मुश्किलें इतनी अधिक हैं, उनका इस कदर दमन किया जा रहा है कि उनका अस्तित्व ही उनका प्रतिरोध बन गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो उनका होना ही एक चुनौती है इजरायल के लिए।

उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि कैसे इन त्रासद हालातों के बीच भी फ़लस्तीन के आम नागरिकों, कवि-कलाकारों की रचनात्मकता उनका हास्यबोध अभी भी पूरी मुखरता से सामने आ रहा है और इस पूरे काले दौर को अपनी तरह से रच रहा है, सहेज रहा है। फ़लस्तीनी कैब ड्राइवर की जिजीविषा हो कि विनीत के स्थानीय मित्रों के संघर्ष ऐसा लगा कि हम उनके साथ-साथ एक यात्रा में हैं। यह यात्रा उस कठोर यातनापूर्ण यातना के समांतर ही थी जिससे फ़लस्तीन के नागरिक दिन रात गुजर रहे हैं।

उन्होंने दीवार पर की गई कलाकारी, जैतून के पेड़ और फ़लस्तीनी राजनीतिक-सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बन चुके ‘केफियेह’ (वह साफा जो फ़लस्तीन के लोग बांधते हैं) के हवाले से स्थानीय संघर्षों के प्रतीकों की अहमियत बयां की।

विनीत के वक्तव्य में एक संदेश उन सत्ताओं के लिए भी छिपा था जो अल्पसंख्यकों को कुचलने और बहुसंख्यकों को सहलाने की राजनीति के सहारे शीर्ष पर हैं और मानती हैं कि ऐसा करके अल्पसंख्यकों की जिजीविषा को तोड़ पाएंगी। विनीत ने जो अनुभव जिए हैं उनके आधार पर उन्होंने जितना कहा उससे बहुत अधिक अनकहा रह गया। यह बात वहां मौजूद तमाम लोगों ने महसूस की।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने विनीत के वक्तव्य की सराहना करते हुए कहा कि वह इस आंखों देखे हाल को सुनकर स्तब्ध हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अब तक किताबों और अखबारों के जरिये फ़लस्तीन के बारे में हम जो कुछ सुनते आए हैं, आज पता लगा कि वह तो फ़लस्तीन के लोगों की वास्तविक पीड़ा के समक्ष कुछ भी नहीं है।

कार्यक्रम में शहर के तमाम विचारशील नागरिक और रचनाकार साथियों ने शिरकत की। कार्यक्रम का संचालन प्रगतिशील लेखक संघ की भोपाल इकाई के सचिव संदीप कुमार ने और आभार प्रदर्शन वरिष्ठ कवि अनिल करमेले ने किया।